यह खबर अपमानित गरीबी का फिर से अपमान करती है। शहरों में 32 रुपए रोज और गाँवों में 26 रुपए रोज कमाने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा से ऊपर माना जाएगा। अब गरीबी की परिभाषा बदली जाएगी शायद। इस लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य में यह खबर पीड़ादायी है कि गरीबी की परिभाषा बदलने को लेकर कवायद हो रही है, लेकिन पूरी राजनीति इस बार पर चुप्पी साधे बैठी है कि गरीबी को कब बदला जाएगा।
गरीबी को कब बदलकर एक नागरिक को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिलेगा। उन्हें कब दो वक्त की रोटी, कपड़ा और मकान मिलेगा। जो लोग जीवन की मूलभूत जरूरतों से ही वंचित हैं, वहाँ पर गरीबी की परिभाषा बदलने की बात घोर अश्लील लगती है।