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होर्मुज़ संकट: दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग बंद, भारत की बढ़ी टेंशन!

ग्लोबल ऑयल मार्केट पर 'होर्मुज़' की मार: 50% बढ़ा बीमा प्रीमियम, रूट डाइवर्जन से $130 तक जा सकता है क्रूड

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Strait of Hormuz
होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) महज़ एक संकरा समुद्री रास्ता नहीं है—यह आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था की 'धड़कती नस' है। दुनिया के समुद्री तेल और LNG प्रवाह का लगभग 20-25% इसी रास्ते से गुज़रता है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने चेतावनी दी है कि यहां से गुजरने वाले जहाजों को आग लगा देंगे। हालिया भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर अमेरिका-इज़राइल की कार्रवाई और ईरान की प्रतिक्रिया ने इस मार्ग की संवेदनशीलता को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया है।

1. 'बीमा-शॉक': जब कागज़ की एक शर्त ने जहाज़ों को रोक दिया
इस संकट में सबसे बड़ा प्रहार 'युद्ध-जोखिम बीमा' (War-risk Insurance) के रूप में सामने आया है। जैसे ही तनाव बढ़ा, बीमा कंपनियों (Underwriters) ने कवरेज रद्द करना या प्रीमियम को आसमान पर पहुँचाना शुरू कर दिया।

प्रीमियम में उछाल: रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध-जोखिम प्रीमियम सामान्य 0.2% से बढ़कर 0.5% या उससे अधिक हो गया है।

लाखों डॉलर की लागत: एक विशाल तेल टैंकर (VLCC) के लिए एक एकल यात्रा की बीमा लागत अब लाखों डॉलर बढ़ गई है। जब बीमा पॉलिसी उपलब्ध नहीं होती, तो जहाज़ी ऑपरेटरों के लिए जोखिम लेना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता है।

2. रूट-डाइवर्जन: बीच समंदर से लौटते जहाज़
शिपिंग डेटा (Kpler और Lloyd’s List) के अनुसार, कई बड़े जहाज़ों जैसे KHK Empress और Universal Victor ने होर्मुज़ में प्रवेश करने से पहले ही अपना रास्ता बदल लिया या यात्रा स्थगित कर दी। जापानी दिग्गज NYK और Mitsui OSK के साथ-साथ Hapag-Lloyd ने भी अपने बेड़े को इस क्षेत्र से बचने के निर्देश दिए हैं।

3. पाइपलाइन्स: क्या कोई वैकल्पिक रास्ता है?
होर्मुज़ के विकल्प मौजूद तो हैं, लेकिन वे पूरे वैश्विक प्रवाह को संभालने में सक्षम नहीं हैं:

Habshan-Fujairah (UAE): क्षमता 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd)।

East-West Petroline (Saudi Arabia): क्षमता ~5 मिलियन bpd।

चुनौती: विश्व का कुल प्रवाह लगभग 20 मिलियन bpd है, जिसे ये पाइपलाइनें पूरी तरह कवर नहीं कर सकतीं।

4. वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतें
बाज़ार विश्लेषकों (JP Morgan, Goldman Sachs) ने चेतावनी दी है कि यदि संकट गहराया, तो कच्चे तेल की कीमतें $120–130 प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं। इसका सीधा असर होगा:

महँगाई: हवाई किराए, माल ढुलाई और खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि।

केंद्रीय बैंकों पर दबाव: मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में बदलाव की मजबूरी।

5. इंडिया-इम्पैक्ट: भारत के लिए खतरे की घंटी
भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है।

आपूर्ति संकट: भारत का आधे से अधिक कच्चा तेल और भारी मात्रा में LNG इसी मार्ग से आती है।

आर्थिक बोझ: तेल की कीमतों में $1 की वृद्धि भी भारत के आयात बिल और 'चालू खाता घाटे' (CAD) पर बुरा असर डालती है। पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें घरेलू बाज़ार में आग लगा सकती हैं।

आगे की राह: क्या होनी चाहिए नीति?
रणनीतिक भंडार (SPR): भारत को अपने सामरिक तेल भंडारों का उपयोग करने और आपूर्ति के स्रोतों (रूस, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका) में विविधता लाने की ज़रूरत है।

बीमा संवाद: सरकारों को बीमा क्षेत्र के साथ मिलकर 'पब्लिक-प्रॉक्सी कवर' जैसे विकल्पों पर विचार करना चाहिए ताकि शिपिंग न रुके।

कूटनीति: तनाव कम करने के लिए बहुपक्षीय बातचीत ही एकमात्र स्थायी समाधान है।

होर्मुज़ का संकट यह याद दिलाता है कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा कितनी नाज़ुक है। जब तक विकल्प सीमित हैं, यह 'संकरा रास्ता' पूरी दुनिया की जेब और शांति को प्रभावित करता रहेगा।
Edited By: Naveen R Rangiyal

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