Publish Date: Mon, 11 May 2026 (13:10 IST)
Updated Date: Mon, 11 May 2026 (13:16 IST)
vijay rahul gandhi brotherhood: तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में खंडित जनादेश के बाद कांग्रेस द्वारा तमिलगा वेट्री कझगम (टीवीके) और अभिनेता-राजनेता विजय को समर्थन देने का फैसला राजनीतिक गलियारों में बहुतों के लिए चौंकाने वाला नहीं था। कांग्रेस के भीतर भी इसे केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि लंबे समय से विकसित होते वैचारिक और व्यक्तिगत समीकरण के रूप में देखा जा रहा है।
2009 : जब पहली बार मिले राहुल और विजय
2009 का दौर भारतीय राजनीति और तमिल सिनेमा—दोनों के लिए महत्वपूर्ण था। केंद्र में कांग्रेस दूसरी बार सत्ता में लौटी थी और राहुल गांधी युवा कांग्रेस तथा एनएसयूआई को संगठनात्मक रूप से मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे। दूसरी ओर विजय तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में शामिल हो चुके थे। “इलैया थलपति” की लोकप्रिय छवि, विशाल फैन क्लब नेटवर्क और सामाजिक मुद्दों पर मुखर बयान उन्हें केवल अभिनेता तक सीमित नहीं रखते थे।
कांग्रेस से जुड़े कई नेताओं के अनुसार, अगस्त 2009 में दिल्ली में राहुल गांधी और विजय की पहली मुलाकात हुई। यह बैठक तत्कालीन एनएसयूआई राष्ट्रीय सचिव गोपीनाथ पलनीयप्पन की पहल पर आयोजित की गई थी। विजय अपने पिता और फिल्म निर्देशक एसए चंद्रशेखर के साथ दिल्ली पहुंचे थे, जिनका झुकाव लंबे समय से कांग्रेस की विचारधारा की ओर माना जाता रहा है।
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, उस समय राहुल गांधी ने विजय को तमिलनाडु युवा कांग्रेस में बड़ी भूमिका देने की संभावना पर भी चर्चा की थी। हालांकि सितंबर 2009 में कोयंबटूर में दोनों के एक साझा कार्यक्रम की योजना अंतिम समय में टल गई। इसके बाद विजय ने कांग्रेस में शामिल होने की अटकलों से सार्वजनिक रूप से इनकार किया, लेकिन राजनीति में आने की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया।
वैचारिक समानताएं कैसे बनीं रिश्ते की आधारशिला
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी और विजय के रिश्ते की सबसे बड़ी वजह केवल व्यक्तिगत समीकरण नहीं, बल्कि वैचारिक निकटता रही। उस समय एनएसयूआई से जुड़ी रहीं कांग्रेस नेता रागिनी नायक ने कई मौकों पर कहा कि विजय धर्मनिरपेक्ष राजनीति और सामाजिक न्याय के मुद्दों को लेकर स्पष्ट सोच रखते थे।
2009 में श्रीलंकाई तमिलों के समर्थन में विजय द्वारा चेन्नई में किया गया उपवास भी उनके राजनीतिक रुझान का शुरुआती संकेत माना जाता है। विजय ने तब कहा था कि तमिल समुदाय के संकट पर वे 'मूकदर्शक' नहीं रह सकते।
विजय सार्वजनिक रूप से जिन नेताओं और सामाजिक विचारकों का उल्लेख अपने प्रेरणास्रोतों के रूप में करते रहे हैं, उनमें के. कामराज, पेरियार, डॉ. बीआर अंबेडकर और वेलु नचियार जैसे नाम शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कामराज की विरासत और सामाजिक न्याय की राजनीति ने विजय को कांग्रेस की वैचारिक धारा के अपेक्षाकृत करीब रखा।
संपर्क कभी पूरी तरह टूटा नहीं
राजनीतिक रूप से दोनों अलग-अलग रास्तों पर जरूर रहे, लेकिन संपर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, 2024 में विजय द्वारा टीवीके लॉन्च किए जाने के बाद राहुल गांधी ने उन्हें फोन कर शुभकामनाएं दी थीं। विजय ने भी कई मौकों पर राहुल गांधी के प्रति सार्वजनिक सम्मान जताया।
हालिया तमिलनाडु चुनावों में टीवीके के उभरने और पार्टी के शुरुआती प्रदर्शन के बाद दोनों नेताओं के बीच फिर बातचीत हुई। कांग्रेस के भीतर यह धारणा मजबूत हुई कि तमिलनाडु में भाजपा-विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए विजय एक नए सामाजिक-राजनीतिक केंद्र बन सकते हैं।
कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि 2009 में विजय के कांग्रेस के करीब आने की संभावनाएं इसलिए आगे नहीं बढ़ सकीं क्योंकि उस समय द्रमुक तमिलनाडु में कांग्रेस का प्रमुख सहयोगी था और फिल्म उद्योग पर करुणानिधि परिवार का प्रभाव भी काफी मजबूत माना जाता था। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
2026 का गठबंधन : सिर्फ राजनीति या उससे ज्यादा?
कांग्रेस और टीवीके के बीच बना नया समीकरण केवल सीटों के बंटवारे तक सीमित नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह गठबंधन तमिलनाडु में बदलते विपक्षी समीकरणों और भाजपा के विस्तार को रोकने की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी है।
हालांकि आलोचकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि कांग्रेस तमिलनाडु में अपने कमजोर संगठनात्मक आधार की भरपाई विजय की लोकप्रियता के जरिए करना चाहती है, जबकि विजय राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के समर्थन से राजनीतिक वैधता और स्थिरता हासिल कर सकते हैं।
इसके बावजूद यह साफ है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद अचानक नहीं बना। 2009 में शुरू हुआ संपर्क समय के साथ राजनीतिक भरोसे में बदला और अब चुनावी गठबंधन के रूप में सामने आया है।
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