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पर उपदेश कुशल बहुतेरे : पहले सत्ताधीश अपने घर में सादगी लागू करे

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Narendra Modi
देश इस समय वैश्विक तेल संकट, कमजोर होते रुपए और लगातार बढ़ती महंगाई की चुनौती से जूझ रहा है। ऐसे दौर में सत्ता पक्ष की ओर से जनता को लगातार 'संयम' और 'किफायत' के उपदेश दिए जा रहे हैं— कम यात्रा करें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाएं, कार पूलिंग करें, अनावश्यक खर्च टालें, सोना खरीदने से बचें, विदेश यात्राएं टालें। संदेश ऐसा दिया जा रहा है मानो देश की आर्थिक चुनौतियों के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार आम नागरिक ही हो। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या ये उपदेश देने वाले स्वयं उन पर अमल कर रहे हैं?
 
जो मंत्री, सांसद और बड़े नेता दर्जनों लग्जरी गाड़ियों के काफिलों में चलते हैं, भारी-भरकम रोड शो या आए दिन इवेंट करते हों, जिनकी सुरक्षा और प्रोटोकॉल के नाम पर रोज़ाना हजारों लीटर ईंधन खर्च होता है, क्या उन्होंने अपने उपभोग में कोई कटौती की? जिन नेताओं के बच्चे ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, LSE और जॉर्जटाउन जैसे विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, क्या वे भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा दिखाते हुए उन्हें वापस बुलाने को तैयार हैं? जो जनता को विदेशी यात्रा टालने की सलाह देते हैं, क्या वे खुद सरकारी या निजी विदेशी दौरों में कटौती करेंगे? और जो लोग आम नागरिक को सोना खरीदने से रोकने की बात करते हैं, क्या सत्ता और राजनीतिक अभिजात्य वर्ग अपने निवेश और वैभव में भी वही संयम दिखाएंगे?
 
यही वह दोहरा मापदंड है जो जनता को सबसे अधिक खटकता है। “मैं करूं तो आवश्यकता, तुम करो तो फिजूलखर्ची” — यह राजनीति अब लंबे समय तक स्वीकार नहीं की जाएगी।

भोपाल का रोड शो : उपदेश और आचरण के बीच की दूरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनता से पेट्रोल-डीजल के संयमित उपयोग की अपील के तुरंत बाद मध्य प्रदेश में BJP नेता सौभाग्य सिंह ठाकुर ने उज्जैन से भोपाल तक सैकड़ों गाड़ियों के विशाल काफिले के साथ रोड शो निकाला। कई रिपोर्टों के अनुसार इसमें करीब 200 से ज्यादा वाहन शामिल थे। परिणामस्वरूप भोपाल बाइपास सहित कई इलाकों में लंबा ट्रैफिक जाम लगा।
 
देश इस समय वैश्विक तेल संकट, कमजोर होते रुपए और लगातार बढ़ती महंगाई की चुनौती से जूझ रहा है। ऐसे दौर में सत्ता पक्ष की ओर से जनता को लगातार 'संयम' और 'किफायत' के उपदेश दिए जा रहे हैं— कम यात्रा करें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाएं, कार पूलिंग करें, अनावश्यक खर्च टालें, सोना खरीदने से बचें, विदेश यात्राएं टालें।
यह दृश्य उस समय सामने आया जब आम नागरिकों से ईंधन बचाने, गैर-जरूरी यात्राएं टालने और खर्च सीमित करने की अपील की जा रही थी। सवाल इसलिए उठे, क्योंकि सत्ता के करीबी लोगों के लिए प्रदर्शन और शक्ति प्रदर्शन की राजनीति जारी रहती है, जबकि आम आदमी को त्याग और संयम का पाठ पढ़ाया जाता है।

आंकड़े क्या बताते हैं?

