मध्यप्रदेश के नीमच से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने हर किसी की आंखों को नम कर दिया है। रानपुर गांव के आंगनवाड़ी केंद्र में मौत बनकर आए मधुमक्खियों के झुंड और 20 मासूम जिंदगियों के बीच एक ढाल बनकर खड़ी हो गईं कंचनबाई मेघवाल।
रानपुर की इस 'यशोदा' ने साबित कर दिया कि एक मां सिर्फ अपने बच्चों के लिए नहीं, बल्कि दुनिया के हर मासूम के लिए अपनी जान दांव पर लगा सकती है। जब सैकड़ों मधुमक्खियों ने बच्चों पर हमला किया तो कंचनबाई ने अपनी जान की परवाह नहीं की। उन्होंने आनन-फानन में बच्चों को तिरपाल और चटाइयों में लपेटा और सुरक्षित कमरे के अंदर पहुंचाया।
बच्चों को बचाते-बचाते कंचनबाई खुद काल का ग्रास बन गईं। उनके शरीर पर मौजूद मधुमक्खियों के अनगिनत डंक चीख-चीख कर उनकी बहादुरी और ममता की गवाही दे रहे थे। वे बेहोश होकर वहीं गिर पड़ीं और अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उन्होंने दम तोड़ दिया।
कंचनबाई सिर्फ एक कुक नहीं थीं वे अपने लकवाग्रस्त पति और तीन बच्चों की एकमात्र उम्मीद थीं। जब उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा तो हर घर का चूल्हा ठंडा रहा और हर आंख से आंसू बह निकले। Edited by : Sudhir Sharma