भारतीय चित्रकला और वर्ष 2008

भारतीय चित्रकला के चमकीले रूप-रंग

बीता साल देश के कला जगत के लिए कई अर्थों में एक अनूठा साल रहा। एक तरफ जहाँ देश के वरिष्ठ कलाकारों ने अपनी सृजनात्मकता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय रंग-रूप को प्रतिष्ठित किया, बल्कि उसकी चमक को और चमकीला बनाया है। उनकी इस कला में एक तरफ जहाँ ठेठ भारतीय संस्कृति और स्थानीयता के रूप-रंग साकार हुए वहीं उन्होंने अपनी कला में तमाम हदबंदियों को लाँघकर अपने लिए एक व्यापक रसिक समाज बनाया।

कला जगत की पिछली हलचलों में जाहिर है एक बार फिर उस्ताद चित्रकार एमएफ हुसैन सुर्खियों में रहे। ताज पर आतंकी हमले में उनकी पेंटिंग नष्ट हो गई और उन्होंने इसके बाद घोषणा की कि वे ताज होटल के लिए तीन नई पेंटिंग बनाएँगे। इससे यह बात साफ होती है कि अपने 94वें वसंत में भी इस कलाकार की कूची थकी नहीं है बल्कि लगातार निखरकर अपने मोहक रंगों से विश्व का ध्यान भारतीय कला की ओर खींच रही है। इसी कलाकार की बदौलत आज देश के तमाम वरिष्ठ और युवा कलाकारों की कला को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न केवल पहचाना जा रहा है, बल्कि उनके कैनवास लाखों डॉलर्स में बिक रहे हैं।

पिछले साल ही हुसैन के साथ सैयद हैदर रजा और तैयब मेहता की पेंटिंग अंतरराष्ट्रीय नीलामी में करोड़ों में बिकी हैं। रजा सालों से पेरिस में रहकर चुपचाप भारतीय आध्यात्मिकता को अपने रंगों की आत्मा के ताप से निखार रहे हैं, वहीं तैयब मेहता ने महिषासुरमर्दिनी जैसे मिथकों को अपने कैनवास पर चित्रित कर विश्व का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। इधर रामकुमार भी बरसों से चुपचाप और अपने गहरे एकांत में अपने अमूर्त चित्रों को नए रंग दे रहे हैं।

अब उन्होंने अपनी चित्र प्रदर्शनियाँ बनाना लगभग बंद-सा कर दिया है, लेकिन वे कला-कर्म में ध्यानस्थ हैं। हुसैन तो फिर भी किसी न किसी विवाद के कारण सुर्खियों में रहे हैं लेकिन रजा, तैयब मेहता और रामकुमार शायद हर तरह के प्रचार से दूर रहकर चित्र बना रहे हैं। इनकी अथक कला जिजीविषा किसी भी युवा चित्रकार के लिए आदर्श और प्रेरणा बन सकती है।

रजा तो इसके लिए जाने जाते हैं कि वे जब भी भारत आते हैं तो युवा चित्रकारों से मिलते-जुलते हैं, उनकी प्रदर्शनियों का उद्‍घाटन करते हैं और कई बार तो वे युवा चित्रकारों की पेंटिंग भी खरीदते हैं। उनकी उपस्थिति हमेशा युवाओं को कला-उत्तेजना देती है।

इधर समकालीन कला परिदृश्य पर सरसरी निगाह भी डाली जाए तो यह प्रीतिकर आश्चर्य की बात है और शायद भारतीय कला का अभूतपूर्व समय है कि एक साथ कई पीढ़ियाँ सक्रिय हैं। इसमें नए-पुराने कलाकार अपनी कल्पनाशीलता और प्रयोगधर्मिता के जरिये, हमेशा कुछ नया रचने के लिए सतत रचनारत हैं। मूर्त और अमूर्त में इतना विपुल और विभिन्न काम हो रहा है कि आज भारतीय कला को विश्व की कला के समकक्ष रखा जा सकता है।

मनजीत बावा ने आकृति मूलकता में अपनी चित्रात्मा को बहुत ही मनोहारी रंगों में आविष्कृत किया है और वे कभी-कभी भारतीय पौराणिक पात्रों को अपनी आधुनिक रंग संवेदना से अनूठा रंग देते हैं। उनके चित्र मोहक होते हैं। इसी तरह केजी सुब्रमण्यम ने भी आकृतिमूलक चित्रों में अपनी रियाज और कल्पनाशीलता से सुंदर चित्रों की रचना की है। जोगेन चौधरी और जतिन दास ने अपनी रेखाओं की लय को प्रयोगधर्मिता के साथ ही निहायत ही मौलिक दृष्टि से रचा है।

रामेश्वर ब्रूटा के बड़े-बड़े कैनवास उनकी रचनात्मक भूख के साक्ष्य हैं। महिला चित्रकारों में अंजलि इला मेनन ने अपनी सूक्ष्म कला दृष्टि से मूर्त चित्रों में ठेठ भारतीय की तलाश की है। अपर्णा कौर, जयश्री बर्मन, सुजाता बजाज आदि चित्रकारों ने जताया है कि वे कितनी अच्छी चित्रकार हैं।

इधर जिन चित्रकारों ने तेजी से अपनी पहचान बनाई है और उसे पुख्ता किया है उनमें सुबोध गुप्ता, जगदीश किलत, अतुल डोडिया जैसे कलाकार हैं। दूसरी तरफ अमूर्त चित्रों में यूसुफ अरक्कल, मनीष पुष्कले और अखिलेश ने पहचान बनाई है।

इधर यह अलग से रेखांकित किया जाना चाहिए कि देश के दिग्गज चित्रकार रघु राय को फ्रांस का सबसे बड़ा पुरस्कार मिला है जो यह बताता है कि भारतीय फोटोग्राफी को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिया जा रहा है, लेकिन रघु राय बहुत पहले ही अपनी फोटोग्राफी से देश-दुनिया को चकित कर चुके थे। पेरिस में उनकी फोटो एक्जीबिशन देखकर फ्रेंच फोटोग्राफर हेनरी कार्तिएर ब्रेसाँ तक प्रभावित हुए थे।

रघु राय ने हिन्दुस्तान की तमाम जगहों के कलात्मक फोटो लेकर सिद्ध किया था कि वे देश के बेहतरीन फोटोग्राफर हैं। इंडिया टुडे में उनके पिक्चर एसेस और ताजमहल सिरीज के उनके फोटो जबरदस्त हैं और उनकी रचनात्मकता के कलात्मक सबूत।

जाहिर है बीता साल भारतीय चित्रकला के चमकीले रूप-रंगों का साक्षी रहा है और उसने अपने लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी संभावनाओं के तमाम दरवाजे खोलने की इच्छा जताई है।

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