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धुएँ में मिटता किशोर

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किशोर
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आज शहर में शीशा पार्लरों की धूम है। 13 साल से लेकर 50 वर्ष तक की उम्र के लोग आम तौर पर इन जगहों पर इन फ्लेवर्ड हुक्कों से धुएँ के छल्ले बनाते पाए जा सकते हैं। इंदौर में 20 से अधिक कॉफी शॉप, रेस्टोरेंट आदि में शीशा मिलता है।

इसके बावजूद इनमें से किसी भी जगह पर शीशा- सेवन के लिए निर्धारित 18 वर्ष की आयु सीमा का सख्ती से पालन नहीं किया जाता। पुलिस ने भी कुछ महीनों की सख्ती के बाद अब सुस्ती दिखाना शुरू कर दी है। इन सब के बीच, एक बड़ी बात यह भी है कि लोगों को शीशा के दुष्प्रभावों के बारे में न के बराबर जानकारी है।

क्या है शहर में स्थिति :
इंदौर में एक भी शीशा-पार्लर में नियमित तौर पर आयु-प्रूफ नहीं माँगा जाता। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू समेत अन्य कई बड़े शहरों में 18 वर्ष से कम की आयु के लोगों को शीशा न देने को लेकर अत्यंत सख्ती बरती जाती है। पूछे जाने पर कि इंदौर में इसका पालन क्यों नहीं किया जाता, हमें शीशा-पार्लरों के संचालक व कर्मचारियों से कई तरह के बयान मिले। (पाइप)

'18 वर्ष से कम आयु के काफी लड़के हमारे रेग्यूलर कस्टमर हैं, उनसे आईडी माँगकर शीशा न देना हमारे लिए नुकसानदायक साबित होगा'

'यहाँ हर कोई बड़े बाप का बेटा है, आईडी माँगने पर अपने पिता की पहचान बताकर कई बच्चे हमें ही धमकाते हैं।'

'कोई हमें बहुत अधिक छोटा दिखता है, तो हम आईडी माँग लेते हैं। 1 6-17 साल के कई लड़के भी 18 के ही दिखते हैं, उनसे आईडी नहीं माँगते।'

'जब पुलिस सख्त रवैया दिखाती है, तब आईडी माँग लेते हैं, लेकिन ऐसा कम ही होता है। जब नए नियम लागू हुए थे, तब पुलिस ने सख्ती दिखाई थी, लेकिन कुछ महीने बाद ही सुस्ती आ गई।'

मकरंद देउस्कर, एसपी पूर्वी क्षेत्र, इंदौर के अनुसार 'सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट, फ्लेवर्ड हुक्का या तंबाखू से बना ऐसा कोई भी उत्पाद जिससे धुआँ निकलता हो, का प्रयोग वर्जित है। होटल्स व रेस्टोरेंट में फ्लेवर्ड हुक्के के प्रयोग की जानकारी मुझे नहीं है लेकिन यदि उसमें तंबाकू का प्रयोग हो रहा है तो वह नियम विरुद्ध है। जाँच के बाद कार्रवाई की जाएगी।'

अमेरिका में लग चुका है बैन :
चौंकाने वाली बात यह है कि ओबामा सरकार पिछले साल नवंबर में अमेरिका में शीशा पर प्रतिबंध लगा चुकी है क्योंकि फ्लेवर्ड हुक्के बच्चों को आसानी से आकर्षित करते हैं और छोटी उम्र से ही निकोटिन और धुएँ के प्रति एक्स्पोजर बढ़ाते हैं। कुछ योरपीय देश भी युवाओं के स्वास्थ्य को देखते हुए इस तरह का निर्णय लेने पर विचार कर रहे हैं। हालाँकि भारत में स्थिति ठीक उलटी है और 2009 में देश में शीशा पार्लरों की संख्या में 100 प्रतिशत से भी अधिक वृद्धि हुई है।

स्वास्थ्य विभाग भी सुस्त :
भारत में 13 से 16 के आयु-वर्ग में 13 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमणि रामदोस ने 2008 में यह घोषणा की थी कि इस समस्या से निपटने के लिए हर जिले को 22 लाख रुपए आवंटित किए जाएँगे। यह पैसा लोगों में विशेषतौर पर छात्रों में जागरूकता बढ़ाने के लिए दिया गया था।

'धूम्रपान निषेध नीति के तहत इंदौर को अब तक कोई आवंटन सरकार की ओर से प्राप्त नहीं हुआ है।'
- राकेश श्रीवास्तव (कलेक्टर, इंदौर)

स्कूली छात्रों में तंबाकू निषेध के प्रति जागृति के लिए खंडवा व ग्वालियर जिलों में केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग से 2008-09 के लिए 12-12 लाख रु. मिले हैं।'
-डॉ. बीएम श्रीवास्तव, नोडल अधिकारी (तंबाकू निषेध कार्यक्रम)

शीशा के दुष्प्रभाव :

1. शीशा का पानी धुएँ को पूरी तरह से साफ़ नहीं करता।

2. शीशा-सेवन व्यसनकारी (अडिक्टिव) होता है।

3. शीशा से निकलने वाले धुएँ में कार्बन मोनो-ऑक्साइड भी होता है।

4. शीशा से निकलने वाले धुएँ में कई हानिकारक केमिकल जिनसे ट्यूमर और कैंसर हो सकता है, सिगरेट से निकलने वाले धुएँ से भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

5. शीशा से निकलने वाले धुएँ में सिगरेट के धुएँ के मुकाबले बहुत अधिक मात्रा में निकोटिन और टार पाया जाता है।

6. शीशा से निकलने वाले धुएँ में सिगरेट के धुएँ के मुकाबले अधिक मात्रा में लेड, निकल, आर्सेनिक आदि ज़हरीली धातुएँ पाई जाती हैं।

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