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- विपुल रेग
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कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव होंगे। यानी कॉलेजों में चुनाव के जरिए लोकतंत्र बहाल होगा। भले ही चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होंगे, लेकिन इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री की हरी झंडी मिल चुकी है। यदि राज्यपाल इसे मंजूरी दे देंगे तो एक बार फिर कॉलेज परिसर नारों से गूँज उठेंगे और छात्र नेता छात्रों के मुद्दों पर गरमा-गरम बहस कर अपना पक्ष रखेंगे। वे अपना कक्षा प्रतिनिधि चुनेंगे, लेकिन चुनने के पहले उन्हें गुनने की जरूरत होगी ताकि वे सही प्रतिनिधि चुन सकें। अब छात्रों पर एक बड़ी जिम्मेदारी अण्णा हजारे के अहिंसक आंदोलन ने डाल दी है कि छात्र अब कैसे बिना किसी हिंसा के चुनावों को अंजाम देते हैं। यहीं से उनकी राजनीति की एक ऐसी शुरुआत होगी, जो देश की राजनीति में युवा जोश से कुछ बेहतर बदलाव कर सकेगी। इसलिए इस बार युवा की स्टोरी इसी मुद्दे पर एकाग्र है।

छात्रसंघ चुनाव यदि योग्य उम्मीदवारों के साथ निष्पक्ष और अहिंसक लड़े जाएँ तो देश की बूढ़ी होती राजनीति को बेहतर युवा नेतृत्व दिया जा सकता है। प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव की घोषणा के बाद छात्र नेता खुश हैं तो स्टूडेंट्‌स को माहौल बिगड़ने की आशंका है। ऐसी स्थिति में प्रशासन और कॉलेजों पर शांतिपूर्ण चुनाव करवाने की चुनौती है। इंदौर के यूथ के तेवरों से झलक रहा है कि वे पसंदीदा उम्मीदवार चुनने के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव भी बना सकते हैं। छात्र नेता तो इस घोषणा से खुश हैं, लेकिन स्टूडेंट्‌स में चुनाव का क्रेज नहीं दिख रहा है। वे चाहते हैं कि चुनाव में पूरी पारदर्शिता बरती जाए और हिंसा रोकने के लिए बाहरी तत्वों का प्रवेश सख्ती से रोका जाए। कई युवाओं से बातचीत करते समय महसूस हुआ कि वे एक कुशल नेतृत्व को चुनना चाहते हैं, लेकिन योग्य उम्मीदवारों की कमी भी शिद्‌दत से महसूस करते हैं। कई स्टूडेंट्‌स ने तो इन चुनावों के लिए बाकायदा लोकपाल बनाने का भी सुझाव दिया है।

नियमों का विवाद
1986 तक ये चुनाव पूरी तरह से प्रत्यक्ष प्रणाली से होते थे। इसमें छात्र सीधे कक्षा प्रतिनिधि और पैनल के सभी पदाधिकारियों को चुनते थे। बाद में चुनाव बंद कर मेरिट के आधार पर नियुक्ति होने लगी। 2001 में जब प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव होने लगे तो विवाद और हिंसा भी बढ़ने लगी। शहर के बड़े नेताओं की राजनीति क्लास रूम तक पहुँचने लगी। वंशवाद के चलते पैसेवालों और नेताओं के बच्चे छात्र राजनीति में दिखाई देने लगे। 2008 से मेरिट के आधार पर सीआर की नियुक्ति होने लगी तो माहौल और खराब होने लगा। काबिल युवाओं को चुनाव लड़ने नहीं दिया जाता था।

