बाघ का अस्तित्व : मानव सभ्यता के अस्तित्व का पर्याय
2025 के मध्यप्रदेश बाघ संकट पर एक वैज्ञानिक एवं पारिस्थितिक श्वेतपत्र
डॉ. तेज प्रकाश व्यास
वैश्विक वैज्ञानिक एवं मानवतावादी
वैश्विक एंटी-एजिंग वैज्ञानिक एवं वन्यजीव संरक्षक
प्रस्तावना : पृथ्वी की धड़कन
एक वैज्ञानिक के रूप में, जिसने अपना जीवन जैविक क्षय (biological decay) को रोकने और दीर्घायु के रहस्यों को सुलझाने में समर्पित किया है, मैं इस पृथ्वी को संसाधनों के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत और श्वास लेते हुए 'महा-जीव' के रूप में देखता हूं। इस विशाल तंत्र में, बाघ (Panthera tigris) केवल एक शिकारी जीव नहीं है; यह वह 'हृदय' है जो हमारे संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य को नियंत्रित करता है। मध्य प्रदेश से आ रही 2025 की खबरें न केवल विचलित करने वाली हैं, बल्कि वे हमारे अस्तित्व पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
'द फ्री प्रेस जर्नल' की वह रिपोर्ट, जिसमें वर्ष 2025 में 54 बाघों की मृत्यु का विवरण है, केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है; यह हमारी पृथ्वी के लिए एक "एंटी-एजिंग संकट" है। जब किसी परिक्षेत्र का सर्वोच्च संरक्षक इतनी भयावह दर से समाप्त होने लगे, तो समझ लीजिए कि हमारे पर्यावरण के विनाश की घड़ी तेज हो चुकी है।
1. ऐतिहासिक आधारशिला: इंदिरा गांधी और आशा का उदय
2025 के इस संकट की गहराई को समझने के लिए, हमें 1970 के दशक की ओर मुड़ना होगा। उस समय भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा था। हिमालय की तलहटी से लेकर कन्याकुमारी के छोर तक गूंजने वाली बाघ की दहाड़ फीकी पड़ती जा रही थी। 1972 की गणना ने चौंकाने वाला सत्य सामने रखा कि मात्र 1,827 बाघ शेष थे।
अंधकार के उस क्षण में, भारत को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के रूप में एक निडर रक्षक मिला। 1973 में जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से शुरू किया गया 'प्रोजेक्ट टाइगर' एक वैश्विक क्रांति थी। वह संभवतः विश्व की पहली ऐसी राजनेता थीं जिन्होंने यह समझा कि पर्यावरण संरक्षण अमीरों का विलास नहीं, बल्कि एक विकासशील राष्ट्र की अनिवार्य आवश्यकता है।
उनके नेतृत्व में, बाघ को 'राष्ट्रीय पशु' घोषित किया गया। 'प्रोजेक्ट टाइगर' केवल एक बिल्ली के समान दिखने वाले जीव को बचाने का अभियान नहीं था, बल्कि यह "अम्ब्रेला इफेक्ट" (छत्र प्रभाव) का वैज्ञानिक प्रयोग था। बाघ के आवास को बचाकर हमने अनजाने में अपनी नदियों के उद्गम, मिट्टी की उर्वरता और वायु की शुद्धता को सुरक्षित कर लिया। आज यदि भारत विश्व में बाघों का अंतिम गढ़ है, तो वह इंदिरा जी की उसी दूरदर्शिता का परिणाम है।
