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मौलाना मदनी के विवादित बयान पर भड़के भाजपा नेता संबित पात्रा, जमकर लगाई लताड़

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वेबदुनिया न्यूज डेस्क

नई दिल्ली , शनिवार, 29 नवंबर 2025 (15:44 IST)
Sambit Patra on Maulana Madani Controversial Statement : जमीयत उलेमा-ए-हिंद की राष्ट्रीय शासी निकाय की बैठक में इसके अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि देश के मौजूदा हालात बहुत संवेदनशील और चिंताजनक हैं। मुसलमान सड़कों पर चलते हुए भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर भी सवाल उठाए। भाजपा नेता संबित पात्रा ने बयान पर आपत्ति लेते हुए कहा कि वह न केवल भड़काऊ बयान है अपितु देश को विभाजन की ओर ले जाने की उनकी कुचेष्टा है। ALSO READ: मौलाना मदनी के बिगड़े बोल, सुप्रीम कोर्ट पर उठाए सवाल, वंदे मातरम पर भी विवादित टिप्पणी

भाजपा सांसद संबित पात्रा ने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी ने आज भोपाल में एक बड़ी बैठक में जिस प्रकार का बयान दिया है, वह न केवल भड़काऊ है अपितु देश को विभाजन की ओर ले जाने की उनकी कुचेष्टा है। उनका कहना कि 'जिहाद' होना चाहिए, 'जब-जब जुल्म होगा जिहाद होगा', मुझे लगता है कि ये काफी अनुचित वाक्य है।
 
उन्होंने कहा कि जिहाद के नाम पर जिस प्रकार से लोगों ने भारतवर्ष और भारतवर्ष के बाहर आतंक फैलाया है वो भी हमने देखा है तो स्वाभाविक रूप से ये कहना कि भारत में जिहाद होगा, यह बहुत ही गैर जिम्मेदाराना बयान है।
 
भाजपा नेता ने कहा कि उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के दबाव में काम करता है और इस देश में उसे 'सुप्रीम' कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। मेरा मानना ​​है कि सुप्रीम कोर्ट को खुद से संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि इससे कोर्ट की हैसियत कम होती है।

इससे पहले मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि दुख की बात है कि एक खास समुदाय को जबरदस्ती निशाना बनाया जा रहा है, दूसरे समुदाय कानूनी तौर पर बेबस, सामाजिक रूप से अलग-थलग और आर्थिक रूप से बेइज्जत किए जाते हैं। बुलडोज़र एक्शन, मॉब लिंचिंग, वक्फ संपत्ति पर कब्ज़ा और धार्मिक मदरसों और सुधारों के खिलाफ नेगेटिव कैंपेन चलाए जा रहे हैं, ताकि उनके धर्म, पहचान और वजूद को कमज़ोर किया जा सके। इससे मुसलमान सड़कों पर चलते हुए भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

मौलाना मदनी ने मुस्लिमों से जुड़े कई मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की भी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद का फैसला हो या तीन तलाक का, इन फैसलों के बाद ऐसा लग रहा है कि अदालतें सरकार के दबाव में काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों के हनन की ऐसी मिसालें सामने आई हैं, जिन्होंने अदालतों के किरदार पर ही  सवालिया निशान लगा दिया है।
 
उन्होंने कहा कि वरशिप एक्ट को नजरअंदाज कर ज्ञानवापी और मथुरा के मुकदमों को कोर्ट में सुनने लायक बताया गया है। मदनी यहीं नहीं रुके। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट तब तक ही सुप्रीम कहलाने का हकदार है जब तक कि वह संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे। यदि वह ऐसा न करे तो फिर वह 'सुप्रीम' कहलाने का हकदार नहीं है।
edited by : Nrapendra Gupta

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