भारत 1947 में स्वतंत्रता के बाद से औद्योगिक विकास के अपने मार्ग पर अग्रसर हुआ। 1948 का औद्योगिक नीति प्रस्ताव, भारतीय औद्योगिक नीति के विकासक्रम की शुरुआत सिद्ध हुआ। इस प्रस्ताव से न केवल नीति की व्यापक रूपरेखा परिभाषित की गई, बल्कि औद्योगिक विकास में एक उद्यमी और प्राधिकारी के रूप में सरकार की भूमिका भी तय हुई। 1956 के औद्योगिक नीति प्रस्ताव से अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र को महत्वपूर्ण भूमिका मिली।
सरकार ने जुलाई 1991 के बाद से औद्योगिक नीति के तहत जो कदम उठाए, उनका उद्देश्य देश की पिछली औद्योगिक उपलब्धियों को मजबूती प्रदान करना और भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की प्रक्रिया में तेजी लाना था। सुधार की प्रक्रिया अब भी जारी है।
औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति
वर्ष 1991 में नई औद्योगिक नीति लागू होने के बाद विभिन्न नियंत्रणों को समाप्त करने का एक व्यापक कार्यक्रम शुरू किया गया। ज्यादातर वस्तुओं के लिए औद्योगिक लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई। अगस्त 2008 में विभाग ने उद्योगों की स्थिति संबंधी लाइसेंसिंग जरूरत समाप्त करने का भी फैसला किया है।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) घरेलू निवेशों का पूरक और निवेश बचत अंतर को पाटने का सेतु होता है। सरकार ने उदार और निवेशक हितैषी नीति बनाई है, जिसके तहत अधिकांश गतिविधियों के क्षेत्रों में ऑटोमैटिक रूट से 100 प्रश एफडीआई संभव है।
विदेशी निवेश कार्यान्वयन प्राधिकरण (एफआईआईए)
विदेशी निवेश कार्यान्वयन प्राधिकरण की स्थापना का उद्देश्य विदेशी निवेश अनुमोदनों को जल्दी कार्यान्वित करने का काम आसान बनाना है। इसके साथ ही यह विदेशी निवेशकों को आवश्यक अनुमोदन पाने में सहायता करने तथा एक बार में अनुमोदन पश्चात सेवाएँ दिलाता है, उनकी संचालन संबंधी मुश्किलें दूर करता है और निवेशकों की समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न सरकारी एजेंसियों से संपर्क करता है। एफआईआईए विभिन्न क्षेत्रों या देशों के निवेशकों के साथ नियमित संपर्क करता है। इन संपर्कों के दौरान भारत सरकार के अतिरिक्त राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी भी भाग लेते हैं। सीआईआई, फिक्की, एसोचैम जैसे शीर्ष व्यापार संगठनों को भी बुलाया जाता है।ई- बिज परियोजना विभाग ने एम ई-बिज परियोजना शुरू की है, जो एनईजीपी के अंतर्गत एक मिशन मोड परियोजना है। इसका उद्देश्य अनेक व्यापार उपभोक्ताओं को उनकी कार्य की पूरी अवधि के दौरान अनेक प्रकार की सेवाएँ उपलब्ध कराना है। औद्योगिक गलियारा परियोजना यह परियोजना विश्व स्तर की प्रतियोगितात्मक परिस्थितियों में अत्याधुनिक बुनियादी ढाँचा खड़ा करके विदेशी निवेश को बढ़ावा देते हुए सतत विकास लक्ष्य पूरा करने के उद्देश्य से शुरू की गई है। इस परियोजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश में कार्य आरंभ हो चुका है।निवेश संवर्धन व अंतरराष्ट्रीय सहयोग यह विभाग भारत के हंगरी, लीबिया, स्वीडन, पोलैंड, बेलारूस के बीच परस्पर संयुक्त आयोग की बैठकें आयोजित करने के लिए एक नोडल प्वाइंट की हैसियत से काम करता है। इसका उद्देश्य उक्त देशों के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ाना है।भारत के इंजीनियरिंग उद्योग इंजीनियरिंग उद्योग अर्थ-व्यवस्था का मेरूदंड है और अप्रत्यक्ष रूप से अनेक उद्योगों के साथ जुड़ा है। यह उद्योग प्रमुख क्षेत्रों जैसे बिजली मूल संरचना, खनन, तेल और गैस तथा सामान्य निर्माता क्षेत्र, उपभोक्ता माल उद्योग, ओटोमेटिव तथा प्रसंस्करण क्षेत्र की माँग वृद्धि से तेज होता है। इसके अंतर्गत बिजली तार एवं केबल उद्योग, ट्रांसमिशन टावर, क्रेन, लिफ्ट और एस्कलेटर, रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, एयर कंडीशनर्स, लेड एसिड स्टोरेज बैट्रीज, ड्राई सेल बैटरी, इलेक्ट्रिकल लैंप व ट्यूब आदि उद्योग आते हैं।लाइट इंजीनियरी उद्योग क्षेत्र यह बहुआयामी क्षेत्र है और इसमें कई प्रकार के प्रमुख उत्पाद शामिल हैं। इनमें कॉस्टिंग और फोर्जिंग से लेकर अति आधुनिक माइक्रो-प्रोसेसर आधारित प्रोसेस कंट्रोल उपस्कर व चिकित्सा में काम आने वाले उपकरण आते हैं। इस समूह में बीयरिंग, स्टील पाइप, ट्यूब, नट बोल्ट आदि भी आते हैं।