2. बिट्टू सहगल का दर्शन: बाघ - प्रकृति का रूपक
इस विमर्श को रचते समय, मैं बिट्टू सहगल के उन विचारों को उद्धृत करना आवश्यक समझता हूँ जिन्होंने वन्यजीव चेतना को एक नई दिशा दी। सहगल साहब का मानना है कि "बाघ प्रकृति का रूपक है।" हम बाघ को इसलिए नहीं बचाते कि वह सुंदर या राजसी है; हम उसे इसलिए बचाते हैं क्योंकि वह 'गाया' (Gaia - जीवित पृथ्वी) का रक्षक है।
जब हम एक टाइगर रिजर्व की रक्षा करते हैं, तो हम वास्तव में एक विशाल 'कार्बन सिंक' (Carbon Sink) को सुरक्षित करते हैं। जलवायु परिवर्तन के इस युग में, ये जंगल ही ग्लोबल वार्मिंग के विरुद्ध हमारी सबसे बड़ी ढाल हैं। यदि बाघ लुप्त हुआ, तो जंगल नष्ट होंगे; जंगल नष्ट हुए तो ग्लेशियर पिघलेंगे और नदियां सूख जाएंगी। अंततः मानव सभ्यता का ढांचा, जो इन प्राकृतिक सेवाओं पर टिका है, ढह जाएगा।
3. 2025 का संकट: 54 मृत्युओं का वैज्ञानिक विश्लेषण
मध्य प्रदेश में 2025 के आंकड़े हृदयविदारक हैं। 1973 से अब तक हमने एक ही राज्य में एक वर्ष के भीतर इतनी बड़ी क्षति कभी नहीं देखी।
अप्राकृतिक मृत्यु का जाल: सरकारी आंकड़ों में अक्सर मौतों को 'प्राकृतिक' बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। लेकिन एक वैज्ञानिक के नाते मैं जानता हूँ कि 'क्षेत्रीय संघर्ष' (Territorial Fight) अक्सर आवास विखंडन (Habitat Fragmentation) का परिणाम होता है। जब हम जंगलों के बीच से चौड़े राजमार्ग निकालते हैं, तो हम बाघों की दुनिया को छोटा कर देते हैं। छोटे स्थान में सिमटे बाघ अस्तित्व के लिए आपस में लड़ने को मजबूर हैं। यह 'प्राकृतिक' नहीं, बल्कि 'मानवीय हस्तक्षेप' का परिणाम है।
बिजली का करंट और शिकार: 57% अस्वाभाविक मौतें यह दर्शाती हैं कि आधुनिक तकनीक (जैसे ड्रोन और कॉलर आईडी) के बावजूद शिकारियों का नेटवर्क सक्रिय है। बिजली के तारों का बिछाया जाना हमारी सुरक्षा प्रणालियों की विफलता है।
जैविक क्षरण (Genetic Decay): छोटे और अलग-थलग पड़ चुके जंगलों में बाघों के बीच 'इनब्रीडिंग' का खतरा बढ़ जाता है, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। 'टाइगर कॉरिडोर' का अभाव उनकी लंबी उम्र और आनुवंशिक विविधता के लिए घातक है।
4. बाघ का अस्तित्व = मानव का अस्तित्व
संवेदशील भारतीय एवं जीवन की सुरक्षा की नैतिक जिम्मेवारी प्रत्येक भारतीय की है। प्रत्येक भारतीय को जंगल में मर रहे बाघ की चिंता क्यों होनी चाहिए?
