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UP की जनजातियों के 500 से अधिक पारंपरिक आभूषणों व बर्तनों का संरक्षण

विरासत संजोने की जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान की अनूठी पहल, प्रदेश की जनजातीय संस्कृति से नई पीढ़ी को परिचित करा रहा है संस्थान

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वेबदुनिया न्यूज डेस्क

लखनऊ , मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026 (13:20 IST)
Tribal Heritage of UP: उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान, प्रदेश की जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को संजोने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस दिशा में संस्थान जनजातियों के पारंपरिक आभूषणों व दुर्लभ बर्तनों के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार का उल्लेखनीय प्रयास कर रहा है। संस्थान का यह प्रयास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की समावेशी विकास की अवधारणा को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस क्रम में प्रदेश की विभिन्न जनजातियों के पारंपरिक तरीके से बनाए गए 500 से अधिक आभूषणों व बर्तनों का न केवल संरक्षण किया जा रहा है, बल्कि इनकी प्रदर्शनी के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर को जानने का अवसर भी प्रदान कर रहा है।

जनजातीय परंपराओं और उनके कला-कौशल की पहचान हैं ये आभूषण

उत्तर प्रदेश की थारू, बुक्सा, गोंड और बैगा जनजातियों के आभूषण न केवल सौंदर्य के प्रतीक हैं, बल्कि जनजातीय समाज की गहरी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं को भी जीवंत बनाते हैं। इस उद्देश्य से जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान इन जनजातियों के पारंपरिक तरीके से बने आभूषणों का संरक्षण कर रहा है।
 
संस्थान के निदेशक अतुल द्विवेदी ने बताया कि ये आभूषण पूरी तरह से हस्तनिर्मित होते हैं, जिन्हें जनजातियों के शिल्पकार अपने सदियों पुराने ज्ञान और हस्तकौशल से तैयार करते हैं। जो इन जनजातियों की सांस्कृतिक परंपराओं के साथ उनके कला कौशल की भी पहचान हैं। ये आभूषण गिलेट या गोटा चांदी, पुराने भारतीय सिक्कों, मनकों, तांबा, पीतल, लकड़ी, हड्डी व सीप जैसी सामग्रियों से बनाए जाते हैं। इनका निर्माण पारंपरिक तरीके से होता है, जिसमें धातु को भट्टी में गर्म कर तार और चादरों में बदला जाता है, फिर हाथों से अंतिम आकार दिया जाता है। इनमें हंसली, पायल, करधनी, कड़े, झुमकी, हार, अंगूठियां, बाजूबंद और मंगलसूत्र जैसे आभूषण जनजातीय जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
 
उन्होंने बताया कि संस्थान के प्रयास से जहां एक ओर लुप्त होते इन आभूषणों और उनकी निर्माण कला का संरक्षण किया जा रहा है, साथ ही उन्हें आधुनिकता से भी जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इन आभूषणों के आधुनिक रूप युवा पीढ़ी पारंपरिक परिधानों के साथ-साथ एथनिक व वेस्टर्न पहनावे में भी प्रयोग कर रही है।
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यूपी की थारू, बुक्सा, अगरिया, खरवार जनजातियों के बर्तनों का हो रहा है संरक्षण

संस्थान का प्रयास केवल आभूषणों के संरक्षण तक ही सीमित नहीं है। यह जनजातियों के विलुप्त होते पीतल, तांबे और मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों के संरक्षण में भी सक्रिय है। संस्थान के निदेशक ने बताया कि थारू, बुक्सा, अगरिया, खरवार और सोनभद्र क्षेत्र की जनजातियों के धातु के बर्तन, मृदभांड, धातु पात्र और जंगली लौकी से बनी ‘तुंबी’ आज भी जनजातीय समाज की जीवनशैली का सजीव उदाहरण है। हमारा संस्थान इनका संरक्षण करने के साथ समय-समय पर इनकी प्रदर्शनी भी लगाता है।
 
प्रदेश की अगरिया जनजाति धातु शिल्प के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जो कि प्राचीन काल से धातुकर्म की कला से परिचित है। जबकि थारू जनजाति चावल से पेय बनाने के लिए प्रयोग होने वाले ‘जाड़’ के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करती है। संस्थान समय-समय पर प्रदर्शनियों के माध्यम से प्रदेश की जनजातियों की कलाकृतियों, आभूषणों और बर्तनों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान कर रहा है। इसी क्रम में संस्थान की ओर से उत्तर प्रदेश दिवस- 2026 और जनजातीय भागीदारी महोत्सव में जनजातीय शिल्पकारों को मंच और सम्मान देकर जनजातीय गौरव को नई ऊंचाई प्रदान की गई।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

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