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अमेरिका-ईरान युद्ध में पाकिस्तान के फील्ड मार्शल मुनीर कैसे बने मध्यस्थ, भारत की डिप्लोमेसी कहां चूकी?

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Pakistan Back-channel Diplomacy
US-Iran War Mediation: पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच छिड़े पूर्ण युद्ध में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल  आसिम मुनीर ने खुद को प्रमुख मध्यस्थ (lead mediator) के रूप में स्थापित कर लिया है। कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थाओं की रिपोर्टों के अनुसार, मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर सीधी बात की और इस्लामाबाद को युद्धविराम वार्ता का केंद्र बनाने का प्रस्ताव रखा। 
 
इसी बीच, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से 23 मार्च को बात की। पाकिस्तान अब बैक-चैनल डिप्लोमेसी चला रहा है, जिसमें अमेरिकी दूत स्टीव विटकोफ और जारेड कुश्नर जैसे व्यक्तियों से संदेशों का  आदान-प्रदान हो रहा है। तुर्की और मिस्र भी इस प्रक्रिया में शामिल हैं। यह कोई अचानक हुई घटना नहीं है। पाकिस्तान की  मध्यस्थ भूमिका की सफलता के पीछे व्यावहारिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक कारण हैं।

मुनीर की मध्यस्थता की सफलता

पहला कारण – भौगोलिक और सैन्य निकटता : पाकिस्तान और ईरान की 900 किलोमीटर से अधिक साझा सीमा है। दोनों देशों  के बीच सैन्य-खुफिया संबंध गहरे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि युद्ध के पहले फील्ड मार्शल मुनीर ने ईरान का दौरा किया था और  ईरानी सैन्य प्रमुख मेजर जनरल मोहम्मद बागेरी से मुलाकात की। पाक-ईरान संबंध 1979 की ईरानी क्रांति के बाद भी बरकरार  रहे, भले ही कभी-कभी तनाव (जैसे 2024 में बलूचिस्तान सीमा पर झड़प) भी रहा, लेकिन दोनों ने तुरंत डी-एस्केलेशन किया।
 
दूसरा कारण – अमेरिका में ईरान के हितों का प्रतिनिधित्व : 1980 के दशक से पाकिस्तान के वॉशिंगटन स्थित दूतावास में ईरान का “इंटरेस्ट्स सेक्शन” चलता है, क्योंकि ईरान-अमेरिका में सीधे राजनयिक संबंध नहीं हैं। यह ऐतिहासिक व्यवस्था आज  मुनीर को बैक-चैनल का मजबूत आधार दे रही है।
 
तीसरा कारण – ट्रंप प्रशासन के साथ व्यक्तिगत और रणनीतिक संबंध : मुनीर ने 2025 में ट्रंप से दो बार मुलाकात की (जून  और सितंबर)। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि “पाकिस्तान ईरान को अच्छी तरह जानता है, जितना कोई और नहीं”। 2025  में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान ट्रंप ने मुनीर को “नोबेल पीस प्राइज” के लिए नामांकित करने तक की बात कही थी। यह  “personal chemistry” आज काम आ रही है। 
 
ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो पाकिस्तान ने पहले भी मध्यस्थता की भूमिका निभाई है। 2019 में प्रधानमंत्री इमरान खान ने सऊदी अरब और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी। 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी-ईरान rapprochement  हुआ, जिसमें पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई। वॉर ऑन द रॉक्स और एशिया टाइम्स जैसी पत्रिकाओं ने 2019 में ही लिखा था कि पाकिस्तान “मिसिंग पीस” (गुम टुकड़ा) हो सकता है US-Iran वार्ता में। 
आज मुनीर ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है – “geography + military leverage + Trump  rapport” का कॉम्बिनेशन। पाकिस्तान अब तुर्की-मिस्र के साथ “strategic synergy” बना रहा है। मुनीर  की यह चाल “deep state” कूटनीति का क्लासिक उदाहरण है, जहां पाकिस्तानी सेना सिविल सरकार से आगे निकलकर विदेश नीति चला रही है। लेकिन यह जोखिम भरी भी है – पाकिस्तान में शिया विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं और आर्थिक संकट (IMF बेलआउट पर निर्भरता) बना हुआ है। फिर भी कूटनीतिक रूप से यह मुनीर की बड़ी जीत है।

भारत की डिप्लोमेसी कहां चूकी? 

