Publish Date: Fri, 13 Feb 2026 (17:45 IST)
Updated Date: Fri, 13 Feb 2026 (17:54 IST)
कूटनीति का मूल सिद्धांत भावनाओं या व्यक्तियों पर नहीं,बल्कि राष्ट्रीय हित और यथार्थवाद पर आधारित होता है। विदेश नीति भी इसी सिद्धांत से संचालित होती है। बांग्लादेश में बीएनपी के सत्ता में आने के बाद भारत की नीति का केंद्र अवामी लीग से हटकर स्वाभाविक रूप से नई निर्वाचित सरकार के साथ संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में स्थानांतरित होगा। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ऐतिहासिक विजय के साथ सत्ता में आई है और तारिक रहमान देश के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे है।
मोहम्मद युनूस के अंतरिम सरकार का दौर भारत के लिए बहुत खराब और पाकिस्तान के लिए मुफीद रहा है। लेकिन सत्ता बदलते से भारत की उम्मीदें बेहतर हुई है। तारिक रहमान के पिता और बीएनपी के संस्थापक जिया-उर-रहमान ने 1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश की स्वतंत्रता का समर्थन किया था और स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई थी। तारिक रहमान भी बांग्ला अस्मिता और राष्ट्रीय पहचान की बात करते हैं,यह भारत के लिए यह एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। भारत की प्राथमिकता हमेशा एक स्थिर,संप्रभु और अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने वाले बांग्लादेश की रही है। यदि बीएनपी नेतृत्व बांग्लादेश की संप्रभुता,लोकतांत्रिक संस्थाओं और क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देता है,तो भारत के साथ संबंध व्यावहारिक और संतुलित आधार पर आगे बढ़ सकते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसा रुख पाकिस्तान की पारंपरिक अपेक्षाओं से मेल न खाए। भारत के लिए बेहतर संदेश वही है जिसमें बांग्लादेश अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ स्थिर और सहयोगी पड़ोसी बना रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बीएनपी नेता तारिक रहमान को फोन कर बधाई देना भारत की यथार्थवादी कूटनीति का संकेत है। बांग्लादेश के आम चुनावों में बीएनपी को स्पष्ट बहुमत मिलना नई राजनीतिक परिस्थिति की ओर इशारा करता है। ऐसे में भारत के हितों की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि नई सरकार के साथ द्विपक्षीय संबंध किस दिशा में आगे बढ़ेंगे।
भारत के लिए बांग्लादेश पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा,कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास से सीधे जुड़ा हुआ साझेदार है। सीमा प्रबंधन,आतंकवाद-निरोध,अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण और बंगाल की खाड़ी में सामरिक संतुलन जैसे मुद्दे भारत की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में शांति,प्रगति और समृद्धि के लिए भारत की प्रतिबद्धता दोहराकर स्पष्ट किया है कि नई सरकार के साथ भी सहयोग की नीति जारी रहेगी। बीएनपी की जीत और जमात-ए-इस्लामी की उल्लेखनीय उपस्थिति भारत के लिए एक सावधानीपूर्ण कूटनीतिक संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। भारत चाहेगा कि बांग्लादेश की नई सरकार धर्मनिरपेक्ष ढांचे,लोकतांत्रिक संस्थाओं और क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत बनाए रखे।
भारत के हित इसी में हैं कि ढाका के साथ संवाद,विश्वास और व्यावहारिक सहयोग का सिलसिला निर्बाध जारी रहे। बीएनपी के चुनावी घोषणा पत्र में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा,धार्मिक स्वतंत्रता और समावेशी समाज के निर्माण पर विशेष जोर दिया गया था। यह रुख बांग्लादेश की उस ऐतिहासिक चेतना से जुड़ा है,जिसने भाषा,संस्कृति और बहुलतावाद के आधार पर अपनी राष्ट्रीय पहचान गढ़ी। यदि मतदाताओं ने बड़े बहुमत से बीएनपी को समर्थन दिया और कट्टरपंथी विकल्पों को सीमित किया तो इसे एक ऐसे जनादेश के रूप में देखा जा सकता है जिसमें स्थिरता,विकास और सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दी गई है।
युनूस के कार्यकाल में हिन्दुओं पर अत्यचारों से दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। बांग्लादेश में बीएनपी द्वारा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का स्पष्ट वादा केवल घरेलू राजनीति का मुद्दा नहीं,बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति से भी जुड़ा है। भारत के लिए यह विशेष महत्व रखता है,क्योंकि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और पारिवारिक संबंध गहरे हैं। यदि ढाका की नई सरकार समावेशी शासन और विधि के शासन को मजबूत करती है,तो सीमा पार तनाव,अविश्वास और सामाजिक असुरक्षा की आशंकाएँ स्वाभाविक रूप से कम होंगी। इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में विश्वास का वातावरण मजबूत होगा।
बांग्लादेश के मतदाताओं ने जमात-ए-इस्लामी जैसे दलों को सीमित समर्थन देकर संतुलित राजनीति को प्राथमिकता दी है। भारत के लिए यह स्थिति उम्मीदें बढ़ाने वाली है,क्योंकि वह अपने पड़ोस में शांति,बहुलतावाद और सहयोग को ही दीर्घकालिक स्थिरता का आधार मानता है। ऐसा जनादेश क्षेत्रीय स्तर पर भी संकेत देता है कि बांग्लादेश अपनी स्वतंत्र राष्ट्रीय दिशा तय करने में सक्षम है। यह संदेश पाकिस्तान,तुर्की सऊदी अरब और उन सभी के लिए पर्याप्त है जो जमात-ए-इस्लाम का समर्थन करके दक्षिण एशिया को वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर ले जाना चाहते थे। बहरहाल तारिक रहमान के नेतृत्व में भारत की नीति अवामी लीग-केंद्रित छवि से आगे बढ़कर बांग्लादेश-केंद्रित और हित-आधारित कूटनीति की दिशा में परिवर्तित हो सकती है। यही भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के अनुकूल भी होगा।