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राहुल गांधी ने बिछाई 2029 की बिसात: क्‍या कांग्रेस अब ‘हाईकमान मॉडल’ छोड़ क्षेत्रीय चेहरों पर लगाएगी दांव?

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rahul Shivakumar
भारतीय राजनीति में कई बार फैसले चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य की जमीन तैयार करने के लिए लिए जाते हैं। अभी जो हलचल कांग्रेस के भीतर दिखाई दे रही है— कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन, डीके शिवकुमार को आगे बढ़ाने की तैयारी, राजस्थान में सचिन पायलट की भूमिका पर चर्चा, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के साथ तालमेल बनाए रखना, और आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी से संभावित समीकरण— यह सब केवल राज्य स्तरीय राजनीति नहीं है। यह 2029 के लोकसभा चुनाव की शुरुआती पटकथा है।
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यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि कांग्रेस की नई राजनीतिक दिशा का संकेत माना जा रहा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा, बल्कि असली सवाल यह है कि कांग्रेस आखिर किस राजनीतिक मॉडल की ओर बढ़ रही है?

क्या यह पार्टी अब “दिल्ली नियंत्रित कांग्रेस” से “राज्य आधारित कांग्रेस” बनने की तैयारी कर रही है?
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कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या: चेहरों की कमी नहीं, भरोसे की कमी
2014 और 2019 के बाद कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट संगठनात्मक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक था। क्षेत्रीय नेताओं को यह भरोसा नहीं रहा कि दिल्ली उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस देगी।
यही कारण है कि:
•    पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह अलग हुए
•    मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया चले गए
•    महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण जैसे नेता दूरी बनाते गए
•    राजस्थान में सचिन पायलट लगातार असहज रहे


भाजपा ने जहां “मजबूत केंद्रीय नेतृत्व + आक्रामक संगठन” मॉडल बनाया, वहीं कांग्रेस लंबे समय तक “समझौता आधारित राजनीति” में फंसी रही। अब पहली बार ऐसा लग रहा है कि पार्टी समझ चुकी है कि 2029 की लड़ाई दिल्ली से नहीं, राज्यों से जीती जाएगी।

कर्नाटक: सिद्धारमैया से डीके तक, कांग्रेस का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश
D. K. Shivakumar और Siddaramaiah के बीच शक्ति संतुलन सिर्फ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का मामला नहीं था। कर्नाटक आज कांग्रेस के लिए वह प्रयोगशाला बन चुका है जहां पार्टी 2029 का “फेडरल मॉडल” टेस्ट कर रही है।

सिद्धारमैया सामाजिक न्याय और AHINDA राजनीति के प्रतीक रहे हैं, लेकिन कांग्रेस को यह भी समझ में आ रहा है कि सिर्फ कल्याणकारी राजनीति भाजपा की मशीनरी को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है।

डीके शिवकुमार की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
•    आक्रामक संगठन क्षमता
•    संसाधन जुटाने की योग्यता
•    वोक्कालिगा समुदाय पर मजबूत पकड़
•    भाजपा के खिलाफ सड़क से लेकर रणनीति तक लड़ने की क्षमता


यदि डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनते हैं, तो संदेश सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा।
यह पूरे देश के क्षेत्रीय नेताओं के लिए संकेत होगा कि कांग्रेस अब “इंतजार करवाने वाली पार्टी” नहीं रहना चाहती। यह फैसला उन नेताओं के लिए भी संकेत होगा जो वर्षों से पार्टी के भीतर पीढ़ीगत बदलाव की मांग कर रहे हैं।

राजस्थान: सचिन पायलट केवल नेता नहीं, कांग्रेस की पीढ़ीगत परीक्षा हैं
Sachin Pilot को आगे बढ़ाना केवल राजस्थान का निर्णय नहीं होगा। यह कांग्रेस के अंदर “पुरानी बनाम नई राजनीति” की लड़ाई का निष्कर्ष होगा। पायलट की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे:
•    हिंदी बेल्ट में स्वीकार्य युवा चेहरा हैं
•    भाजपा के राष्ट्रवाद के मुकाबले आधुनिक और संतुलित राजनीतिक भाषा बोलते हैं
•    शहरी मध्यवर्ग और ग्रामीण युवाओं दोनों में अपील रखते हैं


