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ट्रेनें ‘संवैधानिक’ जगह हैं, यहां कोई कंट्रोवर्सी नहीं, सिवाए मेरी गफलत और नाकारापन के

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train crowd
दिनभर की थकान. सुस्‍ती. आलस्‍य— और एक निजी चिंता के बीच मैं नागपुर रेलवे स्‍टेशन से रात साढ़े 10 बजे रायपुर-सिकंदराबाद ट्रेन में चढ़ा. मुझे सेवाग्राम जाना था. एक घंटे का रास्‍ता था. इसलिए लोकल टिकट खरीदा.

संविधान में भले ही हर नागरिक के लिए समानता और गरिमा की बात दर्ज हो— लेकिन देश की किसी भी रेल के लोकल कंपार्टमेंट में लोकल लोगों के लिए जगह नहीं है. वहां बच्‍चे झूला बांधकर सोते हैं. अधेड़ दुबककर सहमे हुए टॉयलेट के दरवाजों से टिक जाते हैं. जो भरी जवानी में हैं वे हर मुसाफिर को अपने ऊपर से गुजर कर निकलने का हक दे देते हैं. जो लोग अपने शहर में जरा-सा हाथ लगने पर गुर्राने लगते हैं— वे ट्रेनों में अपने ऊपर गिरती हुई सब्‍जी-भाजी, कचरा, टिशु पेपर, छींक, खांसी, खंकार, डकार सब इत्‍मीनान से बर्दाश्‍त कर उनका स्‍वागत करते हैं. कहीं कोई असहमति और कंट्रोवर्सी नहीं. संविधान के मूल्‍यों की सबसे बड़ी इबारतें ट्रेनों में लिखी नजर आती हैं. ट्रेनें ‘संवैधानिक’ जगह हैं. यहां कोई कंट्रोवर्सी नहीं है, सिवाए मेरी गफलत और नाकारापन के.

कमाल, देखिए कि ट्रेन ही वो जगह है— जहां दुनिया का सबसे बड़ा इल्‍म होता है कि नींद से बड़ा संसार में कुछ  भी नहीं— और एक इंच जगह कितनी (ज्‍यादा) जगह होती है. यह एक दूसरी बात है कि हम अपने शहरों में जमीन के हर उस कतरे पर अतिक्रमण कर लेते हैं जो हमारी नहीं है. सरकार की है या पड़ोसी की है.

बहरहाल, मैं ट्रेनों में कई बार टॉयलेट के पास बैठा हूं— लेकिन नींद का मारा नहीं हूं. लेकिन नींद एक धोखेबाज सुख है. एक झपकी कैसे आ गई मैं नहीं जानता. मुझे सेवाग्राम उतरना था, मैं वरोरा स्‍टेशन में जागा. चंद्रपुर के पास वरोरा है. सेवाग्राम से एक घंटा की दूरी पर. सोचा था सेवाग्राम में महात्‍मा गांधी के आश्रम में इत्‍मीनान की नींद सोऊंगा, लेकिन मेरी औघट घाटी प्रवृत्‍ति ने मुझे नाकारा और निकम्‍मा बना डाला. वरोरा में रात को 1 बजे उतरा. चंद्रपुर या सुबह सीधे सिकंदराबाद उतरने से अच्‍छा है बापू के वर्धा के आसपास ही कहीं रात गुजार लूं.

मुझे मोबाइल में ट्रेनों के शेड्यूल देखना भी नहीं आता. किसी ने मदद की और बताया 2 बजे नवजीवन रेल है, यह वर्धा में रूकेगी. वहां से ऑटो लेकर बापू के आश्रम चले जाना. ऐसा ही हुआ. मैं 3 बजे वर्धा उतरा. 4 बजे सेवाग्राम आश्रम का गेट जोर-जोर से पीट रहा था. चौकीदार ने आते ही गालियां दीं कि गेट खुला है— क्‍यों बजा रहे हो. बस सांकल ही तो लपेट रखी है. मैंने कहा— मुझे रात में कुछ दिखता नहीं. वर्धा अगर ड्राय शहर नहीं होता तो मैं सारे गम गलत करता. लेकिन सारी थकान और उकुलाहट गांधी के आश्रम में उतर गई. तीन दिन संविधान को समझने की कोशिश, जिसे मैं पिछली रात रेल के लोकल डिब्‍बे में देखकर आ रहा था. संवैधानिक मूल्‍यों पर बहस, विमर्श, चिंतन. बापू कुटी की शालीनता. महात्‍मा की आत्‍मा का उजाला. आश्रम का स्‍नेह भरा वातावरण. सभी साथियों, वरिष्‍ठों, मेंटर्स की आत्‍मीय मुस्‍कान और मार्गदर्शन. विकास संवाद सत्र के तीन दिन. संविधान के मूल्‍यों को सीखने की पहली पाठशाला. जहां से मैं संविधान का पहला पाठ सीखकर आ रहा हूं. देखता हूं कितना सफल होता.
विकास संवाद की मैत्री फैलोशिप के दौरान सेवाग्राम आश्रम को लेकर नवीन रांगियाल की अनुभूति रिपोर्ट।

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