Publish Date: Mon, 18 May 2026 (12:29 IST)
Updated Date: Mon, 18 May 2026 (12:46 IST)
हाल ही में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने नागरिकों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और ऊर्जा बचाने की अपील की। सामान्य तौर पर इसे ईंधन बचत अभियान के रूप में देखा गया, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ इसे एक बड़ी चेतावनी मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या भारत की ऊर्जा नीति में पिछले एक दशक की चूक अब देश के लिए गंभीर आर्थिक और रणनीतिक खतरा बनती जा रही है?
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भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, लेकिन घरेलू उत्पादन लगातार घट रहा है और आयात पर निर्भरता रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच चुकी है। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में युद्ध, समुद्री तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर संकट गहराता जा रहा है, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पहले से कहीं अधिक कमजोर दिखाई दे रही है।
ऊर्जा संगम से आत्मनिर्भरता का सपना
वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने “ऊर्जा संगम” अभियान की शुरुआत की थी। इसी दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने एलपीजी सब्सिडी छोड़ने की अपील करते हुए “गिव इट अप” अभियान भी चलाया। उस समय सरकार का लक्ष्य स्पष्ट था—
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तेल आयात पर निर्भरता कम करना
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घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन बढ़ाना
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अपस्ट्रीम सेक्टर में निवेश बढ़ाना
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ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाना
उस समय भारत लगभग 78 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता था जबकि करीब 22 प्रतिशत घरेलू उत्पादन से जरूरत पूरी होती थी। लक्ष्य था कि अगले वर्षों में आयात निर्भरता को लगभग 10 प्रतिशत कम किया जाए। लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट निकली। आज भारत की तेल आयात निर्भरता बढ़कर लगभग 88 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। घरेलू उत्पादन लगातार गिरा है और कई पुराने तेल क्षेत्रों से उत्पादन कम हो गया है। इसका अर्थ यह है कि भारत वैश्विक बाजार के झटकों के प्रति पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हो गया है।
क्यों विफल हुआ घरेलू उत्पादन बढ़ाने का प्रयास?
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण रहे—
1. अपर्याप्त अन्वेषण और ड्रिलिंग : भारत में नए तेल एवं गैस क्षेत्रों की खोज की गति बेहद धीमी रही। निजी निवेश आकर्षित करने के प्रयास हुए, लेकिन नीतिगत जटिलताओं और मंजूरी प्रक्रियाओं के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
2. अपस्ट्रीम सेक्टर में सुस्ती : अपस्ट्रीम सेक्टर यानी तेल-गैस खोज और उत्पादन में निवेश पर्याप्त स्तर तक नहीं बढ़ पाया। कई परियोजनाएँ पर्यावरणीय अनुमति, लागत और नीति अस्थिरता के कारण अटकती रहीं।
3. रणनीतिक भंडारण की कमी : भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बनाए जरूर, लेकिन उनका आकार चीन जैसे देशों की तुलना में बेहद सीमित रहा।
भारत के लिए खतरा कितना बड़ा है?
ऊर्जा संकट केवल पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं होता। इसका असर पूरे आर्थिक ढाँचे पर पड़ता है।
1. महंगाई में विस्फोट
भारत अपनी अधिकांश ऊर्जा जरूरतें आयात से पूरी करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाता है, तो—
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परिवहन महंगा होगा
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खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी
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उद्योगों की लागत बढ़ेगी
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आम जनता पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा
2. चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ने का खतरा
तेल आयात पर अधिक खर्च से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। इससे रुपये की कमजोरी और आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।
3. भू-राजनीतिक जोखिम
यदि पश्चिम एशिया में युद्ध या होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे मार्गों में व्यवधान आता है, तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है।
क्या केवल नवीकरणीय ऊर्जा समाधान है?
भारत ने पिछले वर्षों में सौर ऊर्जा क्षमता तेजी से बढ़ाई है। देश दुनिया के सबसे बड़े सोलर बाजारों में शामिल हो चुका है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सोलर और विंड से तत्काल समाधान संभव नहीं है। क्योंकि—
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परिवहन क्षेत्र अब भी तेल पर निर्भर है
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भारी उद्योगों में गैस और कोयले की जरूरत बनी हुई है
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बैटरी स्टोरेज तकनीक अभी महंगी है
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इलेक्ट्रिक वाहन संक्रमण की गति सीमित है
अब भारत को क्या करना होगा?
घरेलू अन्वेषण को युद्धस्तर पर बढ़ाना: विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपतटीय (Offshore) और गहरे समुद्री क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा।
रणनीतिक भंडार बढ़ाना: भारत के मौजूदा रणनीतिक तेल भंडार सीमित अवधि की जरूरतें ही पूरी कर सकते हैं। इन्हें कई गुना बढ़ाने की जरूरत है।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को तेज करना: ईवी इंफ्रास्ट्रक्चर, बैटरी निर्माण और चार्जिंग नेटवर्क में तेज निवेश आवश्यक होगा।
सौर और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की शुरुआत की है, लेकिन इसे चीन जैसी औद्योगिक गति देने की जरूरत होगी।
2047 का सपना और ऊर्जा आत्मनिर्भरता
भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखता है। लेकिन किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी शर्त ऊर्जा सुरक्षा होती है। यदि देश की ऊर्जा जरूरतें विदेशी बाजारों और भू-राजनीतिक संकटों पर निर्भर रहेंगी, तो आर्थिक स्थिरता बनाए रखना कठिन होगा।
ऊर्जा क्षेत्र के विश्लेषकों का मानना है कि पिछले वर्षों की नीतिगत सुस्ती अब गंभीर चुनौती बन सकती है। यदि अभी भी घरेलू उत्पादन, रणनीतिक भंडारण और नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में “ऊर्जा संकट” केवल आशंका नहीं बल्कि वास्तविकता बन सकता है।
भारत के सामने अब विकल्प स्पष्ट है— या तो ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ और कठिन फैसले लिए जाएँ, या फिर हर वैश्विक संकट के साथ बढ़ती आर्थिक असुरक्षा का सामना किया जाए।
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