इस वर्ष हावी रही धार्मिक कट्टरता

धर्म के मर्म को नहीं समझी जनता

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इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वर्ष हमारे देश में धार्मिक कट्टरवाद के चलते आंतकवाद सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। धर्म की आड़ में आतंकवाद की नई पौध तैयार हो गई है। तो क्या अब ये जरूरी नहीं कि देश में चल रहे सभी कट्टर उन्मादी धार्मिक संगठनों पर रोक लगे? इसके अलावा वर्ष की तीन बड़ी धार्मिक घटनाएँ रहीं, पहली अमरनाथ भूमि विवाद, दूसरी नैना देवी दर्शन हेतु उमड़ी भीड़ में मची भगदड़ से 145 लोगों की मौत और तीसरी जौधपुर में चामुंडा माता मंदिर में मची भगदड़ में 216 श्रद्धालुओं की मौत।

जनवरी माह में आयोजित मकर संक्रांति, पोंगल और मोहर्रम की ज्यादा धूम नहीं रही। ओशो महोत्सव के लिए कम्यून में भी उत्साह ठंडा रहा। पतंग उड़ाने के रिवाज पर लाहौर में इस बार कट्टरपंथियों ने रोक लगा दी थी। फिर भी कुछ आवारा पतंगें कटकर भारतीय सीमा में आ गिरीं। फरवरी में वसंत पंचमी दिवस हर वर्ष की तरह ही इस वर्ष भी प्रेम दिवस नहीं बन सका। मार्च में ऋषभदेव जयंती कब आई और चली गई पता ही नहीं चला। अप्रैल में गुड़ी पड़वा, चेटी चंड और भगवान महावीर जयंती की जरूर धूम रही।

मई में बुद्ध जयंती पर गया में माओवादियों की धमकी के चलते सभी बौद्धों ने सादगीपूर्ण रूप से जन्मोत्सव मनाया। जून में गुरु अर्जुनदेव शहीद दिवस, संत कबीर और गुरु हरगोविंद जयंती हर वर्ष जैसी ही रही। जुलाई में रथयात्रा और गुरु पूर्णिमा की जरूर धूम रही। अगस्त में अमरनाथ यात्रा हर वर्ष की तरह इस वर्ष ज्यादा विवाद में रही। शबे बरात, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और मास शिवरात्रि की जरूर धूम रही। सितंबर में पितृपक्ष और रमजान मास में सभी ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।

अक्टूबर में ईदुल फितर ईद और दीपावली ज्यादा उत्साहपूर्ण नहीं रही। नवंबर में गुरु गोविंदसिंह का पुण्य स्मरण उत्साहपूर्ण रहा लेकिन दिसंबर में गीता जयंती और बकरीद मुम्बई आतंकवादी हमले के चलते सादगीपूर्ण तरीके से मनाई गई। ओशो जन्मोत्सव के दौरान जरूर देशभर में ध्यान शिविरों का आयोजन हुआ। क्रिसमस डे और नववर्ष की अभी से तैयारी शुरू हो चली है।

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हे अमरनाथ : अमरनाथ भूमि विवाद को लेकर इस साल अमरनाथ यात्रा जबरदस्त विवाद में रही। इस विवाद के चलते जम्मू और कश्मीर में पूरी यात्रा के दौरान कर्फ्यू रहा। मेहबूबा मुफ्ती ने आग में घी डालने का काम किया। हर साल की तरह इस वर्ष भी अलगाववादियों ने अमरनाथ यात्रा के दौरान फसाद पैदा करना जारी रखा। इस फसाद में कई निर्दोष लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हुए। इसके बावजूद पिछले वर्ष के सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए श्रद्धालुओं ने और अधिक संख्‍या में दर्शन किए। जम्मू से लेकर गुफा तक के 350 किलोमीटर के रास्ते पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे।

धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद:
यह कहना गलत होगा कि शहरीकरण, जनसंख्या विस्फोट और गरीबी के चलते धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद बढ़ा है। समूचे एशिया में ही धार्मिक कट्टरता नहीं बढ़ी है बल्कि ब्रिटेन और अमेरिका की जनता भी अपने-अपने विचारों के प्रति इस जाते वर्ष में कट्टर रही है और इसके कई उदाहरण हैं।

मूलत: इसका कारण यह कि प्रत्येक धर्म के लोगों ने इस वर्ष दूसरे धर्म के खिलाफ हर तरह से प्रचार-प्रसार, हमला और धर्मांतरण तो किया ही साथ ही मदरसों जैसे अन्य शिक्षण संस्थानों में बच्चों के दिमाग में भी जहर भरा गया। इसी के चलते पाकिस्तान के कई मदरसों पर कार्रवाई की गई। इस कट्टरता के कारण ही इस वर्ष आतंकवाद ने अपना भयानक रूप दिखाया। इस शिक्षा और खिलाफत का असर यह होगा की आगे भी कट्टरता को बढ़ावा मिलेगा।

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धार्मिक स्थानों पर हुए प्रमुख हादसे:
हे माँ चामुंडे : सितंबर में नवरात्र के प्रथम दिन ही राजस्थान के जोधपुर शहर में प्रसिद्ध मेहरानगढ़ किले के चामुंडा माता के मंदिर में मची भगदड़ में लगभग 216 श्रद्धालुओं की जान चली गई, जबकि 300 से ज्यादा घायल हो गए। इसकी जाँच के लिए एक न्यायिक जाँच आयोग भी गठित किया गया था। राज्य की मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे ने इस हादसे पर एक दिन का राजकीय अवकाश घोषित किया था। बताया जाता है कि यह हादसा भी अफवाह के चलते हुआ। इससे पूर्व उत्तरांचल के चामुंडा मंदिर में भी इस तरह का हादसा हुआ था।

हे माँ नैना : हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में दर्शन के दौरान मची भगदड़ में 145 लोगों की मौत हो गई जो वर्ष के धार्मिक स्थल पर होने वाली मौत के सबसे बड़े आँकड़ों में से एक था। चट्टान खिसकने की अफवाह के चलते ये हादसा हुआ। देश भर के प्रमुख समाचार पत्रों में यह खबर मुख्य पृष्ठ पर रही।

दरअसल, ऐसे हादसे प्रशासनिक अमले की उस लापरवाही का परिणाम ज्यादा है जो इस तरह की घटनाओं से कोई सबक नहीं लेता। इस सबसे सबक लेकर तीर्थस्थलों को बदइंतजामी और असुरक्षा के भय से मुक्त करना जरूरी है।

अंतत: कहना होगा की इस वर्ष धर्म पर कट्टरवादियों का जोर ज्यादा चला। देश भर में जगह-जगह छुटपुट साम्प्रदायिक घटनाएँ या दंगे होते रहे। वहीं ‍दूसरी ओर धार्मिक स्थलों पर अव्यवस्था के चलते कई हादसे हुए। इन सबको सम्भालने में व्यवस्थाएँ असफल सिद्ध हुई। धर्म के मर्म को समझने में प्रत्येक वर्ष आ रही गिरावट भी सेंसेक्स की तरह ही रही। विश्व भर में धर्म की समझ लगभग खत्म होती जा रही है जो मानवीय मूल्यों और धर्म के लिए भयावह है।