Akhilesh supports Avimukteshwaranand Saraswati: प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। घटना के बाद स्वामीजी अपने शिविर के बाहर आमरण अनशन पर बैठ गए। इसके जवाब में प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने 20 जनवरी को एक नोटिस चस्पा किया, जिसने विवाद को और भड़का दिया। इस बीच सपा नेता अखिलेश यादव ने एक बार फिर शकंराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन करते हुए कहा कि सत्ता जब अधर्म करने लगे वही कलयुग है।
उन्होंने कहा कि यहां तक कि जिन कनिष्ठ कर्मचारियों को भाजपा सरकार साधु-संतों के अपमान का ये निकृष्ट कुकृत्य करने के लिए बाध्य कर रही है वो भी इस पाप को करना नहीं चाहते हैं और अंदर से डरे हुए हैं। उनके बीच भी एक अंदरूनी आक्रोश जन्म ले चुका है लेकिन नौकरी की मजबूरी की वजह से वो बाहरी तौर पर शांत हैं। भाजपा के समर्थक तक शर्मिंदा हैं! भाजपा जब सनातन की सगी नहीं है, तो बाक़ी किसी और की क्या होगी।
क्या है मामला
विवाद तब शुरू हुआ जब 18 जनवरी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों के साथ मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान के लिए जा रहे थे। मेला अधिकारियों का कहना है कि स्वामीजी के समर्थकों ने पालकी (चतुष्पद) ले जाने के लिए प्रतिबंधित बैरिकेड्स तोड़े और बिना अनुमति के वीआईपी मार्ग का उपयोग किया। अविमुक्तेश्वरानंदजी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें संगम जाने से रोका और उनके दंडी संन्यासी शिष्यों व बटुक ब्राह्मणों के साथ अभद्रता की। करीब 15 शिष्य घायल हुए और उनकी 'शिखा' (चोटी) तक खींची गई।
नोटिस से बढ़ा विवाद
इस घटना के बाद मेला प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट के 2022 के एक आदेश का हवाला देते हुए पूछा कि अविमुक्तेश्वरानंद अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' शब्द का प्रयोग कैसे कर रहे हैं, जबकि ज्योतिष्पीठ का मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है। स्वामीजी के वकीलों ने 8 पन्नों का जवाब दाखिल करते हुए कहा कि उनका 'पट्टाभिषेक' कोर्ट के रोक संबंधी आदेश से पहले ही (12 अक्टूबर 2022) हो चुका था। उन्होंने इस नोटिस को 'करोड़ों हिन्दुओं की आस्था का अपमान' बताया है।
edited by : Nrapendra Gupta