इसका उत्तर 'जल सुरक्षा' में निहित है। भारत की जीवन रेखाएं- नर्मदा, ताप्ती, केन और बेतवा- उन्हीं जंगलों से पोषित होती हैं जहाँ बाघ निवास करता है। इन जंगलों की जड़ें मानसून के पानी को सोखकर उसे साल भर नदियों में प्रवाहित करती हैं। यदि बाघ गया, तो जंगल कटेंगे; जंगल कटे, तो नदियां लुप्त हो जाएंगी।
बाघ एक 'बायो-इंडिकेटर' है। उसका उपस्थित होना इस बात का प्रमाण है कि हमारी हवा शुद्ध है और पानी पीने योग्य है। उसकी अनुपस्थिति हमारे पारिस्थितिक दीवालियेपन की पहली चेतावनी है।
बाघ : पृथ्वी पर मानव अस्तित्व का पर्याय
बाघ इस पृथ्वी ग्रह पर मानव अस्तित्व का पर्याय है, जो पारिस्थितिक पिरामिड के शिखर पर विराजमान होकर समस्त जीवन की संतुलित व्यवस्था का प्रतीक है। सूर्य की किरणें, CO2 एवं जल की उपस्थिति में पृथ्वी पर प्रकाशसंश्लेषण द्वारा हरित वनस्पति उत्पन्न होती है। ये उत्पादक (प्रोड्यूसर) हैं, जो सूर्य ऊर्जा को जैव द्रव्य में परिवर्तित करते हैं। इन पर निर्भर प्राथमिक उपभोक्ता (प्राइमरी कंज्यूमर) हैं- खरगोश, चीतल, नीलगाय जैसे शाकाहारी जीव हैं जो वनस्पति खाकर जीवित रहते हैं।
द्वितीयक उपभोक्ता (सेकंडरी कंज्यूमर) हैं- लोमड़ी, तेंदुआ, जो शाकाहारियों का शिकार करते हैं। किंतु तृतीयक उपभोक्ता (टर्शियरी कंज्यूमर) बाघ इस पिरामिड का मुकुट है। प्रोजेक्ट टाइगर क्षेत्रों मे अतिवृद्धि वाले शाकाहारी नियंत्रित रहते हैं। वनस्पति एवं जीव मरते हैं, विघटक (डिकंपोजर)-जीवाणु, कवक- उन्हें विघटित कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं। चक्र पुनः प्रारंभ: मिट्टी से उत्पादक, उपभोक्ता, विघटक-अनंत काल तकv चलता रहता है।
बिना बाघ के यह चक्र टूटता- शाकाहारी वन नष्ट कर देते, मरुस्थल फैलते, जैव विविधता लुप्त होती है।
बाघ का अस्तित्व इसी पर निर्भर है : उत्पादक, उपभोक्ता एवं विघटकों पर। मिट्टी, पानी, हवा का संतुलन ही उसे स्वतंत्र जीवन देता है। शीर्ष शिकारी के रूप में बाघ ट्रॉफिक कैस्केड रोकता है- वन कार्बन संग्रहित करता है , वायु शुद्ध, जल चक्र नियंत्रित रखते हैं। मानव भी इसी जाल में बंधा है। बाघ नष्ट होता है,येन हमारी जीव विविधता नष्ट हो रही है। हमारा पतन। सनातन धर्म में भी बाघ शक्ति का प्रतीकरक्षक है।
बाघ बचाओ,पृथ्वी ग्रह बचाओ। वह मात्र पशु नहीं, Biosphere का संतरी है, जो गर्जना से कहता: हमारा भाग्य उसकी गूंज है।
संदेश : शाश्वत गर्जना
हम वह पहली पीढ़ी हैं जिसके पास बाघ को बचाने के तकनीकी उपकरण हैं, और शायद वह अंतिम पीढ़ी भी जिसके पास इसे बचाने का अवसर है। एक प्रकृति वैज्ञानिक के रूप में गत 55 वर्ष के प्रकृति अध्ययन के रूप में मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि बाघ का संरक्षण हमारी सभ्यता के लिए सबसे बड़ा 'एंटी-एजिंग' उपचार है। यह हमारी तरुणाई, हमारे स्वास्थ्य और हमारे भविष्य का संरक्षण है।
वर्ष 2025 को बाघों की कब्रगाह के रूप में नहीं, बल्कि एक नए संकल्प के वर्ष के रूप में याद किया जाना चाहिए। बाघ भारत की आत्मा है। यदि आत्मा देह को छोड़ दे, तो पीछे क्या शेष रहता है? यह दहाड़ बंद नहीं होनी चाहिए। क्योंकि उस दहाड़ में ही हमारे अपने अस्तित्व की गूंज छिपी है।
Edited by : Sudhir Sharma