2010 : साहित्यकारों की सुनहरी आशाएँ

नूतन वर्ष में साहित्य-संसार की उम्मीदें

प्रस्तुति : विजयशंकर चतुर्वेदी
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नए वर्ष से समाज के हर तबके को कोई न कोई उम्मीद होती है। अब जबकि वर्ष 2010 की गेंद हमारी पृथ्वी पर लुढ़कना शुरू हो गई है, देश के साहित्यकारों ने भी सोचना शुरू कर दिया है कि इसकी झोली में समाज के किस तबके के लिए क्या है और क्या नहीं है? राजनीति-समाज और साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत को लेकर उनकी कुछ गहरी चिंताएँ हैं। युवा कवि विजयशंकर चतुर्वेदी ने देश के कुछ जाने-माने साहित्यकर्मियों से नववर्ष की आशाओं और आशंकाओं के विषय में चर्चा की।

देश की संस्कृति सुरक्षित रहे
आबिद सुरती, कार्टूनिस्ट
नए साल में मैं देखना चाहूँगा कि अपनी संस्कृति को कैसे सुरक्षित रखा जाए। यह जो वैश्वीकरण आगे बढ़ रहा है वह सब कुछ तहस-नहस किए डाल रहा है। यह अमेरिकी संस्कृति है जो पूरी दुनिया पर छा रही है और सब कुछ खा रही है, यह हर हाल में रुकना चाहिए।

मैं मानता हूँ कि भारतीय संस्कृति दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है और अमेरिकी संस्कृति दुनिया में सबसे घटिया। आज के बच्चे टिफिन में नूडल्स लेकर स्कूल जाते हैं, जिनमें कोई पौष्टिकता नहीं होती कोई विटामिन नहीं होता। हमारी संस्कृति में माँ बाजरे की रोटी पर घी चुपड़ कर देती थी। अमेरिकी संस्कृति जहाँ भी जाती है, वायरस की तरह वहाँ की लोक-संस्कृति को चट कर जाती है।

कला- जगत में नया साल खुशियाँ लेकर आएगा। आज हुसैन, रज़ा, सुजा, गायतोंडे आदि की पेंटिंग्स लाखों-करोड़ों में बिकती हैं। पहले स्थान सीमित था आज दुनिया का विस्तार हो रहा है। आज एनीमेशन आ गया है, कार्टून चैनल्स हैं, कार्टून फ़िल्में बन रही है। इससे सैकड़ों नए-नए कलाकारों को खपने की जगह मिल रही है। आज के दौर को कार्टूनिस्टों का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। नए साल में पेंटर अच्छा काम और दाम पाएँगे।


युवा वर्ग और मीडिया से ‍अपेक्षा है :
प्रो. कमला प्रसाद, सम्पादक 'वसुधा
मैं मौजूदा व्यवस्था में लगातार ह्रास देख रहा हूँ और इसी के बढ़ते जाने की आशंका है। जैसे-जैसे गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ेगी, देश में पैसे का वर्चस्व बढ़ेगा, चुनाव व राजनीति में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा, समस्याएँ भी बढ़ेंगी। अमरीकी दोस्ती सघन होगी तो आतंकवाद, नस्लवाद और क्षेत्रवाद को ही बढ़ावा मिलेगा। हर समस्या के लिए सेना की तरफ देखा जाने लगा है...तब हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? साल 2010 में, 2011 में और उसके आगे के वर्षों में भी...!

जबसे भूमंडलीकरण का राज आया है तबसे विकास की थोथी चर्चा हो रही है। समता की बात कोई नहीं करता...ऐसे में कैसा जनतंत्र? रूसो ने कहा है कि ऐसे किसी जनतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती जिसमें समता न हो। आज देश के हर आदमी के अवचेतन में अज्ञात भय और अमूर्त गुस्सा व्याप्त है। यह जनतंत्र के चरित्र का सबसे घातक पहलू है।

