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ऑटोमोबाइल उद्योग

भाग 5

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ऑटोमोबाइल उद्योग को जुलाई 1991 में नई औद्योगिक नीति की घोषणा के साथ लाइसेंस प्रणाली से मुक्त कर दिया गया था, जबकि पैसेंजर कारों को 1993 में लाइसेंस प्रणाली से मुक्त किया गया। कुछ विशेष मामलों को छोड़कर ऑटोमोबाइल उत्पादन की किसी इकाई की स्थापना के लिए किसी औद्योगिक लाइसेंस की जरूरत नहीं होती है। इस उद्योग को विश्व के साथ प्रतिस्पर्धी बनाने के उद्देश्य से पैसेंजर कारों सहित विभिन्न वाहनों के उत्पादन के लिए विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी के आयात संबंधी नियमों को साल-दर-साल उदार बनाया गया। इस समय इस क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को स्वतः मंजूरी के दायरे में रखा गया है।

* वर्ष 2001 से मात्रात्मक प्रतिबंधों को हटाए जाने के साथ वाहन आयात को डीजी एफटी की ओर से अधिसूचित कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे दी गई। यह छूट पैसेंजर कारों के लिए भी लागू है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि पुराने और उपयोग में लाए गए विदेशी वाहनों के लिए भारत डंपिंग ग्राउंड नहीं बने, पैसेंजर कारों सहित पुराने वाहनों के आयात पर 100 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाया जाता है। पूर्ण रूप से निर्मित नए वाहनों पर सीमा शुल्क 60 प्रतिशत रखा गया है।

* उदारीकरण तथा नए एवं आधुनिक मॉडलों की गाड़ियों के आगमन के साथ बाजार में वाहनों की माँग में तेजी आई। वर्ष 1992-97 के बीच ऑटो उद्योग ने कुल मिलाकर 16 प्रतिशत की संचित वार्षिक विकास दर हासिल की थी। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में ऑटो उद्योग की हिस्सेदारी वर्ष 2006-07 में बढ़कर 5.5 प्रतिशत हो गई थी। इसके बाद के वर्षों में भी यह दर लगातार वृद्धि करती रही।

* भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को धीरे-धीरे विश्वभर में मान्यता मिल रही है। हालाँकि वाहनों के निर्यात की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन इस क्षेत्र की पूरी संभावनाओं का इस्तेमाल किया जाना बाकी है। यह महत्वपूर्ण है कि गत 5 वर्षों के दौरान इस क्षेत्र में खास तौर पर कारों और दुपहिए/तिपहिए वाहनों के निर्यात में वृद्धि हुई है। पिछले 5 वर्षों में इस क्षेत्र में 40 प्रतिशत से अधिक की दर से वृद्धि हुई है।

* सरकार ने वर्ष 2007 में भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उपक्रम मंत्रालय द्वारा ऑटोमोटिव मिशन योजना 2006-2016 आरंभ की थी। इस योजना का उद्देश्य ऑटोमोबाइल तथा ऑटो कलपुर्जें आदि की डिजाइन एवं उत्पादन के मामले में विश्व में भारत की पहचान को एक महत्वपूर्ण मंजिल के रूप में कायम करना है। उत्पादन को 145 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुँचाना है, ताकि सकल घरेलू उत्पाद में उसकी भागीदारी 10 प्रतिशत से अधिक हो और 2016 तक ढाई करोड़ लोगों के लिए रोजगार के अतिरिक्त अवसर सृजित हो।

* भारतीय ऑटो उद्योग को विश्व के नक्शे पर लाने के लिए सरकार की ओर से महत्वपूर्ण पहल 1718 करोड़ रुपए की कुल लागत से राष्ट्रीय ऑटोमोटिव परीक्षण एवं अनुसंधान एवं विकास संरचना परियोजना (नैट्रिव) की शुरुआत करना है। इस परियोजना में विश्व स्तर के तीन परीक्षण केंद्रों की स्थापना करना तथा देश में आधार मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है। इन तीन परीक्षण केंद्रों की स्थापना के बाद से सरकार तेजी से विकसित हो रहे ऑटो क्षेत्र के लिए दक्षिण एशिया में महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धी अनुसंधान एवं विकास संरचना तैयार करने में सक्षम हो जाएगी।

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