Publish Date: Tue, 17 Feb 2026 (13:46 IST)
Updated Date: Tue, 17 Feb 2026 (13:49 IST)
Supreme Court on AI: कल्पना कीजिए, एक वकील अदालत में बड़ी मजबूती से दलील देता है, एक पुराने केस का हवाला देता है, लेकिन जब जज साहब रिकॉर्ड खंगालते हैं तो पता चलता है कि वैसा कोई केस इतिहास में कभी हुआ ही नहीं! जी हां, एआई (AI) के दौर में अब भारतीय अदालतों में कुछ ऐसा ही 'मायाजाल' बुना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों की इस 'शॉर्टकट' वाली आदत पर कड़ी नाराजगी जताई है।
सीजेआई सूर्यकांत ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चर्चा का विषय बना हुआ है, लेकिन अपनी काबिलियत के लिए नहीं, बल्कि अपनी 'गप्पों' के लिए। सीजेआई सूर्यकांत (CJI Surya Kant) और जस्टिस बीवी नागरत्न ने वकीलों द्वारा याचिकाओं के ड्राफ्ट तैयार करने के लिए AI के अंधाधुंध इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं।
ऐसे केस का उदाहरण, जिसका वजूद ही नहीं
जस्टिस नागरत्ना ने एक चौंकाने वाला उदाहरण देते हुए बताया कि एक वकील ने 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' नामक केस का हवाला दिया, जबकि हकीकत में ऐसा कोई केस कभी वजूद में था ही नहीं। इतना ही नहीं, सीजेआई ने बताया कि जस्टिस दीपांकर दत्ता के सामने भी ऐसे ही फर्जी उदाहरण पेश किए गए।
AI की जानकारी को क्रॉस चेक अवश्य करें
विशेषज्ञों का मानना है कि AI मुकदमों के बोझ को कम करने और कानूनी रिसर्च को तेज करने में मददगार साबित हो सकता है, लेकिन यह 'न्यायिक तर्क' (Judicial Reasoning) का विकल्प नहीं है। जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए एआई को सिर्फ एक टूल की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। AI सिर्फ एक सहायक हो सकता है। बिना क्रॉस-चेक किए AI द्वारा दी गई जानकारी को सीधे कोर्ट में पेश नहीं करना चाहिए।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala