- अभिषेक
भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना काफी हद तक विकसित हो गई है। अब भारत पुरातनपंथी और संकीर्ण मानसिकता वाला समाज नहीं रहा, जैसा कि यह पहले था। दिनोंदिन यह नए विचारों को लेकर खुलता जा रहा है। ऐसे समय में सेंसरशिप और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। न केवल यह तय करना कि क्या सही और क्या गलत है वरन समाज की नमनीयता किस गति से बढ़ रही है, यह तय करना भी बहुत मुश्किल है। ऐसे समय में यह समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि असली सेंसरशिप क्या है और क्या लोकप्रियता अथवा इसकी कमी ही सबसे बड़ी सेंसरशिप है।
एक जमाना था जब सेक्स, हिंसा और नशीले पदार्थों जैसी तीनों चीजों को हमेशा ही भारत में घरों के दरवाजों के पीछे तक ही सीमित रखा जाता था। पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों तथा टीवी पर इनका सीधा उल्लेख वर्जित था और ये ऐसे विषय थे जिनके बारे में पीढ़ियों के बीच बड़ी मुश्किल से ही संवाद होता था और इसके बाद प्रवृत्तियों में भारी बदलाव देखा गया और भारतीय सिनेमा और मीडिया में हिंसा, सेक्स और नशीले पदार्थों के उपयोग व अन्य विषयों को लेकर जो वर्जनाएँ थीं, वे ढह गईं और इनकी एकाएक बढ़ोतरी देखी गई।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारी सेंसरशिप नीतियों में खुलापन आ गया है वरन सच तो यह है कि इन बातों को लेकर लोगों की स्वीकार्यता का स्तर बहुत बढ़ गया है। औसत दर्शक, औसत पाठक की पसंद या नापसंद ही वास्तविक सेंसर बन गई है। मीडिया भी एक उद्योग है और बहुत लाभदायक भी, इस कारण से प्रत्येक प्रोड्यूसर, प्रत्येक पत्रकार, प्रत्येक प्रेजेंटर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास सही खबरों और विचारों को लाने के लिए नहीं करता है, वरन वे यह देने की कोशिश करते हैं कि उपभोक्ता आधार या पाठक और दर्शक क्या सबसे ज्यादा पसंद करता है। अगर पाठकों, दर्शकों को गपशप पसंद है तो गपशप मिल जाएगी, अगर सेक्स बिकता है तो सेक्स ही परोसा जाता है और अगर शराब निर्माताओं से भारी आमदनी होती है तो मीडिया को व्हिस्की को भी विस्तृत कवरेज देने से परहेज नहीं होता है।
ऐसे समय में प्रदर्शित व पाठ्य सामग्री (कॉन्टेंट) की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता है। पैसे तो आखिर टीआरपी बढ़ने के साथ ही मिलते हैं। तेजी से बदलती मानसिकता और पहले कभी नहीं सुनी गई या देखी गई चीजों के अनुभव के इस दौर में लोग यह नहीं जानते कि क्या अच्छा और क्या बुरा है, वे केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उनकी समझ को क्या गुदगुदाता है। ऐसे समय में सेंसरशिप संस्थाओं की भूमिका और भी कठिन हो जाती है और कभी यह बेकार भी लगती है। आप मीडिया के कुछ हिस्सों पर रोक लगा सकते हैं, लेकिन लोगों की स्वाभाविक बुद्धि पर रोक नहीं लगा सकते हैं। अब इंटरनेट के जमाने में ब्रॉडकास्ट और प्रिंट मीडिया को नए-नवेले इंटरनेट से भी मुकाबला करना है जो कि बिना किसी लगाम के घोड़े जैसा है। इसलिए न केवल संपादकीय गुणवत्ता, वरन दर्शकों और पाठकों की संख्या को लेकर भी वर्चस्व की लड़ाई होती है।
इस तरह गलाकाट प्रतियोगिता के प्रत्येक कारोबार में उपभोक्ता ही राजा है। वह जो चाहता है उसे मिलता है। यह स्थिति कितनी अच्छी या बुरी है यह तो समय ही बताएगा, लेकिन सारे संकेत तो खराब समाप्ति के दिखाई देते हैं। संपादकीय स्तर नीचे जा चुका है और समूचा मीडिया उद्योग अपनी मनोरंजन वैल्यू को बढ़ाने में लगा है। ज्यादातर अवसरों पर मीडिया के महत्व और इसके आधार को दरकिनार कर इसकी चमक-दमक और ऐसी ही चीजों पर ध्यान दिया जाता है।
अगर आप नहीं चाहते हैं कि आपके बच्चे अधनंगे लोगों की तस्वीरों को देखते हुए और बस मौज-मस्ती करते सितारों को नशे में धुत देखते हुए बड़े हों, और आप चाहते हैं कि आपके बच्चे अशिक्षा और गरीबी जैसे मामलों पर भी जानकारी रखें और न केवल नामचीन हस्तियों के जीवन के बारे में ही जानें, और आप अगर यह भी नहीं चाहते कि आपके बच्चे भी अशिक्षित लोगों की तरह भाषा का ज्ञान रखें तो यह चुनने का मौका आपके पास है। आप ही चयन करें कि आप क्या पढ़ना चाहते हैं और क्या देखना चाहते हैं।