ऐसी परिस्थितियों में उम्मीद की किरण हमारी सजग युवा पीढ़ी है। जो जागरूक मीडियाकर्मी विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बातें जनता के सामने रख रहे हैं,आने वाले समय में उनसे भी उम्मीद बंधती है। मीडिया बड़ी-बड़ी साजिशों को विफल करके नई उम्मीदों को जन्म देता है। अगले साल उन्हीं उम्मीदों के विस्तार की आशा करता हूँ। आने वाले समय में जनता का सामूहिक दायित्व-बोध सामाजिक परिवर्त्तन का कारक बनेगा। मैं मानता हूँ कि कला-संस्कृति का क्षेत्र तथा मीडिया अग्रगामी है और यही परिवर्त्तन की राह दिखाएँगे।


बस, तारीख़ बदल जाएगी :
निदा फाज़ली (मशहूर शायर)
मुझे कोई उम्मीद नहीं है। पिछला साल अपने दुखों के साथ चला जाता है और नया साल अपने ग़मों के साथ आता है। मेरा एक शेर है-

'रात के बाद नए दिन की सहर आएगी
दिन नहीं बदलेगा तारीख़ बदल जाएगी।

सो कैलेण्डर बदलता है, कैलेण्डर के बाहर का माहौल नहीं बदलता। वह 2009 हो, 2010 हो या कोई और साल हो, बाहर की फिजाएँ, हवाएँ, सदाएँ जस की तस रहती हैं। बड़ी बात यह है कि भाजपा ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया था, कांग्रेस इंडिया इज शाइनिंग कह रही है, लेकिन जिस देश में नंदीग्राम हो, सिंगूर हो, भिंड हो, मुरैना हो, मोतिहारी हो और ऐसे ही अनेक अंधेरों के क्षेत्र फैले हुए हों जो देश की आबादी के तीन चौथाई से ज्यादा हैं। वहाँ बहुत उम्मीद क्या करना। बस, लोगों के लिए भूख है, महँगाई है, महामारियाँ हैं, 2009 में भी थीं। क्या आप कह सकते हैं कि 2010 में नहीं रहेंगी?

आज़ादी से अब तक और ब्रिटिश राज में तथा उसके पहले से भी आम आदमी का शोषण हमारी तहजीब की पहचान रहा है। पुराने युग में भी था, 2010 में भी रहेगा। नए साल के लिए मेरा कोई सुझाव नहीं है। बस इतना कहता हूँ कि भगवान ने इंसान को बनाया तो शैतान को भी नहीं मारा। इक़बाल का एक शेर है-

'गर तुझे फ़ुरसत मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह से
क़िस्सा-ए-आदम को रंगीं कर गया किसका लहू।

फ़िल्मी गीत-संगीत एक व्यापार है, व्यापार चलता रहता है। जो गौर करने लायक बात है, वो यह कि पहले फिल्म-जगत में प्रवेश के लिए इस आधार पर पासपोर्ट मिलता था कि आपने कितनी बढ़िया शायरी की है। आप कितने जहीन हैं। शैलेन्द्र, साहिर, राजा मेंहदी अली खाँ, भरत व्यास आदि गीतकार यही पासपोर्ट लेकर दाखिल हुए थे। आज हालत यह है कि अगर आपमें ये विशेषताएँ हैं तो आपको बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। वजह है कि जैसा लिखवाने वाला, वैसा ही लिखने वाला। नए साल के लिए मैं अपना एक दोहा पाठकों को भेंट करना चाहता हूँ-

'किरकिट,नेता,एक्टर हर महफ़िल की शान
स्कूलों में क़ैद है, ग़ालिब का दीवान।

नई नस्ल के लिए मेरा यही सन्देश होगा कि वे स्कूलों में क़ैद ऐसे कई गालिबों को आज़ाद कराएँ और उनका नेताओं, एक्टरों और क्रिकेटरों से ज्यादा सम्मान करें। शुक्रिया!

मन की दुनिया को व्यक्त कर सकूँ :
निलय उपाध्याय (कवि)
इन दिनों मैं बहुत निजी किस्म का जीवन जी रहा हूँ। मेरा कोई सामाजिक जीवन नहीं है। अभी जिन संकटों के दौर से गुज़र रहा हूँ उसमें सार्वजनिक जीवन के लिए कोई जगह नहीं है। साल 2009 से मेरी यही अपेक्षा थी कि मेरे परिवार को दो जून का भोजन मिलता रहे। मेरे बच्चों की पढ़ाई चलती रहे। और पिछले साल यह पूरा हुआ। आने वाले साल में मैं यह चाहता हूँ कि इन जिम्मेदारियों से अलग होने का वक्त मिले, ताकि मैं अपने मन के भीतर बसी दुनिया के बारे में लोगों को बता सकूँ। कुछ कविताएँ लिख सकूँ। जो विकास-क्रम अथवा परिवर्त्तन मेरे भीतर आया है, उसको बता सकूँ।

