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भारतीय लोकतंत्र में सत्ता क्यों हमेशा अस्थाई होती है और 'अपराजेय' एक मिथक

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Indian Democracy
Indian Democracy: भारतीय लोकतंत्र की सबसे मौलिक सच्चाई यही है कि सत्ता स्वभावतः क्षणभंगुर है—और कोई भी नेता या दल चिरस्थायी विजेता नहीं हो सकता। Plato के रिपब्लिक में वर्णित ‘दार्शनिक-राजा’ की अवधारणा हो या Niccolò Machiavelli की द प्रिंस में शक्ति-राजनीति का यथार्थवादी विश्लेषण—भारतीय संदर्भ में ये दोनों अधूरे प्रतीत होते हैं। यहाँ अंतिम संप्रभु कोई राजा या शासक नहीं, बल्कि जनता है।
 
भारतीय राजनीतिक इतिहास बार-बार इस सत्य की पुष्टि करता है कि ‘अपराजेयता’ एक निर्मित मिथक है, जो समय, परिस्थितियों और जन-भावना के सामने टिक नहीं पाता।

इंदिरा गांधी से लेकर समकालीन पराजयों तक : इतिहास का आवर्तन

Indira Gandhi, जिन्हें कभी “India is Indira” के नारे से लगभग अविजित माना गया, 1977 में आपातकाल के बाद राज नारायण जैसे अपेक्षाकृत साधारण विपक्षी से पराजित हुईं। यह केवल एक चुनावी हार नहीं थी; यह भारतीय लोकतंत्र के आत्म-संशोधन की पहली बड़ी अभिव्यक्ति थी।
 
इसी प्रकार, Mamata Banerjee ने 2011 में 34 वर्षों से स्थापित वामपंथी वर्चस्व को समाप्त किया और 2026 में स्वयं सत्ता से बाहर हो गईं। यह चक्र —उदय, स्थायित्व और पतन— भारतीय राजनीति का स्थायी पैटर्न है।

नवीन पटनायक: दीर्घकालिक सत्ता की सीमाएँ

Naveen Patnaik का 2000 से 2024 तक का 24 वर्षीय शासन भारतीय राजनीति में स्थायित्व का प्रतीक था। किंतु 2024 के चुनावों में उनकी पराजय यह दर्शाती है कि ‘सुशासन’ की छवि भी समय के साथ क्षीण हो सकती है।
 
यह परिघटना ज्योति बसु की विरासत संभालने वाले बुद्धदेव भट्‍टाचार्य या पवन चामलिंग जैसे मुख्यमंत्रियों के अंत से मेल खाती है—जहाँ विकास और स्थिरता के बावजूद, मतदाता अंततः परिवर्तन को प्राथमिकता देते हैं।
 
राजनीतिक सिद्धांतकार Alexis de Tocqueville ने लोकतंत्र की इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत किया था—जहाँ समानता की आकांक्षा अंततः स्थिर सत्ता संरचनाओं को चुनौती देती है।

अरविंद केजरीवाल: ‘मॉडल राजनीति’ की सीमाएँ

अन्ना हजारे के आंदोलन से निकले Arvind Kejriwal का उदय भारतीय राजनीति में ‘वैकल्पिक मॉडल’ के रूप में हुआ—शिक्षा, स्वास्थ्य और सब्सिडी आधारित शासन। किंतु 2025 में उनकी पराजय यह दर्शाती है कि कोई भी ‘मॉडल’ तब तक ही टिकाऊ है, जब तक उसकी नैतिक और संस्थागत विश्वसनीयता बनी रहे।
 
यह परिघटना Thomas Hobbes की लेविथन में वर्णित वैधता के सिद्धांत की याद दिलाती है—शासन की शक्ति अंततः सामाजिक अनुबंध और जन-सहमति पर आधारित होती है, न कि केवल करिश्माई नेतृत्व या कल्याणकारी योजनाओं पर।
 

ममता बनर्जी और बंगाल का राजनीतिक चक्र

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास स्वयं में एक ‘चक्र’ का उदाहरण है—वामपंथ → तृणमूल → भाजपा।
 
Mamata Banerjee का पतन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि क्षेत्रीय करिश्मा भी स्थायी नहीं होता। इतिहासकार Eric Hobsbawm की ‘इन्वेंटेड ट्रेडिशंस’ की अवधारणा यहाँ प्रासंगिक है—राजनीतिक नेतृत्व अपनी छवि को स्थायी बनाने का प्रयास करता है, किंतु जनता समय-समय पर नई राजनीतिक परंपराएँ गढ़ती है।

मैकियावेलियन क्षण और ‘इनकंबेंसी का लौह नियम’

इन सभी उदाहरणों को यदि सैद्धांतिक रूप से देखें, तो यह Niccolò Machiavelli के fortuna (भाग्य/जन-भावना) और virtù (नेतृत्व कौशल) के द्वंद्व को दर्शाते हैं—जहाँ अंततः जन-भावना नेतृत्व कौशल पर भारी पड़ती है।
 
भारतीय चुनावी इतिहास एक अनौपचारिक ‘लौह नियम’ की ओर संकेत करता है: लगभग 10–20 वर्षों के बाद मतदाता परिवर्तन की ओर झुकते हैं। इसे ‘एंटी-इनकंबेंसी’ मात्र कहना अपर्याप्त है; यह लोकतंत्र की अंतर्निहित गतिशीलता है।

लोकतंत्र का एकमात्र ‘अपराजेय’—मतदाता

2014 में कांग्रेस की पराजय, बंगाल में वामपंथ का पतन और समकालीन क्षेत्रीय नेताओं की हार—सभी एक ही संदेश देते हैं: सत्ता अधिकार नहीं, बल्कि जनता की अस्थायी स्वीकृति है। Aristotle ने मनुष्य को ‘राजनीतिक प्राणी’ कहा था—अर्थात वह अपनी सामूहिक नियति स्वयं निर्धारित करता है। भारतीय लोकतंत्र में यही सत्य बार-बार प्रतिध्वनित होता है।
 
राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है: जो सत्ता को स्थायी मानते हैं, वे इतिहास में विलीन हो जाते हैं; और जो उसे उत्तरदायित्व समझते हैं, वही समय की कसौटी पर टिकते हैं। लोकतंत्र की यही सुंदरता है—और यही उसकी कठोरता भी—कि यहाँ कोई भी अपराजेय नहीं।

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