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Shardiya Navratri 2025: शारदीय नवरात्रि सप्तमी की देवी कालरात्रि का रहस्य

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WD Feature Desk

, शुक्रवार, 26 सितम्बर 2025 (11:38 IST)
Shardiya Navratri 2025: चैत्र हो या शारदीय नवरात्रि, दोनों में ही सप्तमी यानी सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा का विशेष विधान है। इस दिन की पूजा के बाद ही कई घरों में नवरात्रि के व्रत का पारण होता है। इस दिन निशा पूजा का भी खास महत्व है। आइए, जानते हैं माँ कालरात्रि के स्वरूप, पूजा विधि, मंत्र और कथा के बारे में।
 
माँ का स्वरूप:-
  1. माँ कालरात्रि, माता कालिका का ही एक रूप हैं। उनका स्वरूप कुछ इस प्रकार है:
  2. त्रिनेत्रधारी: उनके तीन नेत्र हैं।
  3. वाहन: वे गर्दभ (गधे) पर सवार रहती हैं।
  4. चार हाथ: दाहिने हाथ: इनमें वरमुद्रा और अभयमुद्रा हैं, जो भक्तों को आशीर्वाद और सुरक्षा प्रदान करती हैं। बाएँ हाथ में एक लोहे का काँटा और एक खड्ग (तलवार) है।
  5. रंग: उनका रंग गहरा काला है।
 
पूजा विधि, भोग और मंत्र:-
  • पूजा की तैयारी-
  • सप्तमी की सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • लकड़ी के एक पाट (चौकी) पर माँ कालरात्रि का चित्र या मूर्ति स्थापित करें।
  • दीपक और अगरबत्ती जलाकर पूजा शुरू करें।
  • रोली, चावल, नैवेद्य (भोग) सहित षोडशोपचार से पूजा करें।
 
भोग और फूल-
माँ कालरात्रि को गुड़ और चीकू का भोग प्रिय है।
उन्हें रातरानी का फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है।
 
मंत्र और जप-
  1. माँ कालरात्रि का मंत्र है: 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः'।
  2. इस मंत्र का जाप लाल चंदन की माला से करें। यदि यह उपलब्ध न हो, तो रुद्राक्ष की माला का उपयोग किया जा सकता है।
  3. मंत्र जप के बाद दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
  4. अंत में, माँ की आरती करें। आरती के बाद कथा का श्रावण करें...
 
माँ कालरात्रि की कथा-
  • पौराणिक कथा के अनुसार, रक्तबीज नामक एक राक्षस था, जो अपनी शक्तियों से देवता और मनुष्यों को परेशान करता था। उसकी विशेषता यह थी कि उसके रक्त की एक भी बूँद अगर धरती पर गिरती, तो उससे एक और रक्तबीज पैदा हो जाता था। इस समस्या से परेशान होकर सभी देवता भगवान शिव के पास गए। भगवान शिव के अनुरोध पर, माँ पार्वती ने अपने तेज और शक्ति से माँ कालरात्रि को उत्पन्न किया। जब युद्ध में रक्तबीज सामने आया, तो माँ कालरात्रि ने उसका वध करने के साथ ही उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया। इस तरह, रक्तबीज का अंत हुआ और सृष्टि को उसके आतंक से मुक्ति मिली।

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