साहित्यकारों से मेरा मोहभंग हो चुका है। अपने अपहरण काण्ड में फँसने की घटना की असलियत मैं अच्छी तरह से जान चुका हूँ। मैं अस्पताल में कंपाउंडर था और वेतन का आधा खर्च पत्र-पत्रिकाएँ खरीदने, सदस्य बनने और साहित्यिक यात्राओं में ख़र्च करता था। किन्तु एक मुसीबत आने के बाद जिस तरह प्रेम कुमार मणि से लेकर राजेन्द्र यादव तक ने मुझे सवर्ण करार दे दिया, उससे मेरे दिल को बहुत गहरा धक्का पहुँचा। पहली बार मुझे ये अहसास हुआ कि ये लोग रचनाकार भले ही बहुत अच्छे हों, आदमी बुरे हैं।

ये लोग साहित्य के पाँव में मोजे की तरह महक रहे हैं। इनके बारे में सोचने पर ये गंध ज्यादा परेशान करती है। यही लोग हैं जो जनता और साहित्य के बीच बैठकर दूरी पैदा कर रहे हैं।

अगले साल मैं जो भी करूँगा वह मेरी पारिवारिक परिस्थिति पर निर्भर करेगा। 45 साल की उम्र में किसी नई जगह, किसी नई विधा में जड़ें जमाना आसान नहीं होता। मैं जिस जगह पर हूँ, यानी मुंबई में, देश भर से आए लोग यहाँ हैं। मैं उनकी पीड़ा को व्यक्त करने और उनके जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करूँगा। अपनी कविताओं में यह बताऊँगा कि चाय पीते वक्त उनकी चीनी क्यों कम पड़ जाती है और दाल खाते वक्त नमक।

मानवीय तरलता बचीं रहे :
तुषार धवल (कवि)
यह उपभोक्तावादी ताकतों से युद्ध करने का समय है। बाज़ार इतनी तेजी से हमला कर रहा है कि सबको बस भागो और भोगो ही सूझ रहा है। मनुष्य के सोचने और विचार करने की शक्ति पर हमला करके उसे भोथरा बनाने का खेल जारी है। ऐसे में चाहता हूँ, कुछ ऐसा हो कि मानव के भीतर का मानव बचा रहे। वह मशीन न बन जाए। उपभोग की वस्तु न बन जाए। उसके भीतर की तरलता सुरक्षित रहे। आज आदमी का आदमी से जुड़ाव समाप्त हो रहा है ख़ास तौर पर मुंबई जैसे महानगरों में।

साहित्य जगत में एक तरह के विभ्रम की स्थिति है। यह तय नहीं हो पा रहा है कि हम किस दिशा में जाएँ। हमारी रचनाओं का कथ्य क्या हो, शिल्प क्या हो। खासकर कविता में। ऐसा समय है जब सारे वाद समाप्त हो गए हैं। दक्षिण या वाम का कोई सपना साकार नहीं होता दिख रहा है। सब ध्वस्त हैं। बाज़ार ने बुरी तरह प्रभावित किया है। साहित्य में समर्पित गतिविधियाँ थीं वे अब तात्कालिक सफलता और त्वरित यशप्राप्ति की कसरतों में तब्दील हो गई हैं। तरह-तरह के गुट और रैकेट चल रहे हैं। यह उपभोक्तावाद का असर है।

लेकिन मेरे मन में एक बड़ी उम्मीद है। खासकर अपनी पीढ़ी के कवियों से यह उम्मीद है कि कोई रास्ता निकलेगा। अब भी साहित्य में समर्पित लोग बचे हुए हैं। 2010 में तो नहीं, पर लगता है कि अगले 5-10 वर्षों में साहित्य की दिशा तय हो जाएगी।