कांग्रेस की समस्या यह रही है कि उसने अक्सर लोकप्रिय नेताओं को समय पर अधिकार नहीं दिया। यदि पार्टी 2029 से पहले पायलट को निर्णायक भूमिका देती है, तो वह भाजपा के खिलाफ “युवा बनाम स्थिर सत्ता” का नैरेटिव बना सकती है।

उत्तर प्रदेश: कांग्रेस अब अकेले नहीं लड़ सकती
Akhilesh Yadav के साथ बने रहना कांग्रेस की मजबूरी भी है और रणनीति भी। 2024 के चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती तभी मिल सकती है जब विपक्षी वोट बंटे नहीं।
कांग्रेस अब यह समझ चुकी है कि:

•    यूपी में उसका स्वतंत्र कैडर कमजोर है
•    दलित + मुस्लिम + यादव समीकरण को बिना गठबंधन के चुनौती देना कठिन है
•    राहुल गांधी की यात्राएं नैरेटिव बना सकती हैं, लेकिन सीटें स्थानीय समीकरण दिलाते हैं


यही कारण है कि कांग्रेस अब “बड़े भाई” की राजनीति छोड़कर “साझेदारी मॉडल” की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।

आंध्र प्रदेश: जगन मोहन रेड्डी से समीकरण क्यों महत्वपूर्ण हैं?
Y. S. Jagan Mohan Reddy के साथ संभावित समीकरण केवल सीटों का गणित नहीं है। यह दक्षिण भारत में भाजपा को रोकने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। आंध्र प्रदेश में भाजपा अभी भी स्वतंत्र रूप से मजबूत नहीं है। लेकिन यदि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल अलग-अलग लड़ते रहे, तो भाजपा धीरे-धीरे राजनीतिक स्पेस बना सकती है, जैसा उसने ओडिशा और तेलंगाना में किया।

केरल में वीडी सतीशन: कांग्रेस का नया वैचारिक चेहरा?
V. D. Satheesan को आगे बढ़ाने की चर्चा भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। कांग्रेस अब ऐसे नेताओं की तलाश में है जो भाजपा की वैचारिक राजनीति का जवाब केवल रक्षात्मक सेक्युलरिज्म से नहीं, बल्कि आक्रामक राजनीतिक आत्मविश्वास से दे सकें।

हिंदी बेल्ट में फेरबदल क्यों जरूरी है?
कांग्रेस की सबसे बड़ी विफलता यही रही कि उसने हिंदी पट्टी में संगठन को जीवित नहीं रखा। मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान— इन राज्यों में कांग्रेस का संकट केवल चुनावी नहीं, बल्कि कैडर आधारित है।

भाजपा के पास:
•    बूथ स्तर का संगठन
•    वैचारिक कैडर
•    डिजिटल नैरेटिव मशीनरी
•    संसाधन और चुनावी प्रबंधन


कांग्रेस के पास अभी भी कई राज्यों में केवल “नेताओं की सूची” है, संगठन नहीं। इसलिए यदि आने वाले महीनों में हिंदी बेल्ट में बड़े संगठनात्मक बदलाव होते हैं, तो उनका उद्देश्य केवल पद बांटना नहीं होगा।

असल मकसद होगा:
•    युवा नेतृत्व को जगह देना
•    जातीय समीकरणों को रीसेट करना
•    भाजपा विरोधी सामाजिक गठबंधन तैयार करना
•    और 2029 से पहले पार्टी को “लड़ने योग्य” बनाना


2029 सिर्फ चुनाव नहीं, भारतीय विपक्ष के अस्तित्व की लड़ाई है
भारतीय राजनीति अब उस दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां केवल करिश्मा चुनाव नहीं जिता सकता। संगठन, गठबंधन, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय नेतृत्व— ये सब मिलकर सत्ता तय करेंगे। कांग्रेस आज जो बदलाव करती दिख रही है, वे दरअसल बहुत बड़े संकेत हैं।

कर्नाटक में सिद्धारमैया का इस्तीफा और डीके शिवकुमार का संभावित उदय सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है। यह उस बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है जिसमें कांग्रेस शायद पहली बार यह स्वीकार कर रही है कि 2029 की लड़ाई दिल्ली से नहीं, राज्यों के मजबूत चेहरों और क्षेत्रीय गठबंधनों के सहारे लड़ी जाएगी। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इन संकेतों को रणनीति में बदल पाती है या फिर यह बदलाव भी भारतीय विपक्ष की अधूरी कहानी बनकर रह जाएगा।

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