पूरी तरह प्रत्यक्ष प्रणाली से हों चुनाव
नए नियमों के तहत अब स्टूडेंट्‌स केवल कक्षा प्रतिनिधि (सीआर) ही प्रत्यक्ष रूप से चुन सकेंगे। उनको छात्रसंघ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और सहसचिव चुनने का अधिकार नहीं होगा। ऐसे में चुने जाने वाले पदाधिकारियों को लेकर स्टूडेंट्‌स और राजनीतिक दलों में सहमति बनना मुश्किल है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूर्व छात्र नेता गौरव रणदिवे ने कहा कि चुनाव पूरी तरह प्रत्यक्ष प्रणाली से होना चाहिए। चुनाव के लिए उचित माहौल बन सकता है, लेकिन उसके लिए जरूरी है कि स्टूडेंट्‌स पैनल के हर पदाधिकारी को वोट करने का अधिकार पाए। फिलहाल जो नियम बनाए गए हैं, उससे विवाद और बढ़ेंगे। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) के जिलाध्यक्ष विपिन वानखेड़े ने बताया कि हम तो चाहते हैं कि काबिल युवा आगे आएँ। यदि किसी को अपनी क्लास का सपोर्ट है तो भले ही कोई पार्टी उसके साथ न हो, फिर भी वो जीतेगा। एबीवीपी नेता दीपेंद्र पाल ने कहा कि नियमों में बदलाव बेहद जरूरी है। सरकार की यह प्रत्यक्ष प्रणाली दरअसल पूरी तरह अप्रत्यक्ष है।

क्या माँग है नेताओं की
* हिंसा रोकने के लिए गाइड लाइन बनाई जाए।
* प्रशासन किसी पार्टी विशेष की मदद न करे।
* कॉलेज में छात्रों के अलावा किसी को प्रवेश नहीं दिया जाए।
* कक्षा प्रतिनिधि से लेकर छात्रसंघ अध्यक्ष तक प्रत्यक्ष प्रणाली यानी छात्रों द्वारा ही चुना जाए।

गौर करें राजनीतिक दल
चुनाव की घोषणा के बाद कैम्पस में चर्चा का माहौल गरम हो गया है। स्टूडेंट्‌स से बातचीत में यह जाहिर हुआ कि वे चाहते हैं कि चुनाव में ईमानदारी बरती जाए। यदि राजनीतिक दल स्टूडेंट्‌स के सुझावों पर गौर करें तो शायद छात्रसंघ के चुनाव अहिंसक और आदर्श साबित हो सकते हैं।

युवाओं की राय
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चुनाव में पारदर्शिता हो : असलम शेख के अनुसार छात्रसंघ चुनावों में यदि हमें हिंसा को रोकना है और चुनावों में पारदर्शिता लाना है तो इसके लिए हर कॉलेज में लोकपाल की नियुक्ति की जाना चाहिए। चुनाव आयोग की तर्ज पर हर कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव हेतु एक कमीशन बनाया जाए, जो छात्रसंघ चुनाव पर कड़ी नजर रखने के साथ ही उसमें गड़बड़ियों का अंदेशा होने पर त्वरित कार्रवाई करे। इसी के साथ ही चुनाव में छात्रों को बहुमत से चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार का नाम पेश करने की आजादी मिले, जिससे कि कुशल नेतृत्व क्षमता वाले योग्य स्टूडेंट का नाम आगे आए। इसके चयनित होने पर छात्रों की समस्याओं के निवारण की आशा जाग सके।

बाहरी व्यक्ति नहीं : चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार की शैक्षणिक पृष्ठभूमि के साथ ही उसकी अन्य अतिरिक्त योग्यताओं का पूर्णतः मूल्यांकन किए जाने के बाद ही उसे छात्र-संघ चुनाव हेतु पात्र उम्मीदवार घोषित किया जाना चाहिए। ऐसा कहने वाले अनुराग पंड्‌या की मानें तो अक्सर ऐसा होता है कि छात्रसंघ चुनाव में छात्र तो कॉलेज प्रशासन से भय के कारण हिंसक राजनीति करने से गुरेज करते हैं, पर ऐसे में बाहरी व्यक्ति आकर छात्रों के बीच हिंसा फैलाने का प्रयास करते हैं। यदि ऐसा होता है तो ऐसे हुड़दंगियों के खिलाफ कॉलेज प्रशासन को सख्त कार्रवाई करना चाहिए।

