Shankaracharya Avimukteshwaranand : धर्मनगरी प्रयागराज में गरमाई राजनीति, शंकराचार्य का आमरण अनशन और प्रशासन का नोटिस, क्या है पूरा मामला?
प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या स्नान के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच विवाद गहरा गया है। प्राधिकरण के नोटिस के बाद कांग्रेस-भाजपा में जुबानी जंग तेज है। धर्मनगरी के तनावपूर्ण हालात की पूरी रिपोर्ट।
अविमुक्तेश्वरानंद vs प्रशासन : प्रयागराज मेले में तनाव बरकरार : माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। मौनी अमावस्या (18 जनवरी 2026) को संगम स्नान के दौरान शुरू हुआ यह विवाद अब कानूनी और राजनीतिक रंग ले चुका है। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और भाजपा के नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। घटना के बाद स्वामीजी अपने शिविर के बाहर आमरण अनशन पर बैठ गए। इसके जवाब में प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने 20 जनवरी को एक नोटिस चस्पा किया, जिसने विवाद को और भड़का दिया। प्रयागराज में इस समय स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है। अब देखना होगा कि विवाद कब तक शांत होता है लेकिन फिलहाल धर्म नगरी के माघ मेला में राजनीति गरमाई हुई है।
कैसे हुई विवाद की शुरुआत
विवाद तब शुरू हुआ जब 18 जनवरी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों के साथ मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान के लिए जा रहे थे। मेला अधिकारियों का कहना है कि स्वामीजी के समर्थकों ने पालकी (चतुष्पद) ले जाने के लिए प्रतिबंधित बैरिकेड्स तोड़े और बिना अनुमति के वीआईपी मार्ग का उपयोग किया। अविमुक्तेश्वरानंदजी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें संगम जाने से रोका और उनके दंडी सन्यासी शिष्यों व बटुक ब्राह्मणों के साथ अभद्रता की। करीब 15 शिष्य घायल हुए और उनकी 'शिखा' (चोटी) तक खींची गई।
नोटिस में क्या कहा गया
मेला प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट के 2022 के एक आदेश का हवाला देते हुए पूछा कि अविमुक्तेश्वरानंद अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' शब्द का प्रयोग कैसे कर रहे हैं, जबकि ज्योतिष्पीठ का मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है।
नोटिस में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि उस आवेदन के साथ गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य की ओर से कथित तौर पर एक जाली और मनगढ़ंत आवेदन भी लगाया गया था। इसके जरिए अदालत के सामने यह गलत बात रखी गई कि उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति को अस्वीकार कर दिया है। मामले की सुनवाई 14 अक्टूबर 2022 को हुई थी। उस समय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धार्मिक अनुष्ठान में व्यस्त होने के कारण अदालत में पक्ष नहीं रख पाए।
अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला प्रशासन को भेजा नोटिस
स्वामीजी के वकीलों ने 8 पन्नों का जवाब दाखिल करते हुए कहा कि उनका 'पट्टाभिषेक' कोर्ट के रोक संबंधी आदेश से पहले ही (12 अक्टूबर 2022) हो चुका था। उन्होंने इस नोटिस को 'करोड़ों हिन्दुओं की आस्था का अपमान' बताया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अब उत्तरप्रदेश सरकार और मेला प्रशासन को कानूनी नोटिस भेजकर 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया है और माफी की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भाजपा 'गौ-माता' को राष्ट्रमाता घोषित कर दे, तो वे अपना मुंह अपने आप बंद कर लेंगे।
क्या था मेला प्रशासन का तर्क
मेला अधिकारी दयानंद प्रसाद ने कहा कि भारी भीड़ (मौनी अमावस्या) के कारण सुरक्षा कारणों से पालकी और वाहनों को प्रतिबंधित किया गया था। भगदड़ जैसी स्थिति को रोकने के लिए प्रशासन ने दखल दिया। प्रशासन ने आधिकारिक रूप से नोटिस जारी कर कहा कि सुप्रीम कोर्ट में ज्योतिष्पीठ का मामला लंबित होने के कारण 'शंकराचार्य' उपाधि का उपयोग आदेशों का उल्लंघन है।
उमाशंकर से अविमुक्तेश्वरानंद
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के पट्टी तहसील स्थित ब्राह्मणपुर गांव में जन्मे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दीक्षा लेने से पहले नाम उमाशंकर उपाध्याय था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 2006 में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद से दीक्षा ली थी। वह ज्योतिष पीठ के 46वें शंकराचार्य हैं।
उन्होंने वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने 1994 में छात्र संघ चुनाव में जीत भी हासिल की थी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 2024 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी से पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक उम्मीदवार का समर्थन भी किया था। वर्ष 2008 में उन्होंने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के लिए अनशन किया था।
विवादों से है पुराना नाता
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का विवादों से पुराना नाता रहा है। अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन के समय उन्होंने शास्त्र सम्मत विधि का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था- अधूरे मंदिर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा करना शास्त्रों के विरुद्ध है। जब मंदिर पूरी तरह निर्मित नहीं हुआ, तो उसकी प्रतिष्ठा करना 'उचित नहीं' है। उनका तर्क था कि शिखर के बिना मंदिर का शरीर अधूरा है और ऐसे में वहां देवता की प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने गोरक्षा का मुद्दे भी उठाया था। उन्होंने कहा था- गो माता की रक्षा के लिए हम मर जाएंगे या मार देंगे। आजादी के 75 साल बाद भी गायों का कटना बंद नहीं हुआ, यह हमारे लिए कलंक है। उन्होंने केदारनाथ से जुड़ा मुद्दा भी उठाया था।
क्या बोले कांग्रेस और संत समाज
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए इसे 'धर्मद्रोह' करार दिया। कांग्रेस उत्तरप्रदेश सरकार पर हमलावर हो गई। पार्टी ने इसे BJP का धर्मद्रोह और साधुओं का अपमान करना बताया। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि स्वामी को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि उन्होंने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा, केदारनाथ में '228 किलो सोने की चोरी' और COVID में गंगा में शवों पर सवाल उठाए थे।
जगतगुरु रामभद्राचार्य ने प्रशासन का बचाव करते हुए कहा कि नियमों का पालन सभी को करना चाहिए और जुलूस के रूप में संगम तक जाने की जिद गलत थी। वहीं, द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद ने शिष्यों के साथ हुई मारपीट पर कड़ा ऐतराज जताया है।
मिला अखिलेश यादव का साथ
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर लंबी बातचीत की और प्रशासन के व्यवहार की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने जिस तरह से संतों के साथ व्यवहार किया, वह निंदनीय है। किसी भी हिन्दू का संगम में स्नान करना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, उसे इससे वंचित करना असंवैधानिक है। अखिलेश ने स्वामी जी से कहा कि ये बहुत खराब लोग हैं (सत्ता पक्ष की ओर इशारा करते हुए), वाराणसी में भी इन्होंने मंदिर तोड़े। हम आपके साथ हैं और जल्द ही आपसे आकर मुलाकात करेंगे। Edited by : Sudhir Sharma