भारत की कूटनीति इस पूरे घटनाक्रम में पूरी तरह अनुपस्थित रही – यह एक रणनीतिक विफलता है। द डिप्लोमैट वेबसाइट ने  इसे “strategic setback” और “diplomatic failure” बताया गया है। 
 
ऐतिहासिक संदर्भ : भारत की पश्चिम एशिया नीति हमेशा “संतुलित तटस्थता” (balanced neutrality) पर टिकी रही। नेहरू काल से लेकर अटल सरकार तक में भारत ने फिलिस्तीन का समर्थन किया, ईरान के साथ ऊर्जा और कनेक्टिविटी (चाबहार बंदरगाह) संबंध बनाए रखे। 1992 में इजराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद भी भारत ने  “multi-alignment” का रास्ता अपनाया – न US-इजरायल ब्लॉक का पूर्ण साथी, न ईरान का। ईरान से तेल आयात किया (2010 के दशक में भारत ईरान का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार था) और सऊदी-अरब के साथ भी संतुलन बनाए रखा।
 
मोदी सरकार में यह संतुलन बिगड़ा। भारत ने इजराइल के साथ रक्षा साझेदारी को “fatherland” स्तर तक बढ़ाया (UAVs, missiles, intelligence sharing)। I2U2 (India-Israel-UAE- USA) जैसे प्लेटफॉर्म बने। अमेरिका के साथ QUAD और Indo-Pacific फोकस ने ईरान को हाशिए पर धकेला।  CAATSA (अमेरिकी प्रतिबंध कानून) के डर से ईरान से तेल आयात लगभग बंद हो गया। मिडिल ईस्ट आई और यूरेशिया  रिव्यू ने इसे “great inversion” (बड़ा उलटफेर) कहा – भारत अब “pro-Israel tilt” वाला देश बन गया। 
 
ईरान के सुप्रीम लीडर अयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या (फरवरी 2026) पर भारत ने अपेक्षित निंदा नहीं की। द डिप्लोमैट की  रिपोर्ट के अनुसार भारतीय राजनयिकों को शुरू में ईरानी दूतावास में condolence book साइन करने से रोका गया। बाद में डेमेज कंट्रोल के तौर पर विदेश सचिव विक्रम मिसरी गए – यह “optics-heavy” डिप्लोमेसी का प्रमाण है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध के बजाय संवाद से समस्या के समाधान पर जोर दिया और ईरान सहित खाड़ी देशों के राष्ट्र प्रमुखों से बात भी की।  
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परिणामस्वरूप क्षेत्रीय प्रभाव का ह्रास : जबकि पाकिस्तान मध्यस्थ बन गया, भारत “Vishwaguru” की छवि के बावजूद गायब रहा। अमेरिका ने मुनीर को चुना, मोदी को नहीं।
 
बहुपक्षीय अवसरों का नुकसान : भारत के पास ईरान (चाबहार, INSTC) और अमेरिका-इजराइल दोनों से अच्छे संबंध थे, लेकिन “tilt” ने credibility खो दी।
 
युद्ध के कारण भारत में LPG सिलेंडर की कमी और पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीं। ईरान हमारा पारंपरिक ऊर्जा साझेदार था,  लेकिन अब खाड़ी के रास्ते तेल आपूर्ति बाधित है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इस पर तीखा प्रहार कर इसे “severe  setback” बताया। 
 
भारत की कूटनीति “पर्सनल केमेस्ट्री” (Modi-Trump, Modi-Netanyahu) पर निर्भर होकर संस्थागत और क्षेत्रीय संतुलन भूल गई। जबकि पाकिस्तान ने “geography + history + opportunity” का फायदा उठाया, भारत ने “multi-alignment” की अपनी पुरानी ताकत खो दी। पाकिस्तान की यह चाल जोखिम भरी है, लेकिन कूटनीतिक रूप से स्मार्ट। मुनीर ने “neutrality with  leverage” का फॉर्मूला अपनाया। 
 
भारत के लिए सबक साफ है : पश्चिम एशिया में वापसी के लिए तुरंत संतुलित नीति अपनानी होगी। ईरान के साथ चाबहार और  ऊर्जा प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देनी होगी। इजराइल के साथ रक्षा संबंध बनाए रखें, लेकिन “tilt” न करें। क्षेत्रीय मध्यस्थता में  सक्रिय भूमिका निभाएं – जैसा कि अतीत में भारत ने UN में फिलिस्तीन मुद्दे पर किया।
 
कूटनीति में “optics” से आगे “substance-based diplomacy” ही स्थायी शक्ति देती है। भारत  अगर जल्दी नहीं जागा, तो पाकिस्तान जैसा पड़ोसी न केवल मध्यस्थ बनेगा, बल्कि क्षेत्रीय narrative भी अपने पक्ष में  मोड़ लेगा। समय आ गया है कि नई दिल्ली ऐतिहासिक संतुलन को फिर से स्थापित करे – नहीं तो ऊर्जा संकट और कूटनीतिक अलगाव दोनों का सामना करना पड़ेगा।

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