Publish Date: Sat, 28 Mar 2026 (21:16 IST)
Updated Date: Sat, 28 Mar 2026 (21:20 IST)
Banana Fiber Saree Meerut: हथकरघा केवल वस्त्र निर्माण की तकनीक नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आत्मनिर्भरता और पारंपरिक कला का जीवंत प्रतीक है। यह हमारे इतिहास और पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है। बदलते समय के साथ अब हथकरघा उद्योग पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। इसी कड़ी में फलों के तनों विशेषकर केले के बेकार तनों से रेशा निकालकर इको-फ्रेंडली धागा तैयार किया जा रहा है, जिससे साड़ियां, शर्ट और अन्य वस्त्र बनाए जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित बुनकर सेवा केंद्र में केले के अपशिष्ट तनों से मजबूत, टिकाऊ और रेशम जैसी चमकदार साड़ियां तैयार की जा रही हैं। इन साड़ियों में प्राकृतिक सौंदर्य और आधुनिक पर्यावरणीय सोच का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। केले के रेशे से बने धागे को हैंडलूम पर बुना जाता है, जिससे तैयार कपड़ा न केवल आकर्षक होता है बल्कि बेहद टिकाऊ भी होता है। इसकी सुनहरी चमक इसे और भी खास बनाती है।
लोकल फॉर वोकल को मजबूती
इन साड़ियों की देश-विदेश में तेजी से मांग बढ़ रही है, जिससे लोकल फॉर वोकल की अवधारणा को मजबूती मिल रही है। यह पहल न केवल स्थानीय बुनकरों और कारीगरों को रोजगार दे रही है, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि कर रही है। भारतीय महिलाओं की पहली पसंद साड़ी हमेशा से रही है, जो हमारी संस्कृति की झलक पेश करती है। अब इस पारंपरिक परिधान में इको-फ्रेंडली बदलाव भी जुड़ गया है। केले के फाइबर से बनी इन साड़ियों को फूलों, पत्तियों और फलों से प्राप्त प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है, जिससे यह पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल बनती हैं।
क्या कहती हैं डिजाइनर सुप्रिया द्विवेदी
बुनकर सेवा केंद्र की टेक्सटाइल डिजाइनर सुप्रिया द्विवेदी का कहना है कि मेरठ में विशेष तौर पर हैंडलूम का काम होता है, दरी और मोटी चादर तैयार होती है। सरकार हथकरघा से युवाओं को जोड़ना चाहती है, इसलिए उन्होंने इस केंद्र में पहली बार इस तरह की इको-फ्रेंडली साड़ी तैयार की जा रही है। केले के रेशों को निकालकर उन्हें प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है, यह प्राकृतिक रंग अनार, हारसिंगार के फूल और अन्य फलों से लेकर हैंडलूम पर हाथ से ताना-बाना प्रकिया अपनाई जा रही है। बुनाई की जाती है। इस प्रक्रिया में समय और मेहनत अधिक लगती है—एक मीटर कपड़ा तैयार करने में लगभग एक सप्ताह का समय लगता है, जबकि एक साड़ी तैयार होने में करीब दो महीने लगते हैं। इसकी लागत लगभग तीन से चार हजार रुपये तक आती है।
यह कपड़ा पूरी तरह हस्तनिर्मित होता है, जिसकी फिनिशिंग बेहद उत्कृष्ट होती है। जो लोग खादी और पारंपरिक वस्त्रों के शौकीन हैं, उनके लिए यह साड़ी विशेष आकर्षण का केंद्र बन रही है। सैंपल तैयार होने के बाद ग्राहक और व्यापारी ऑर्डर के आधार पर इसे बनवा सकते हैं।
केले के तने से सूत बनाने की प्रक्रिया भी बेहद रोचक है
केले की फसल काटने के बाद बचे हुए तनों के भीतरी हिस्से से रेशे निकाले जाते हैं। इन रेशों को साफ करके सूत बनाया जाता है, जिसे बाद में हैंडलूम या मशीनों द्वारा कपड़े में बुना जाता है। यह कपड़ा सामान्य कपड़ों की तुलना में लगभग 15 गुना अधिक मजबूत और 10 गुना अधिक टिकाऊ होता है। साथ ही यह पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल है, जो पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इको-फ्रेंडली कपड़ों की मांग
आज भारत के साथ-साथ रूस, चीन, जापान और यूरोप जैसे देशों में भी इन इको-फ्रेंडली कपड़ों की मांग बढ़ रही है। यह पहल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रही है। रेशम के बाद केले के रेशे से बना सूत अब हर राज्य में आसानी से उपलब्ध हो सकता है, जिससे इको-फ्रेंडली वस्त्र निर्माण को व्यापक स्तर पर बढ़ावा मिल रहा है। इस प्रकार, हथकरघा उद्योग न केवल परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि एक हरित और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी मजबूत कदम बढ़ा रहा है।
हिमा अग्रवाल
Publish Date: Sat, 28 Mar 2026 (21:16 IST)
Updated Date: Sat, 28 Mar 2026 (21:20 IST)