देश भर में निचली अदालतों का कामकाज और उसका ढाँचा लगभग एक जैसा है। अदालतों का दर्जा इनके कामकाज को निर्धारित करता है। ये अदालतें अपने अधिकारों के आधार पर सभी प्रकार के दीवानी और आपराधिक मामलों का निपटारा करती हैं। ये अदालतें नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 और अपराध प्रक्रिया संहिता, 1973 के आधार पर कार्य करती हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 235 के अनुसार अधीनस्थ न्यायिक सेवाओं के सदस्यों पर प्रशासनिक नियंत्रण उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आता है। अनुच्छेद 233 और 234 के साथ अनुच्छेद 309 के प्रावधानों के तहत, प्रदत्त अधिकारों के संदर्भ में, राज्य सरकारें उच्च न्यायालय के साथ परामर्श के बाद इन राज्यों के लिए नियम और विनियम बनाएगी। राज्य न्यायिक सेवाओं के सदस्य इन नियमों और विनियमों द्वारा शासित होंगे। न्यायिक अधिकारियों को सेवा के दौरान प्रशिक्षण देने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की स्थापना की है।
कानूनी सहायता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39 ए में सभी के लिए न्याय सुनिश्चित किया गया है और गरीबों तथा समाज के कमजोर वर्गों के लिए निःशुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुच्छेद 14 और 22 (1) के तहत राज्य का यह उत्तरदायित्व है कि वह सबके लिए समान अवसर सुनिश्चित करे। समानता के आधार पर समाज के कमजोर वर्गों को सक्षम विधि सेवाएँ प्रदान करने के लिए एक तंत्र की स्थापना करने के लिए वर्ष 1987 में विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम पास किया गया। इसी के तहत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) का गठन किया गया। इसका काम कानूनी सहायता कार्यक्रम लागू करना और उसका मूल्यांकन एवं निगरानी करना है। साथ ही, इस अधिनियम के अंतर्गत कानूनी सेवाएँ उपलब्ध कराना भी इसका काम है।
नालसा के कार्य नालसा देश भर के कानूनी सहायता कार्यक्रम और स्कीमें लागू करने के लिए राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण पर दिशा-निर्देश जारी करता है। मुख्य रूप से राज्य कानूनी सहायता प्राधिकरण, जिला कानूनी सहायता प्राधिकरण, तालुक कानूनी सहायता समितियों आदि को दो कार्य नियमित आधार पर करते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। 1 सुपात्र लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करना। 2 विवादों को सौहार्द्रपूर्ण ढंग से निपटाने के लिए लोक अदालतों का संचालन करना।
मुफ्त कानूनी सेवाएँ इसके अंतर्गत आने वाली कानूनी सेवाएँ हैं- 1. किसी कानूनी कार्यवाही में कोर्ट फीस और देय अन्य सभी प्रभार अदा करना। 2. कानूनी कार्यवाही में वकील उपलब्ध कराना। 3. कानूनी कार्यवाही में आदेशों आदि की प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त करना। 4. कानूनी कार्यवाही में अपील और दस्तावेज का अनुवाद और छपाई सहित पेपर बुक तैयार करना।
मुफ्त कानूनी सहायता पाने के पात्र : 1. महिलाएँ और बच्चे। 2. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्य। 3. औद्योगिक मिक। 4. बड़ी आपदाओं, हिंसा, बाढ़, सूखे, भूकम्प और औद्योगिक आपदाओं के शिकार लोग। 5. विकलांग व्यक्ति। 6. हिरासत में रखे गए लोग। 7. ऐसे व्यक्ति, जिनकी वार्षिक आय 50,000 रुपए से अधिक नहीं है। 8. बेगार या अवैध मानव व्यापार के शिकार।