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पंक्चर बनाने वाले की बेटी बनीं PCS अफसर, UPPSC में हासिल की सफलता, महिला सशक्तीकरण की बनीं मिसाल

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Gayatri Verma from Bulandshahr achieved success in UPPSC examination
''मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।'' यह बात एक बेटी ने सिद्ध कर दिखाई है। इस बेटी ने उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की परीक्षा में सफलता हासिल करके दिखा दिया है कि बेटियां किसी से कम नहीं हैं। बुलंदशहर जिले की रहने वाली गायत्री वर्मा की कहानी सिर्फ एक सफलता नहीं, बल्कि हौसले, संघर्ष और महिला सशक्तीकरण की एक जीवंत मिसाल बनकर उभरी है। उनकी इस उपलब्धि से न सिर्फ परिवार बल्कि पूरे जनपद में खुशी की लहर है।
 

संघर्ष की मिट्टी से उगी सफलता की कहानी

धूल-धूप में दिनभर मेहनत करने वाले गायत्री के पिता राजकुमार स्थानीय स्तर पर टायर पंक्चर की छोटी सी दुकान चलाते हैं। प्रतिदिन 200 से 400 रुपए कमाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करना उनके लिए बहुत बार चुनौतीपूर्ण रहा।
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टायर पंक्चर की छोटी सी दुकान से गुजर-बसर करने वाले पिता ने आर्थिक तंगी झेली, कई बार हालात इतने बिगड़ जाते कि दो वक्त को रोटी भी मुश्किल होती, विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए इस पिता ने एक सपना पाला कि बेटी को आगे पढ़ाना है, आगे बढ़ाना है।

गरीबी से लड़ाई लड़ते हुए बेटी की पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्‍होंने कर्ज तक लिया, कर्ज लेने के बाद राजकुमार को समाज में ताने सुनने को मिले, लेकिन वह उन तानों से टूटे नहीं बल्कि और मजबूत हुए। बेटी गायत्री ने उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की परीक्षा में 210वीं रैंक हासिल करते हुए पीसीएस अधिकारी बनने का सौभाग्य पाया तो यह सफलता उन लोगों के लिए सबक थी जो उसके पिता पर हंसते थे। 

हार नहीं, हौसला जीता

गायत्री वर्मा के पास कोचिंग के लिए बहुत बड़े संस्थान नहीं थे, न महंगे संसाधन। बस एक कोना, कुछ किताबें, अपने पिता के त्याग से मिली प्रेरणा और कुछ कर दिखाने का दृढ़ संकल्प। अभावों से लड़ती इस बेटी ने साबित कर दिया कि सफलता साधनों से नहीं, संकल्प से मिलती है। गायत्री ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बुलंदशहर में पूरी की, जबकि आगे की पढ़ाई अलीगढ़ में (ननिहाल यानी नाना के यहां) रहकर की।

उन्होंने बताया कि नाना-नानी हरदम उनके साथ थे, मां ने कभी टूटने नहीं दिया, असफलता में वह प्रेरणा की ढाल बनकर खड़ी हो जाती थीं। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी एक सर के गाइडेंस में शुरू की, मुख्य रूप से ऑनलाइन माध्यम से की और इस दौरान सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखी।
गायत्री की राह आसान नहीं थी, वह पहले प्रयास में प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर पाईं, दूसरे प्रयास में भी मुख्य परीक्षा में असफलता हासिल हुई, लेकिन उन्‍होंने हार नहीं मानी बल्कि इस असफलता को तैयारी का हिस्सा माना। बस मन मैं संकल्प था कि रुकना नहीं है, जिसके चलते तीसरे प्रयास में सफलता हासिल कर ली। गायत्री के इस जुनून ने 210वीं रैंक के साथ PCS अधिकारी बनने का सपना साकार कर दिखाया।

महिला सशक्तिकरण की सशक्त मिसाल

गायत्री की कहानी हर उस लड़की के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को छोटा कर लेती हैं। यह उपलब्धि उन सभी युवाओं, विशेषकर बेटियों के लिए प्रेरणास्रोत है, जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को साकार करने की जिद ठान लें तो उसे पूरा कर दिखाती हैं। गायत्री ने यह बता दिया है कि मेहनत और धैर्य से हर बाधा को पार किया जा सकता है। जहां बेटियां बोझ समझी जाती हैं, वहीं एक परिवार का विश्वास, एक बेटी की दुनिया बदल सकता है।

एक जीत, कई मायनों में 

यह सिर्फ गायत्री की जीत नहीं है बल्कि यह एक पिता के विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए त्याग की जीत है। छात्र जीवन में अभावों के बीच यह हर उस लड़की की जीत है जो संघर्ष से लड़ रही है। गायत्री वर्मा ने साबित कर दिया कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर हौसला बुलंद हो तो मंजिल खुद रास्ता बना लेती है।
Edited By : Chetan Gour

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