भीतर के सूर्य को पहचानें :
शिरीष कुमार मौर्य (कवि)
सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर तब्दीलियों को लेकर मैं किंचित हताश हूँ। देखना बहुत कुछ चाहता हूँ। एक कवि-नागरिक होने के नाते चाहता हूँ कि नए साल में चीज़ों में सुधार आए। समाज कुछ और मानवीय बने। राजनीति कुछ विचारपरक हो। बाज़ारवाद का छद्म कुछ और उजागर हो। ख़ासतौर पर स्त्रियों और दलितों के प्रति सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में वाँछित बदलाव आए। रही सुकून की बात, तो आम आदमी को आज सुकून से ज़्यादा जीवन में घट रही घटनाओं के प्रति गहरी बेचैनी अधिक है। सुकून की मंज़िल फ़िलहाल एक स्वप्न है।

साहित्य जगत से मैं महज ऐसी अर्थवान आलोचना की उम्मीद करूँगा जो तथाकथित बड़े आलोचकों के घिसे-पिटे पुराने मूल्यों से परे हो और किसी को कुछ बना देने या उसे मिटा देने के थोथे अहंकार से मुक्त भी। कविगण (ख़ासकर युवा कवि) भी हिंदी के इन चाँद-तारों की छाया से बाहर आकर रचनात्मक ऊर्जा से भरे भीतर के सूर्य को पहचानें।

सूचना के साथ संवेदना भी हो :
कुमार अम्बुज (कवि)
पेड़ों और फसलों के लिए धरती पर लगातार कम होती जगह, पानी की मुश्किल, साम्राज्यवादी, पूंजीवादी समाज का रचाव और फैलाव। विकास के जनविरोधी प्रस्ताव। प्रतिरोध और आन्दोलनों की अनुपस्थिति। ये कुछ चिंताएँ हैं जिनसे अक्सर मैं इधर घिरा रहता हूँ। जैसे इन सब बातों के बीच एक तार जुड़ा है जो इन्हें एक साथ रखता है। इन पर अलग-अलग विचार किया जाना शायद संभव नहीं। इन पर एक साथ ही गौर करना जरूरी होगा। यह एक कुल चरित्र है और आफत है जो इस समय हमारे सामने रोज-रोज एक बड़े रूप में सामने आती जा रही है।

ऐसे में गुजरते वर्ष की एक रात बीतने भर से, किसी नई सुबह में एक निर्णायक उम्मीद संभव नहीं। लेकिन प्रयास हों कि मध्यवर्ग में कुछ उपभोग वृत्ति कम हो। उसकी बाज़ार केन्द्रित आक्रामकता में कमी आए। मनुष्यता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही चीज़ों के प्रति वह अपना प्रतिरोधात्मक विवेक दिखा सके तो यह नए साल की उपलब्धि होगी। वह सूचना और ज्ञान से संचालित होने के साथ-साथ संवेदना और करुणा से भी चालित हो। फासिज्म के जो लक्षण इटली और हिटलर की जर्मनी में दिखने लगे थे, वे सब आज हमारे देश में उपस्थित हैं। राजनीति अप्रत्याशित भ्रष्टाचार के पराक्रमों का उदाहरण बन कर रह गई है। नए साल में इन सब में अचानक कोई कमी आ सकेगी, ऐसी कोई आशा व्यर्थ है।

लेकिन मैं साहित्य से उम्मीद करता हूँ। यह ठीक है कि साहित्य अपनी भूमिका उतनी प्रखरता से नहीं निभा पा रहा है कि इस पतनशील और फासिस्ट समाज से लड़ने के लिए समुचित मार्गदर्शन और प्रेरणा दे सके। लेकिन साहित्य ही वह जगह होगी जहाँ से ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान संभव हो सकेगी और प्रतिरोध के उपाय भी दिखेंगे। साहित्य में कलावाद का ज़ोर भी उठता दिखाई देता है। उसकी जगह जीवन के उत्स, संताप और स्वप्नशीलता के जीवंत तत्वों को देखने की आशा की जानी चाहिए। हिन्दी कहानी, कविता और उपन्यास जहाँ तक आ गए हैं, वहाँ से एक नए प्रस्थान व अग्रगामिता की शुभकामना है।

शिक्षा के उज्जवल अवसर हों :
चंद्रकांत देवताले (वरिष्ठ कवि)
जो उम्मीदें 1950 में थीं वे निरंतर कम होती जा रही हैं। भले ही लोग मुझे निराशावादी होने के कटघरे में खड़ा कर दें, इस देश की वास्तविक जनता के लिए मुझे 2010 में कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। यह सारा तमाशा अर्थशास्त्र का है और ज़िंदगी की बुनियादी समस्याएँ नेपथ्य में ढँकी हुई हैं।

