बेहद लोकप्रिय लेखक और हाल ही में अपनी किताबों के लिए मिलने वाली रॉयल्टी की वजह से चर्चा में आए लेखक, कवि और साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार को निधन हो गया। वे लंबे वक्त से बीमार थे और अस्पताल में इलाज करवा रहे थे।
रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने कहा है कि हिन्दी के शीर्ष कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल का निधन हो गया है। वे पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थे और इसी अस्पताल में भर्ती थे। पिछले ही महीने उन्हें हिन्दी साहित्य के सर्वोच्च सम्मान, ज्ञानपीठ परस्कार से सम्मानित किया गया था।
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में 1 जनवरी 1937 को जन्मे विनोद कुमार शुक्ल करीब नौ दशकों तक हिन्दी साहित्य में ऐसे लेखक के रूप में प्रतिष्ठित रहे, जिनकी कविताएं और उपन्यास भारत के हर कोने तक पहुंची। हाल ही में उन्हें अपनी बेहद लोकप्रिय नॉवेल दीवार में एक खिडकी रहती थी के लिए लाखों रुपए रॉयल्टी मिली थी। उन्होंन खिलेगा तो देखेंगे और नौकर की कमीज जैसे उपन्यास भी लिखे, जो बेहद पंसद किए जाते हैं।
प्रमुख कृतियां (लेखन) : विनोद कुमार शुक्ल को उनके उपन्यासों और कविताओं में 'जादुई यथार्थवाद' जैसी सादगी के लिए जाना जाता है:
उपन्यास: उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास 'नौकर की कमीज' है, जिस पर मशहूर निर्देशक मणिकौल ने फिल्म भी बनाई थी। इसके अलावा 'खिलेगा तो देखेंगे' और 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उनके चर्चित उपन्यास हैं
कविता संग्रह: 'लगभग जयहिंद', 'वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह', और 'सब कुछ होना बचा रहेगा' उनके महत्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं।
लेखन की शैली : सादगी और गहराई: उनकी भाषा बहुत सरल, घरेलू और आम बोलचाल की होती है, लेकिन वह गहरे दार्शनिक अर्थ समेटे रहती है।
बच्चों जैसा कौतुक: उनकी कविताओं में अक्सर एक बच्चे जैसी जिज्ञासा और मासूमियत देखने को मिलती है। वे बहुत छोटी और मामूली चीजों (जैसे मेज, कुर्सी, पेड़) पर भी अद्भुत कविताएं लिखते हैं।
सम्मान और पुरस्कार : उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1999) से नवाजा गया है। हाल ही में उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित 'पेन/नाबोकोव लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड' (2023) से सम्मानित किया गया, जो भारतीय साहित्य के लिए बहुत गौरव की बात है। "उनकी कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कोई हमारे कान में बहुत धीरे से जीवन का कोई बड़ा सच कह रहा हो।"
Edited By: Navin Rangiyal