धार की भोजशाला को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष में अतीत से लेकर अब तक विवाद होता रहा है। हिंदू जहां पूजा के लिए कहते हैं तो वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम नमाज के लिए दबाव बनाते हैं। एक बार फिर बसंत पंचमी उत्सव और शुक्रवार की नमाज साथ साथ एक ही दिन आ रहे हैं। ऐसे में विवाद की आशंका के चलते प्रशासन वहां किसी तरह की लापरवाही नहीं बरतना चाहता है। जिसके मद्देनजर प्रशासन कडे सुरक्षा इंतजामों के साथ अलर्ट मोड में है। जानते हैं भोजशाला के ताजा हालात क्या हैं और क्या है यहां का इतिहास।
दरअसल, इस बार 23 जनवरी (शुक्रवार) को जुमे की नमाज और बसंत पंचमी एक साथ आ रही है। इससे पहले वर्ष 2006, 2013 और 2016 में इस तरह के हालात बने थे और स्थिति तनावपूर्ण बन गई थी।
धार की भोजशाला में शुक्रवार को बसंत पंचमी और नमाज अदा कराने के दौरान टकराव के हालात न बने, इसके लिए तगड़े पुलिस बल का इंतजाम तो हो चुका है, लेकिन मामले का हल खोजने रहे अफसरों को दस साल पहले यानी 2016 में अपनाए गए फार्मूले पर भरोसा है। तब दोनों समाज आमने-सामने नहीं हुए थे और भोजशाला खाली कराने की जरुरत भी नहीं पड़ी थी।
मुस्लिमों ने कहा सांकेतिक होगी नमाज
दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों की तरफ से भी सांकेतिक नमाज का बयान आना भी बता रहा है कि इस बार भी प्रशासन भोजशाला में आने वाले उत्सव समिति के जुलूस को गेट पर नहीं रोकेगा और प्रवेश आसानी से हो जाएगा। कमाल मौला मस्जिद वाले हिस्से के परिसर को टेंट से ढक दिया जाएगा। सांकेतिक नमाज सीमित संख्या में कराई जाएगी, हालांकि पिछली बार इस रणनीति को अफसरों ने सार्वजनिक नहीं किया था, लेकिन इस बार पहले ही मुस्लिम समाज की तरफ से सांकेतिक नमाज का बयान आ गया है।
आखिर क्यों इतनी सुरक्षा व्यवस्था
दरअसल, इस बार 23 जनवरी (शुक्रवार) को जुमे की नमाज और बसंत पंचमी एक साथ आ रही है। इससे पहले वर्ष 2006, 2013 और 2016 में इस तरह के हालात बने और उन सभी मौकों पर क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति रही, हालांकि पिछली बार लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले चलाने की नौबत नहीं आई, क्योंकि सांकेतिक नमाज अदा कराने के कारण दोनों सामुदाय आमने-सामने नहीं हुए थे और नमाज के लिए सीमित संख्या रखे जाने के कारण परिसर भी खाली नहीं कराया गया। सूर्याअस्त से सूर्योदय तक पूजा और हवन वर्ष 2016 में हुए थे, हालांकि प्रशासन सुरक्षा में कोई कसर बाकी नहीं रख रहा है। लगातार इलाकों में फ्लैग मार्च हो रहे है। भोजनशाला के उपरी हिस्से ड्रोन उड़ाने की अनुमति नहीं रहेगी।
क्या है भोजशाला का इतिहास
बता दें कि धार में परमार वंश के राजा भोज ने 1010 से 1055 ईसवीं तक 44 वर्ष शासन किया। उन्होंने 1034 में धार नगर में सरस्वती सदन की स्थापना की। यह एक महाविद्यालय था, जो बाद में भोजशाला के नाम से विख्यात हुआ। राजा भोज के शासन में ही यहां मां सरस्वती या वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की गई। मां वाग्देवी की यह प्रतिमा भोजशाला के समीप खुदाई के दौरान मिली थी। इतिहासकारों की मानें तो यह प्रतिमा 1875 में हुई खुदाई में निकली थी। 1880 में भोपावर का पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इसे अपने साथ लंदन ले गया था
दरगाह का निर्माण
1305 से 1401 के बीच अलाउद्दीन खिलजी तथा दिलावर खां गौरी की सेनाओं से माहलकदेव और गोगादेव ने युद्ध लड़ा। 1401 से 1531 में मालवा में स्वतंत्र सल्तनत की स्थापना। 1456 में महमूद खिलजी ने मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवाया।
दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे
भोजशाला को लेकर हिन्दू और मुस्लिम संगठनों के अपने-अपने दावे हैं। हिन्दू संगठन भोजशाला को राजा भोज कालीन इमारत बताते हुए इस हिन्दू समाज का अधिकार बताते हुए इस सरस्वती का मंदिर मानते हैं। हिन्दुओं का तर्क है कि राजवंश काल में यहां मुस्लिमों को कुछ समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। दूसरी तरफ मुस्लिम समाज का कहना है कि वे वर्षों से यहां नमाज पढ़ते आ रहे हैं, यह जामा मस्जिद है, जिसे भोजशाला-कमाल मौलाना मस्जिद कहते हैं।
इन स्थानों पर है विवाद
वसंत पंचमी को हिन्दू भोजशाला के गर्भगृह में सरस्वतीजी का चित्र रखकर पूजन करते हैं। 1909 में धार रियासत द्वारा 1904 के एशिएंट मोन्यूमेंट एक्ट को लागू कर धार दरबार के गजट जिल्द में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया। बाद में भोजशाला को पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया।
Edited By: Navin Rangiyal