भविष्य में मैं चाहूँगा कि शिक्षा के समान अवसर हों। जो शिक्षा अमीर आदमी के बेटे-बेटियों को मिलती है वही इस देश के गरीब आदमी के बच्चों को मिलना चाहिए। स्वास्थ्य सुविधाएँ, स्वच्छता की सुविधाएँ, गाँवों, दलित बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में, सब जगह एक जैसी होना चाहिए। जनता के प्रतिनिधि, संसद में या विधानसभा में सदन का बहिष्कार करते हैं तो राष्ट्रीय संवैधानिक शपथ की अवमानना के आरोप में उन पर मुक़दमा चलाया जाए। उनकी सदस्यता समाप्त की जाए। जो अन्याय कमज़ोर और असमर्थ लोग भुगत रहे हैं, वह तुरंत समाप्त होना चाहिए। यह सपना पूरा होना बहुत कठिन है, इसलिए मुझे कोई खास उम्मीद नज़र नहीं आती। साहित्य बिरादरी से मैं यही अपेक्षा करूँगा कि वे शब्दों के गढ़ों और मठों से बाहर आएँ। जितना संभव हो, अपना प्रतिरोध सड़क पर दर्ज़ कराएँ।


कलात्मक अभिव्यक्तियाँ बढ़ें :
सुधीर रंजन सिंह (आलोचक)
अब तो लगता है कि दुनिया समझ से बाहर होती जा रही है और इसके कसूरवार भी हम ही लोग हैं। दुनिया हमारे न चाहते हुए भी इतनी दूर तक बदल गई है कि व्याख्याकार पीछे छूट गए। हमें लगता है कि व्याख्या में ही बदलने का काम संभव है।

जनता का जीवन सुकून से गुज़रे इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता। संस्कृति-कर्म को जनता एक भिन्न वस्तु मान लेती है। संस्कृति-कर्म के प्रति जनता में एक दायित्वहीनता है। संस्कृतिकर्मियों में जनता को लेकर एक क़िस्म की बेफ‍िक्री है। एक कलाकार अति आत्मविश्वास और महत्वाकांक्षा से इस प्रकार ग्रस्त हो जाता है कि वह किसी तरह से जीवन को उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं रहता। दूसरी तरफ जनता सोचती है कि कला उनकी पहुँच से बाहर है। हमारे पास जीवन निर्वाह के लिए नीरस गद्यात्मक संसार है।

साल 2010 में मैं चाहूँगा कि हमारा लेखन, हमारी कलात्मक अभिव्यक्तियाँ ज्यादा से ज्यादा हों। हमें मौजूदा सत्ता पर दबाव की तरह काम करना होगा। यह तब ही संभव है जब साहित्य में गुणात्मक परिवर्त्तन हों।

पाठक-वर्ग तैयार करना होगा :
पंकज बिष्ट (कथाकार)
मैं उम्मीद करता हूँ कि शासक वर्ग में बेहतर समझ जाग्रत होगी। दूसरी ओर आम जनता से भी उम्मीद करता हूँ कि अगले वर्षों में वह अधिकारों के प्रति सचेत होगी। साथी नागरिकों के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण अपनाएगी।

आर्थिक नीतियों से जो वर्ग लाभान्वित है, उसे समझना चाहिए कि यह सब किस कीमत पर उसे मिल रहा है। लोग विस्थापित हो रहे हैं। उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं। यदि विकास इस कीमत पर हो रहा है तो चेत जाना चाहिए। लोगों को जीने के अधिकार नहीं मिलेंगे तो तथाकथित आर्थिक सफलताएँ ज्यादा दिन नहीं टिकेगीं।

नए साल में यह देखना चाहूँगा कि सरकार द्वारा हो रही पुस्तकों की थोक खरीद बंद हो। इस प्रवृत्ति ने पूरे हिन्दी साहित्य को ख़त्म कर दिया है। अगर हमें अपने साहित्य को बचाना है तो हमारी पुस्तकों का वास्तविक ख़रीदार पाठक-वर्ग तैयार करना होगा।

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