कुशल नेतृत्व क्षमता : यदि छात्रसंघ चुनाव कॉलेज परिसर के भीतर ही सीमित रहे तो इसके अहिंसात्मक होने की संभावनाएँ थोड़ी कम हो जाती हैं। ऐसा मानने वाली नेहा रिछारिया के अनुसार बाहरी व्यक्तियों व राजनेताओं की दखल ही छात्रसंघ चुनाव को हिंसात्मक बनाती है। कुछ सालों से मैरिट के आधार पर छात्रों का कक्षा प्रतिनिधि चुना जाता है। इसकी बजाय छात्र के अंकों के साथ ही उसकी नेतृत्व क्षमता का भी परीक्षण करना चाहिए। उसके पश्चात ही उसे चुनाव हेतु पात्र माना जाना चाहिए।

चुनाव के पंच मंत्र : नितेश खरगोनकर के अनुसार छात्रसंघ चुनावों में छात्र की बेहतर शैक्षणिक पृष्ठभूमि, चुनाव में कॉलेज फैकल्टी की सही दखल (हर ग्रुप के साथ फैकल्टी सदस्यों में से एक मेंटर अनिवार्य), चुनाव की बाहरी असामाजिक तत्वों से दूरी, चुनाव में राजनीतिक हस्तक्षेप का अभाव और चुनाव के बजट पर नियंत्रण हेतु कमेटी का गठन आदि पाँच बिंदुओं पर विशेष गौर किया जाना चाहिए। यदि इन पाँच बातों पर अमल किया जाता है तो छात्रसंघ चुनावों में हिंसा होने का कोई कारण ही नहीं होगा।

कॉलेज प्रशासन से सीधा संपर्क : पूजा अहिरवाल मानती हैं कि छात्रसंघ के पदाधिकारियों का कॉलेज के डायरेक्टर से सीधा संबंध होना चाहिए, ताकि वे अपनी बात निडरता से सीधे उच्च अधिकारी तक पहुँचा सकें। छात्रसंघ चुनावों में व चुनाव के पश्चात कॉलेज में हिंसा का मुख्य कारण छात्रसंघ पदाधिकारी व कॉलेज प्रशासन के मध्य तालमेल का अभाव होता है। यदि छात्रसंघ पदाधिकारियों को अधिकारों के साथ-साथ सुरक्षा भी प्रदान की जाएँ तो बहुत हद तक इन चुनावों में हिंसा पर काबू पाया जा सकता है।

निष्पक्ष फैकल्टी : कई बार फैकल्टी का किसी दल विशेष की तरफ झुकाव भी छात्रों के मन में उनके प्रति अविश्वास पैदा करता है। छात्रसंघ चुनावों में हिंसा तभी होती है, जब छात्रों के प्रति फैकल्टी का रवैया ठीक नहीं होता है। ऐसा कहने वाली नंदिनी मीणा के अनुसार फैकल्टी को छात्रों के साथ निष्पक्ष रहना चाहिए, क्योंकि चुनाव अलग है और पढाई अलग। यदि दोनों का मेल करके फैकल्टी किसी छात्र के साथ भेदभाव करे तो यह अच्छा नहीं है।

नईदुनिया युवा के टॉक शो की असरदार भूमिका
नईदुनिया युवा ने 19 नवंबर 2009 को यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में एक मेगा टॉक शो किया था। इसमें शहर के कई कॉलेजों, जनप्रतिनिधियों, पूर्व पुलिस अधिकारियों और छात्र नेताओं ने हिस्सा लिया था। टॉक शो का विषय था- कहाँ खो गया छात्र नेतृत्व। वस्तुतः इस टॉक शो का उद्देश्य ही यही था कि कॉलेजों में छात्रसंघ के चुनावों में इससे जुड़े पक्षों के बीच एक सार्थक संवाद की शुरुआत हो। इस टॉक शो को जबर्दस्त रिस्पाँस मिला था। इसके बाद यह टॉक शो शहर के कई कॉलेजों में आयोजित किया गया, ताकि युवाओं की आवाज को बुलंद किया जा सके। उसे प्रदेश सरकार तक पहुँचाया जा सके। इन टॉक शोज के जरिए युवाओं ने अपने विचारों को खुलकर व्यक्त किया। अब प्रदेश सरकार ने छात्रसंघ चुनाव कराने का मार्ग खोल दिया है। जाहिर है इस फैसले में नईदुनिया युवा टॉक शो की असरदार भूमिका को महसूस किया जा सकता है।

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