भारतीय सेना के जवान जहां हिमालय की बर्फीली चोटियों पर दुश्मन की नजर रखते हैं, वहां कई बार मशीनें और वाहन फेल हो जाते हैं। लेकिन प्रकृति ने ऐसे 'साइलेंट वॉरियर' दिए हैं जो बिना शोर किए, बिना ईंधन के, चुपचाप सीमा की रक्षा में मदद करते हैं। ये हैं बैक्ट्रियन ऊंट (Bactrian Camel) – दो कूबड़ वाले ऊंट, जो लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान में भारतीय सेना के सबसे भरोसेमंद साथी बन चुके हैं।
बैक्ट्रियन ऊंट कौन हैं?
बैक्ट्रियन ऊंट (वैज्ञानिक नाम: Camelus bactrianus) मुख्य रूप से मध्य एशिया, मंगोलिया और चीन के ठंडे इलाकों में पाए जाते हैं। सामान्य एक कूबड़ वाले ऊंट (ड्रोमेडरी) गर्म रेगिस्तान के लिए बने हैं, लेकिन बैक्ट्रियन ऊंट ठंड सहन करने में माहिर हैं। इनके दो कूबड़ होते हैं, जो वसा जमा करके ऊर्जा प्रदान करते हैं। इनकी मोटी फर ठंड से बचाती है, पैर बर्फ में नहीं धंसते और ये- 40 डिग्री सेल्सियस तक की तापमान में आराम से जीवित रह सकते हैं।
लद्दाख में ये ऊंट स्वाभाविक रूप से पाए जाते हैं और अब भारतीय सेना ने इन्हें औपचारिक रूप से शामिल कर लिया है। 2023 से ट्रायल शुरू हुए थे और 2025 में डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च (DIHAR) ने सेना को 14 प्रशिक्षित बैक्ट्रियन ऊंट सौंपे।
माइनस 40 डिग्री में इनकी भूमिका क्या है?
पूर्वी लद्दाख, गलवान घाटी, LAC (लाइन ऑफ एक्टुअल कंट्रोल) और सियाचिन जैसे इलाकों में जहां तापमान -40°C तक गिर जाता है, वहां पहियों वाले वाहन फंस जाते हैं, म्यूल (खच्चर) भी 50-60 किलो से ज्यादा नहीं ढो पाते। लेकिन एक बैक्ट्रियन ऊंट आसानी से 200-250 किलोग्राम तक का सामान ढो सकता है।
- रसद पहुंचाना: गोला-बारूद, खाना, दवाइयां, संचार उपकरण और अन्य जरूरी सामग्री को दूर-दराज के पोस्ट तक पहुंचाना।
- पैट्रोलिंग: ये ऊंट बिना शोर किए चलते हैं, इसलिए इलेक्ट्रॉनिक जामर से प्रभावित नहीं होते और ड्रोन जैसी तकनीक फेल होने पर भी काम करते हैं।
- लास्ट माइल कनेक्टिविटी: जहां सड़क खत्म हो जाती है, वहां ये 'ऑर्गेनिक ट्रक' की तरह काम करते हैं।
- ऊंचाई सहनशक्ति: 15,000 से 17,000 फीट की ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन में भी सक्रिय रहते हैं।
ये 'साइलेंट वॉरियर' इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि इनके कदमों से कोई आवाज नहीं होती, जिससे दुश्मन को पता नहीं चलता।
2026 गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार चमके
जनवरी 2026 में गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय सेना की रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर (RVC) ने पहली बार पशु-दल को शामिल किया। इस दल में दो बैक्ट्रियन ऊंट सबसे आगे थे। इनके साथ जांस्कर टट्टू, प्रशिक्षित रैप्टर्स (शिकारी पक्षी) और आर्मी डॉग्स भी शामिल थे। ये परेड सेना की कोल्ड डेजर्ट रणनीति और पशुओं की भूमिका को दुनिया के सामने लाने का ऐतिहासिक क्षण था।
क्यों हैं ये सेना के लिए अनमोल?
- पारंपरिक खच्चर से 4-5 गुना ज्यादा वजन ढोते हैं।
- कम पानी और चारे में लंबी दूरी तय कर लेते हैं।
- बर्फ, रेत और ढलानों पर आसानी से चलते हैं।
- रखरखाव कम, कोई ईंधन नहीं चाहिए।
- पर्यावरण के अनुकूल और स्थानीय रूप से उपलब्ध।
भारतीय सेना ने इन ऊंटों को कस्टम हैनेस और लोड फ्रेम के साथ तैयार किया है, जिससे ये और प्रभावी हो गए हैं। ये सिर्फ जानवर नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा में चुपचाप योगदान देने वाले सच्चे योद्धा हैं।
अगली बार जब आप लद्दाख की बर्फीली वादियों की तस्वीरें देखें या सीमा पर हमारे जवानों की बहादुरी सुनें, तो याद रखिए – वहां सिर्फ इंसान ही नहीं, बैक्ट्रियन ऊंट भी 24x7 देश की रक्षा में लगे हैं। ये साइलेंट वॉरियर हमें सिखाते हैं कि ताकत हमेशा शोर में नहीं, बल्कि चुपचाप सहनशक्ति और समर्पण में होती है।