तथ्य बताते हैं कि भारत की ऊर्जा स्थिति वर्षों में अधिक जटिल हुई है—
  • 2014 में भारत की कच्चे तेल पर आयात निर्भरता लगभग 77.6% थी, जो 2026 तक बढ़कर करीब 88-89% पहुंच चुकी है। 
  • घरेलू कच्चा तेल उत्पादन 2014-15 के लगभग 37.8 मिलियन मीट्रिक टन से घटकर 2025-26 में करीब 28 मिलियन मीट्रिक टन रह गया।
  • 2014-16 के दौरान जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऐतिहासिक रूप से नीचे थीं, तब सरकार ने एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर भारी राजस्व अर्जित किया, लेकिन उसका पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचा।
  • आज देश में पेट्रोल की कीमतें कई शहरों में 95 से 107 रुपए प्रति लीटर के बीच बनी हुई हैं।
  • रुपया 2014 के लगभग 61-63 रुपए प्रति डॉलर के स्तर से गिरकर 2026 में 94-95 रुपए प्रति डॉलर तक पहुंच गया है।
  • सोने का आयात भारत के चालू खाते के घाटे पर अतिरिक्त दबाव डालता है, लेकिन इसके पीछे आम परिवारों की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की मानसिकता भी जुड़ी होती है। ऐसे में केवल 'सोना मत खरीदो' कहना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
 
यानी समस्या केवल वैश्विक परिस्थितियों की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक ऊर्जा नीति और आर्थिक प्रबंधन की भी है।

नीति की जगह 'नैतिक सलाह'

जब भी तेल महंगा होता है, रुपया कमजोर पड़ता है या चालू खाते पर दबाव बढ़ता है, तब सरकार की ओर से अक्सर समाधान की बजाय “व्यवहार बदलने” की सलाह दी जाती है। कभी कहा जाता है कम घूमिए, कभी विदेश यात्राएं टालिए, कभी सोना खरीदने से बचिए। लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या सरकार की भूमिका केवल सलाह देने तक सीमित रह गई है?
 
शिवसेना (UBT) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी इसी पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार की जिम्मेदारी नीतिगत समाधान देना है, न कि केवल जनता को किफायत का पाठ पढ़ाना।
 
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी ‘X’ पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह स्थिति सरकार की नीतिगत विफलताओं को दर्शाती है। उनके अनुसार, यदि हर संकट का बोझ अंततः जनता पर ही डाला जाएगा, तो जवाबदेही का अर्थ ही समाप्त हो जाएगा।

असली सवाल : जब तेल सस्ता था तब क्या किया गया?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब वैश्विक बाजार में तेल सस्ता था, तब उस अवसर का उपयोग दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए कितना किया गया?
  • क्या घरेलू तेल और गैस अन्वेषण में पर्याप्त निवेश हुआ?
  • क्या वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को उतनी प्राथमिकता मिली, जितनी राजनीतिक अभियानों को?
  • क्या रणनीतिक तेल भंडारण और आयात विविधीकरण पर दूरदर्शी काम हुआ?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक होते, तो आज स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती कि सरकार को जनता से “कम घूमो, विदेश यात्राएं टालो, सोना मत खरीदो” जैसी अपीलें करनी पड़ें।

दोहरे मापदंड पर जनता की नाराजगी

आम नागरिक को पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने, यात्रा कम करने और खर्च घटाने की सलाह दी जाती है, जबकि वीआईपी संस्कृति पहले की तरह जारी है। बड़े काफिले, अनावश्यक हेलीकॉप्टर यात्राएं, विदेशी दौरों का वैभव, सरकारी खर्च पर सुविधाएं और सत्ता का दिखावटी प्रदर्शन— ये सब उस “सादगी” के विपरीत हैं जिसका उपदेश जनता को दिया जाता है। लोकतंत्र में उपदेश तभी प्रभावी होते हैं जब सत्ता स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करे।
 
यदि मंत्री-सांसद वास्तव में चाहते हैं कि जनता ईंधन बचाए, विदेशी मुद्रा की बचत करे और आत्मनिर्भरता अपनाए, तो उन्हें खुद भी सादगी अपनानी होगी—
 
काफिले छोटे करने होंगे, अनावश्यक विदेशी यात्राएं कम करनी होंगी, सरकारी खर्च रोकना होगा, और भारतीय संस्थानों पर वही भरोसा दिखाना होगा जिसकी अपेक्षा वे आम नागरिकों से करते हैं।

जनता अब जवाब मांग रही है

“विश्व गुरु” और “अमृत काल” जैसे बड़े दावों के बीच जब आम आदमी महंगाई, ईंधन कीमतों और कमजोर आय से जूझ रहा हो, तब केवल नैतिक भाषण पर्याप्त नहीं होते। जनता अब उपदेश नहीं, जवाबदेही चाहती है।
 
यदि देश वास्तव में आत्मनिर्भरता और सादगी की ओर बढ़ना चाहता है, तो इसकी शुरुआत सत्ता के गलियारों से होनी चाहिए, न कि केवल मध्यमवर्ग और आम नागरिकों की जेब से।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
 

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