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भारत-अमेरिका ट्रेड डील के विरोध में फिर आंदोलन की राह पर संयुक्त किसान मोर्चा, बोले राकेश टिकैत, बर्बाद होगा किसान, कॉरपोरेट का होगा कब्जा

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विकास सिंह

, बुधवार, 4 फ़रवरी 2026 (10:42 IST)
भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर देश मेंं सियासी संग्राम छिड़ हुआ है। विपक्ष का आरोप हैं कि इस ट्रेड डील से भारतीय किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। किसानों के संगठन संयुक्त किसान मोर्चा ने भी ट्रेड डील के विऱोध में फिर आंदोलन शुरु करने का एलान किया है। मोर्चा का कहना है कि इस ट्रेड डील से सोयाबीन, मक्का, कपास और दूध उत्पाद सबसे ज्यादा प्रभावित होंगी और देश के करोड़ों किसानों के सामने आजीविका पर संकट आ जाएगा। संयुक्त किसान मोर्चा ने ट्रेड डील के विरोध में गांव-गांव आंदोलन करने 12 फरवरी को हड़ताल का आव्हान किया है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर किसान नेता राकेश टिकैत ने कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने कहा कि देश की 70 फीसदी आबादी पर यह सरकार का अब तक का सबसे बड़ा प्रहार है। पहले से बाजार की अस्थिरता कर्ज का बोझ झेल रहा ग्रामीण वर्ग अब बर्बाद हो जाएगा सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश पर अब कॉरपोरेट का कब्जा होगा। उन्होंने मांग की है कि सरकार तत्काल प्रभाव से इस समझौते को रद्द करें।

राकेश टिकैत कहते है कि इस समझौते से छोटे किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। अमेरिकी कृषि को भारी सरकारी सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत का किसान लागत, कर्ज और अनिश्चित बाज़ार से पहले ही जूझ रहा है अब सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पाद भारत आएंगे तो देशी फसलों के दाम गिरेंगे, MSPकमजोर होगी और सबसे बड़ा नुकसान छोटे व सीमांत किसानों को होगा यह डील आयात निर्भरता, कॉरपोरेट नियंत्रण और किसान की सौदेबाज़ी शक्ति को कमजोर करने की दिशा में कदम है इससे न केवल किसानों की आमदनी प्रभावित होगी, बल्कि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी खतरा बढ़ेगा। 

अमेरिकी ट्रेड डील से भारत के किसान होंगे तबाह-संयुक्त किसान मोर्चा का आरोप हैं कि अमेरिका के दबाव में झुकते हुए अमेरिकी वस्तुओं पर शून्य प्रतिशत आयात शुल्क की अनुमति देकर मोदी सरकार ने किसानों के साथ विश्वासघात किया है और वह इसकी कड़ी निंदा की है। किसान संगठनों का दावा हैं कि विदेशी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार खुलने से कृषि उत्पादों के दाम गिर सकते हैं और स्थानीय किसानों को सीधा नुकसान पहुंचेगा. पहले से कर्ज और महंगाई की मार झेल रहे ग्रामीण इलाकों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना हैं कि 15 अगस्त 2025 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि “किसानों के हितों की रक्षा के लिए वे व्यक्तिगत रूप से भारी कीमत चुकाने को तैयार हैं।” आज वही प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फरमानों के आगे शर्मनाक ढंग से झुकते हुए शून्य आयात कर स्वीकार कर रहे हैं, ताकि अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाज़ार में बेरोकटोक आ सकें।

अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त अमेरिकी कृषि उत्पादों से भारतीय बाज़ार को भर देने वाला यह व्यापार समझौता  भारत के  सारे किसानों के परिवारों को तबाह कर देगा। 2024 के हालिया सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका में केवल 18.8 लाख किसान हैं, जबकि 2015 की कृषि जनगणना के अनुसार भारत में 14.65 करोड़ परिचालित जोतें हैं। भारत की 48% कार्यबल और 65% आबादी कृषि एवं सहायक क्षेत्रों पर निर्भर है।

अमेरिकी कृषि सचिव ब्रूक रोलिन्स के अनुसार, इस समझौते के तहत अमेरिका “भारत के विशाल बाज़ार में अधिक अमेरिकी कृषि उत्पाद निर्यात करेगा, जिससे कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीण अमेरिका में नक़दी पहुँचेगी,” जिससे भारत के साथ अमेरिका के 1.3 अरब डॉलर के कृषि व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिलेगी। जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रक्षा कर रहे हैं, वहीं भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने के लिए आत्मसमर्पण करना अत्यंत शर्मनाक है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने आज से 11 फ़रवरी तक गाँव-गाँव मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अभियान चलाने, नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रम्प दोनों के पुतले जलाने तथा 12 फ़रवरी को आम हड़ताल को सफल बनाने के लिए तहसील और शहरी केंद्रों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करने की अपील की है।

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