आज से खिलाना बंद, पिलाना शुरू
इन दिनों टाटा टी के विज्ञापन 'जागो रे' में भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के तहत प्रोडक्ट के साथ समाज को जागरूक बनाने की कोशिश की जा रही है। इस विज्ञापन में एक भ्रष्ट व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कहता है कि खाएँगे नहीं, तो काम कैसे करेंगे। तब एक युवक उस व्यक्ति से कहता है कि खाइए, खाइए सर, ठाट से खाइए। अँगुली चाट के खाइए। अब देखिए, कोई छुप के खाता है, तो कोई शरमा के। कोई नीचे से खाता है तो कोई खुलेआम खाता है। हे भगवान, आपके नाम से भी खाते है और कोई उपवास नहीं, 24 घंटे खाते हैं। खाने वाला भी खिलाता है। देख लो बनते हैं महात्मा पर नोंच-नोंच के खाते हैं। लेकिन आपको पता है ये लोग इतना क्यों खाते हैं क्योंकि हम खिलाते हैं। फिर वह युवक दृढ़ता के साथ कहता है - लेकिन आज से 'खिलाना बंद, पिलाना शुरू।' हर सुबह सिर्फ उठो मत, जागो भी। इस एक विज्ञापन में हमारी देश की कई समस्याओं की जड़ भ्रष्टाचार के खिलाफ ये कुछ प्रभावी चंद पंक्तियाँ लोगों को जागरूक करने का काम कर रही है। जाहिर है एड में यह बीड़ा उठाया है युवाओं ने। 'खिलाना बंद, पिलाना शुरू' जैसी प्रभावी और दिलचस्प पंच लाइन के साथ ही इसी एड पर कुछ युवाओं से 'नईदुनिया युवा' ने जानी उनकी राय। ऋषभ जैन कहते हैं कि आज हमारे देश में आंतकवाद और बेरोजगारी जैसी समस्याओं को बढ़ाने में भ्रष्टाचार सहायक है क्योंकि किसी होनहार युवा को बेरोजगार बनाने में कई हद तक यह भ्रष्टाचार ही मुख्य भूमिका निभाता है। किसी भी युवा को यदि आज किसी अच्छे संस्थान में नौकरी करने की चाहत है तो उसमें प्रतिभा से ज्यादा कुछ खिलाने की शक्ति होना आज इस देश में जरूरी हो गया है। लेकिन कई मायनों में इस भ्रष्टाचार को बढ़ाने में किसी भ्रष्ट व्यक्ति के साथ हम खुद भी उतने ही जिम्मेदार होते हैं क्योंकि हम यह मानते हैं कि खिलाने से ही हमारे काम होंगे, इसके बिना नहीं। अखिलेश शर्मा ने कहा कि किसी भी समस्या के लिए हमें हमारी जिम्मेदारी भी महसूस करना चाहिए। आज हर व्यक्ति किसी भी समस्या पर अपनी राय और उस पर विचार मंथन करना जानता हैं लेकिन देश के विकास के लिए राय देने से ज्यादा युवा को उस समस्या का हल निकालना जरूरी है। किसी भी समस्या के लिए हर कोई किसी दूसरे इंसान को गलत साबित कर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लेते हैं। प्रशासन से लेकर राजनीति तक हर किसी को केवल कोसते ही रहते हैं लेकिन आज यदि देश की समस्या का वास्तविक हल निकालना है तो युवाओं को ही एक नई सोच के साथ नई पहल करने की कोशिश करना चाहिए। यह विज्ञापन भी एक तरह से यही बात कहने की कोशिश करता है। निधि पांडे ने कहा कि हर कोई केवल देश की बड़ी समस्याओं की ओर ध्यान देता है लेकिन कोई भी इन समस्याओं के निर्माण में सहायक छोटी समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देता है। जैसा कि किसी कॉलेज में कमजोर विद्यार्थी कुछ खिलाकर वहाँ गलत तरीके से एडमिशन ले लेता है और होनहार विद्यार्थी के लिए वह कॉलेज केवल एक सपना बनकर रह जाता है। इसी के बाद वह हताश होनहार भी कुछ खास बनने की चाह में गलत राह पर चला जाता है। विद्यार्थी के जीवन की एक असफलता समय के साथ देश के लिए बहुत बड़ी समस्या बन जाती है। इसलिए हमें खिलाना बंद करके पिलाना शुरू कर देना चाहिए ताकि हम सही समय पर उठे ही नहीं, जाग भी जाएँ। तो आओ साथियों खिलाना बंद करें और पिलाना शुरू करें।