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कहीं पैसा न बन जाए जी का जंजाल

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अपराध
- गायत्री शर्मा
जो तेरा है वो मेरा क्यों नहीं... सोने के गहनों से प्यार और रातों-रात करोड़पति बनने की चाह ही बन गई अश्लेषा देशपांडे के तिहरे हत्याकांड की मास्टरमाइंड नेहा वर्मा के लिए जी का जंजाल। यह सच है कि पैसा, प्यार और पब्लिसिटी की लालसा कभी-कभी युवाओं पर इतनी अधिक हावी हो जाती है कि उसे पूरा करने के लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते हैं। रातों-रात धनवान बनने की ख्वाहिश, महँगाई के दौर में आमदनी से अधिक खर्च से बिगड़ते हालात, दूसरों को आगे बढ़ता देख मन में पैदा हुआ ईर्ष्या भाव और प्यार को पाने के लिए पैसों की चाह... यही कुछ मुख्य कारण होते हैं युवाओं में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति के।

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मनोचिकित्सक युवाओं बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति को न्यूरोट्रांसमीटर केमिकल का असंतुलन कहते हैं। कुछ लोग इसे क्रोध, ईर्ष्या व धनप्राप्ति की इच्छा के लालच में उठाया गया एक गलत कदम। पैसे का प्यार व रिश्तों पर हावी हो जाना कहीं न कहीं रिश्तों में अविश्वास व अपराधों का कारण बन जाता है। हर वक्त पैसा-पैसा करना, पैसों के पीछे पागलों की तरह भागना और पैसों का अत्यधिक प्रदर्शन करना कई बार आपको मौत के मुँह तक भी खींच ले जा सकता है।

महँगाई के दौर में कार, क्लब, शीशा, लेटनाइट पॉर्टीज जैसे महँगे शौक जब युवाओं की जेब पर भारी पड़ने लगते हैं, तब पैसा कमाने के शॉर्टकट तरीके चाहे-अनचाहे उनके दिमाग में घर करने लगते हैं। यही वजह है कि पैसा पाने के लिए युवा अपराधों की काली दुनिया में कदम बढाते हैं। यदि हम इंदौर शहर की ही बात करें तो अकेले इंदौर में वर्ष 2010 में हत्या, अपहरण व लूट के लगभग 246 मामलों में युवाओं का लिप्त होना पाया गया है।

धनवान बनने के शॉर्टकट तरीके
हाल ही में घटित हुए मेडिकेप्स कॉलेज की छात्रा अश्लेषा देशपांडे के
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हत्याकांड का जिक्र इन दिनों युवाओं के बीच चर्चा का विषय बन गया है और जब इस हत्याकांड की मास्टरमाइंड के रूप में एक कॉलेज स्टूडेंट्‌स नेहा वर्मा का नाम सामने आया, तब इस चर्चा का लगातार सुर्खियों में रहना कुछ स्वाभाविक था। आईएमएस परिसर में श्वेता गोयल, निकिता पुरंदरे, खुशबू चंदेल, कुशल शर्मा और ऋचा सिंह में भी इसी बात को लेकर बहस छिड़ी थी कि आखिर वह कौन-सी वजहें थीं, जिसके चलते नेहा, राहुल और गोविंदा ने पैसा पाने का शॉर्टकट तरीका अपनाते हुए देशपांडे परिवार के तीन लोगों को एकसाथ मौत की नींद सुला दिया।


इन स्टूडेंट्‌स ने चर्चा के दौरान आम आदमी के सुख-चैन को निगलने वाली महँगाई का जिक्र कुछ इस तरह से छेड़ा कि आजकल ब्राण्डेड कपड़ों पर लगने वाले टैक्स, पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम, ब्यूटी सेलूनों पर लगने वाले टैक्स आदि के रूप में महँगाई ने युवाओं के जेब खर्च को इतना अधिक बढ़ा दिया है कि अब उन्हें धन कमाने के शॉर्टकट तरीके खोजने पड़ रहे हैं। प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में युवा अब इस कदर फँस गया है कि दूसरों से आगे बढ़ने के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सच कहें तो आज लोगों में मानवता मर चुकी है। कब आपका दोस्त दुश्मन बन आपके ही खून का प्यासा बन जाए, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है।

दिमाग में केमिकल लोचा होन
बगैर मेहनत के लखपति बनने के शॉर्टकट तरीके दूसरों के स्टेटस को देख मन में पैदा हुआ ईर्ष्या भाव, नशावृत्ति आदि का हावी हो जाना ही युवाओं को अपराधों की ओर अग्रसर करता है। युवाओं के दिमाग में न्यूरोट्रांसमीटर केमिकल का असंतुलन भी उन्हें ऐसे कार्य करने को उत्प्रेरित करता है। यदि आपके मन में भी लगातार कुछ गलत विचार आ रहे हैं तो यह किसी बीमारी के लक्षण भी हो सकते हैं। ऐसे में आपको डॉक्टर की सलाह जरूर लेना चाहिए। - डॉ. आशीष गोयल (मनोचिकित्सक)

पैसे की अहमियत क्यों?
इस युग में पैसा सबके लिए जरूरी है। पैसों की चाह में कुछ लोग पैसा पाने के आसान तरीके भी खोज निकालते हैं, जो कहीं न कहीं उनके लिए मुसीबत का कारण बन जाते हैं। आजकल के युवा को घुमने के लिए महँगी गाड़ी, मौजमस्ती के लिए क्लब, स्टेटस दिखाने के लिए नए गैजेट्‌स चाहिए। हर चाह को पूरा करने के लिए उन्हें मिलने वाली पॉकेटमनी अपर्याप्त होती है। यही वजह है कि वे लूट, चोरी और अपहरण जैसे शॉर्टकट तरीकों से अपने शौक को पूरा करने के लिए धन जुटाते हैं। - डॉ. कन्हैया आहूजा (अर्थशास्त्री)

शिक्षा व समाज भी जिम्मेदार
उपभोक्तावादी समाज में विज्ञापन युवाओं के मन में लालसाएँ उत्पन्न करते हैं। लालसाओं को मेहनत से पूरा करने के बजाय कुछ युवा दिग्भ्रमित होकर जघन्य कार्यों में लिप्त हो जाते हैं। युवाओं में अपराधों में लिप्त होने के लिए जिम्मेदार उनकी मनोवृत्ति के साथ उनकी शिक्षा व समाज भी है। नई पीढ़ी को संस्कारवान बनाने का कार्य बेहद संजीदगी से किया जाना चाहिए। एक तरफ जहाँ अपराधों में लिप्त युवाओं को कठोर दंड दिया जाए, वहीं उनकी परवरिश, शिक्षा और समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन करने की कोशिश की जाए। - डॉ. पीएन मिश्रा (समाजशास्त्री)

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