गब्बर ने बदल दी हमारी सोच

धीरे-धीरे हमारी पसंद को बदला गया है।

- अनिरुद्ध जोशी

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प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक 'जज' होता है। जिस व्यक्ति के भीतर जज जितनी ताकत से है वह उतनी ताकत से अच्छे और बुरे के बीच विश्लेषण करेगा। निश्चित ही ऐसा व्यक्ति स्वयं में सुधार कर भी लेता है जो खुद के भीतर के जज को सम्मान देता है। अच्छाइयाँ इस तरह के लोग ही स्थापित करते हैं।

लेकिन अफसोस की भारतीय फिल्मकारों के भीतर का जज मर चुका है। और उन्होंने भारतीय समाज के मन में बैठे जज को भी लगभग अधमरा कर दिया है। ऐसा क्यों हुआ? और, ऐसा क्यों है कि अब हम जज की अपेक्षा उन निगेटिव चरित्रों को पसंद करते हैं जिन्हें हम तो क्या 11 मुल्कों की पुलिस ढूँढ रही है या जिन पर सरकार ने पूरे 50 हजार का इनाम रखा है और जो अपने ही हमदर्दों को जोर से चिल्लाकर कहता है- सुअर के बच्चों!

दरअसल हर आदमी के भीतर बैठा दिया गया है एक गब्बर और एक डॉन। एक गॉडफादर और सरकार। अब धूम की पैदाइश बाइक पर धूम मचाकर शहर भर में कोहराम और कोलाहल करने लगी है।

वह दौर गया जबकि गाइड के देवानंदों और संगम के राजकुमारों में बलिदान की भावना हुआ करती थी। 60 और 70 के दशक में नायक प्रधान फिल्मों ने साहित्य और समाज को सभ्य और ज्यादा बौ‍द्धिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जबकि रूस से हमारे सम्बंध मधुर हु्आ करते थे और साम्यवाद की सोच पकने लगी थी लेकिन इसके परिणाम आना बाकी थे।

इससे पहले कि उसके परिणाम आते, गब्बर ने आकर हमारी समूची सोच बदल दी और हमें एक नए परिणाम की ओर धकेल दिया। ऐसा होचपोच परिणाम की हमें भी समझ में नहीं आता की यह 60-70 का दशक है या 20वीं सदी का इंटरनेटी युग, जबकि दशकों में नहीं कुछ दिनों में ही दशक जितना सबकुछ बदल जाता है।

सुनने से ज्यादा हम बोलना चाहते हैं और 90 फीसदी मन निर्मित होता है देखने से ऐसा मनोवैज्ञानिक मानते हैं। जब हम सोते हैं तब भी स्वप्न रूप के रूप में देखना जारी रहता है। मन पर दृष्यों से बहुद गहरा असर पड़ता है। दृश्यों के साथ यदि दमदार शब्दों का इस्तेमाल किया जाए तो बात सीधे अवचेतन में घुसती है इसिलिए आज तक बच्चे-बच्चे को गब्बर सिंह के डॉयलाग याद हैं। याद है डॉन की अदा और डॉयलाग डिलेवरी। दूसरी तरफ ऐसी कितनी फिल्में हैं जो पॉजीटिव चरित्रों पर बनी हैं।

भाषा और दृष्य से बाहर दुनिया नहीं होती। दुनिया के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे फिल्मकारों के यह बात कब समझ में आएगी की वह जो बना रहे हैं वह देश के वर्तमान के साथ खिलवाड़ करते हुए एक बहुत ही भयावह भविष्य निर्मित कर रहे हैं, यह जानते हुए कि हमारा मुल्क भावनाओं में ज्यादा जीता और मरता है।

शोले से जंजीर, जंजीर से डॉन, खलनायक और फिर कंपनी तक आते-आते हल्ला बोल से हमारे सोच और पसंद को शिफ्ट किया गया। यह शिफ्टिंग जानबूझकर की गई ऐसा नहीं है और ना ही अनजाने में हुई ऐसा भी नहीं। बाजारवाद के चलते यह शिफ्टिंग हुई है। यह शिफ्टिंग हुई है फिल्मों में माफियाओं के धन-बल की बदौलत। अब हमें पसंद नहीं वह सारे किरदार जो प्रेम में मर जाते थे अब पसंद है वह किरदार जो अपने प्रेम को छीन लेते हैं।

फिल्मकार निश्चित ही यह कहकर बचते रहे हैं कि जो समाज में है वही हम दिखाते हैं। दरअसल वह एक जिम्मेदार शिक्षक नहीं एक गैर जिम्मेदार बिजनेसमैन है ऐसा कोई कहना चाहे तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

यह कहना गलत है कि फिल्में समाज का आइना होती हैं। यह कहना भी गलत है कि फिल्में समाज का आइना नहीं होतीं। देखा यह जाना चाहिए कि आखिरकार क्यों समाज के उन चरित्रों को बड़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है जो समाज के दु‍श्मन हैं।

क्या इस बात की जरूरत नहीं हैं कि फिल्मकारों को अब मनोवैज्ञानिकों कि सलाह ली जानी चाहिए जबकि अब उनके पास फिर से 60-70 के दशक की ओर लौटने के अलावा कोई और विकल्प समझ में नहीं आ रहा है। नए ग्लास में वहीं पुरानी शराब नए लुक और अंदाज में प्रस्तुत की जाए, क्योंकि नई पीढ़ी नहीं जानती की 60-70 के दशक में गोल्डन युग था या नहीं, उन्हें तो शाहरुख और रितिक ही मौलिक नजर आते हैं।

अनंत हैं संभावनाएँ : भारतीय फिल्मों की कहानियों को इकट्ठा किया जाए और उनका विश्लेषण किया जाए तो संभवत: हजार फिल्मों की 50 कहानियाँ ही होंगी। ऐसा नहीं है कि कहानियों के टोटे हैं। ऐसा भी नहीं है कि अच्छी या कमर्शियल कहानियों के टोटे हैं फिर क्यों मसाला कहानियों का दौर चला।

क्या भारतीय प्रतिभा मर गई है जो हम हॉलीवुड की ओर देख रहे हैं या कि कौन नया करे या नया सोचने की जेहमत करे। तभी तो सदियों से हम भारतीय न तो पूरे भारतीय हैं और न ही पूरे अभारतीय। हम होच-पोच हैं। शायद हमें देखकर अमेरिका, ब्रिटेन या अरब यह सोचते होंगे की किसी कोलाज को देख रहे हैं।