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'पापा, मुझे बचा लो, मैं मरना नहीं चाहता...' नोएडा में 2 घंटे तक जिंदगी की भीख मांगता रहा सॉफ्टवेयर इंजीनियर; जिम्मेदार कौन?

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वेबदुनिया न्यूज डेस्क

ग्रेटर नोएडा , सोमवार, 19 जनवरी 2026 (11:34 IST)
नोएडा के सेक्टर 150 में दिल दहला देने वाली वारदात: 90 मिनट तक कार की छत पर खड़ा होकर मौत से लड़ता रहा बेटा, लेकिन सिस्टम की लापरवाही जीत गई और युवराज की सांसें हार गईं।

वो आखिरी 90 मिनट: एक पिता की बेबसी और एक बेटे की तड़प

शनिवार की वो सुबह नोएडा के लिए सिर्फ धुंध भरी नहीं थी, बल्कि एक परिवार के लिए अंधेरा लेकर आई थी। गुरुग्राम की एक प्रतिष्ठित कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्यरत 27 वर्षीय युवराज मेहता अपने घर लौट रहे थे। घने कोहरे के कारण सड़क पर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। अचानक उनकी कार एक टूटी हुई बाउंड्री वॉल को पार करते हुए 20-30 फीट गहरे पानी से भरे गड्ढे में जा गिरी।
 
यह गड्ढा कोई प्राकृतिक आपदा नहीं था, बल्कि एक निर्माणाधीन कमर्शियल प्रोजेक्ट का बेसमेंट था, जिसे बिना किसी पुख्ता सुरक्षा इंतज़ाम के खुला छोड़ दिया गया था।
 

घटना का रोंगटे खड़े कर देने वाला मंजर:

कार डूबने लगी, तो युवराज जैसे-तैसे कार की छत पर चढ़ गए। चारों ओर सन्नाटा और अंधेरा था, सिर्फ पानी की लहरें और मौत का डर। युवराज ने कांपते हाथों से अपने पिता को फोन किया, अपनी लाइव लोकेशन शेयर की और रोते हुए कहा— "पापा, मैं मरना नहीं चाहता, प्लीज किसी को भेजो।" करीब डेढ़ घंटे तक वह युवक मदद के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन कंक्रीट के उस जंगल में उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था। जब तक बचाव दल पहुँचा, युवराज पानी की गहराई में समा चुके थे।

यह एक्सीडेंट नहीं, 'सिस्टम' का कोल्ड-ब्लडेड मर्डर है!

युवराज की मौत ने उन दावों की पोल खोल दी है जो नोएडा को 'स्मार्ट सिटी' कहते हैं। यह सवाल आज हर नागरिक पूछ रहा है— आखिर इसका गुनहगार कौन?
 
बिल्डर की क्रूर लापरवाही: नियमों के मुताबिक, किसी भी गहरे गड्ढे के चारों ओर कंक्रीट की मजबूत दीवार या ऊंचे बैरिकेड्स होने चाहिए। साथ ही रात के समय वहां 'ब्लिंकर लाइट्स' और रेडियम साइन बोर्ड्स होने चाहिए। वहां कुछ भी नहीं था। क्या मुनाफा इंसानी जान से बड़ा है?
 
अथॉरिटी की मिलीभगत: नोएडा अथॉरिटी के अधिकारी क्या सिर्फ एसी कमरों में बैठकर नक्शे पास करते हैं? क्या फील्ड में जाकर सुरक्षा मानकों की जांच करना उनकी जिम्मेदारी नहीं थी?
 
बचाव तंत्र की विफलता: लोकेशन शेयर करने के बावजूद मदद पहुंचने में इतनी देर क्यों हुई?

भारत के निर्माण स्थल: मौत के खुले कुएं

युवराज की कहानी भारत के कंस्ट्रक्शन सेक्टर की उस कड़वी सच्चाई का हिस्सा है, जिसे अक्सर कालीन के नीचे दबा दिया जाता है।
 
आंकड़े जो डराते हैं: भारत में निर्माण क्षेत्र में हर साल हजारों मौतें होती हैं। कुल कार्यस्थल दुर्घटनाओं का 25% हिस्सा अकेले इसी सेक्टर से आता है।
 
हालिया उदाहरण: 2022 में अहमदाबाद में लिफ्ट शाफ्ट गिरने से 7 मजदूर मरे, 2025 में दिल्ली में खराब निर्माण से 6 लोगों ने जान गंवाई।
 
महाराष्ट्र का सच: पिछले 2 सालों में निर्माण मजदूरों की मौतों में 300% की वृद्धि हुई है। कारण वही पुराने— सुरक्षा बेल्ट की कमी, कमजोर मचान और घटिया सामग्री।
अब तक की कार्रवाई: क्या यह सिर्फ खानापूर्ति है?

हादसे के बाद गुस्सा फूटा, तो प्रशासन हरकत में आया

नोएडा अथॉरिटी ने जूनियर इंजीनियर नवीन कुमार को बर्खास्त कर दिया है। ट्रैफिक विभाग के अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। दो रियल एस्टेट डेवलपर्स के खिलाफ लापरवाही से मौत (FIR) का मामला दर्ज हुआ है।

क्या आपको लगता है कि इस मामले में बिल्डरों पर 'गैर-इरादतन हत्या' का केस चलना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट में साझा करें और इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि सोता हुआ सिस्टम जाग सके।

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