यदि इतिहास अपने को दोहराता है तो अण्णा हजारे इस बात को अपने अनूठे और पुरजोर तरीके से साबित करते हैं। एक समय गाँधी के अहिंसक आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था। देश को आजादी के लिए एकजुट किया था। अब अण्णा हजारे के अहिंसक आंदोलन ने पूरी सरकार को हिला कर रख दिया है। उन्होंने भी देश को एक बड़े लक्ष्य के लिए एकजुट किया है। गाँधी ने देश में अहिंसा में विश्वास पैदा किया था, अण्णा हजारे ने भी यही किया है। एक ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में हिंसा का बोलबाला है तब अण्णा हजारे फिर से अहिंसा में विश्वास पैदा कर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि उन्होंने युवाओं में यह आत्मबल पैदा कर दिया है कि अहिंसा के बलबूते लक्ष्य कैसे हासिल किए जा सकते हैं। युवा की यह खास स्टोरी इस मुद्दे पर एकाग्र है।
अण्णा हजारे की चाल में वही तेजी है। उनकी आवाज में वही दम है और देश को एकजुट करने की वही ताकत भी। ठीक गाँधी की तरह अहिंसा में अथक और अटूट विश्वास की तरह। इंदौर के प्रतिभाशाली युवा और गीतकार स्वानंद किरकिरे ने गाँधी पर गीत लिखा था- बंदे में था दम। अण्णा हजारे के इस आंदोलन को देखकर कहा जा सकता है- बंदे में है दम। अपने दम के बल पर ही उन्होंने युवाओं और देश को मुट्ठी तानने पर प्रेरित किया। बड़ी से बड़ी चुनौती से लड़ने के लिए खम ठोंकने का साहस दिया है।
उन्होंने जनलोकपाल बिल ही नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव की आवाज को बुलंद किया है। अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे एक सामाजिक कार्यकर्ता ने पूरी सरकार को हिलाकर रख दिया है। युवाओं को प्रेरित किया है कि वे सड़कों पर उतरकर बिना कोई हिंसा किए कैसे अपनी ताकत दिखा सकते हैं। जब बड़ी संख्या में देश के युवा सड़कों पर उतरकर किसी आंदोलन का खुला समर्थन कर रहे हैं और वह भी अंहिसा के हथियार से।
इसीलिए इसे दूसरी आजादी की शुरुआत कहा जा रहा है। नवयुग के इस दूसरे गाँधी अण्णा हजारे विचारों से आज भी ऊर्जावान व युवा जोश से लबरेज हैं। आंदोलन के अपने मजबूत इरादों से भ्रष्टाचारियों को हर जगह से खदड़ने का बीड़ा उठाया है, ताकि सही मायनों में जनता को लोकतंत्र का अर्थ समझ में आ जाए। स्वाधीनता संग्राम के बाद संभवतः यह दूसरा मौका है, जब बड़ी संख्या में जनतंत्र की आवाज ने सत्ताधारी सरकार के तख्त को हिलाकर रख दिया है।
कौन है अण्णा? महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के भिंगार गाँव में 15 जनवरी 1940 को जन्मे किसन बाबूराव उर्फ अण्णा हजारे का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ। आर्थिक तंगी के कारण अण्णा ने महज सातवीं कक्षा तक ही शिक्षा हासिल की। उसके बाद उन्होंने मुंबई का रुख किया और कुछ समय तक दादर में फूल बेचने का काम भी किया। 1963 में भारतीय सेना में ट्रक ड्राइवर के रूप में भर्ती पाने वाले अण्णा ने 1978 में सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर जन आंदोलन में अपनी सहभागिता निभाई। अण्णा पर महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानंद व विनोबा भावे के विचारों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। यही वजह है कि अण्णा ने इन महापुरुषों के सिद्धांतों पर चलकर जनहित में कार्य करने का फैसला किया। अपने गाँव रालेगणसिद्धि में 'तरुण मंडल' संगठन बनाकर अण्णा ने जनता की समस्याओं व उनकी आवाज को एक नया स्वर प्रदान किया। अण्णा के अथक प्रयासों से रालेगणसिद्धि गाँव अस्पृश्यता, नशा, रूढिवाद, अशिक्षा आदि से मुक्त होकर महाराष्ट्र के नक्शे पर एक आदर्श ग्राम के रूप में उभरा।
युवाओं का भरपूर समर्थन देश-विदेश के युवाओं का समर्थन हासिल करके अण्णा ने लोगों के उस मिथक को तोड़ दिया है कि युवा समाज में बदलाव लाने के लिए कभी अग्रणी नहीं बन सकता है। अण्णा के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देशभर के लाखों युवाओं को जोड़ कर उनकी एक गंभीर छवि प्रस्तुत की है। हजारों-लाखों की तादाद में सड़कों पर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करते ये युवा आज देश के लिए अपनी जान भी देने को तैयार हैं। राजनीति से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए युवाओं का आगे आना कई मायनों में जरूरी भी था। अनेकता में एकता का प्रदर्शन कर अण्णा ने युवाओं के माध्यम से पूरे देश को एक कर दिया है।
अण्णा के समर्थन में आवाज उठाने वाले अनुराग ठाकुर, श्वेता मेहता, सचिन गुप्ते, चर्चित सक्सेना और पूर्वी जैन के अनुसार अब भ्रष्टाचार आम आदमी के लिए एक सिरदर्द बन चुका है। हर छोटे से छोटे काम को समय पर करवाने के लिए न चाहते हुए भी सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देना पड़ती है। आज दफ्तर के चपरासी से लेकर बाबू तक हर कोई काम करने से पहले अपनी जेब गर्म करना चाहता है। उन सभी के लिए तो भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार है। हम अण्णा के साथ हैं, क्योंकि उन्होंने अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए बदलाव की बयार का सूत्रपात किया है।
टीम अण्णा है सशक्त
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अरविंद केजरीवाल : 16 जून 1968 में हरियाणा के हिसार में जन्मे अरविंद केजरीवाल ने 1989 में आईआईटी खड़गपुर से स्नातक किया। उसके बाद 1992 में भारतीय राजस्व सेवा में आए और 5 साल तक वहाँ नौकरी करने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद वे आयकर विभाग दिल्ली में एडिशनल कमिश्नर बने और 2006 में उन्होंने यह नौकरी भी छोड़ दी। तब से अब तक अरविंद केजरीवाल लगातार समाज सेवा के कार्यों में रुचि ले रहे हैं।
डॉ. किरण बेदी :
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9 जून 1949 को अमृतसर पंजाब में जन्मी डॉ. किरण बेदी ने 1972 में देश की पहली महिला आईपीएस ऑफिसर बनने का गौरव हासिल किया। अपने मजबूत इरादों की पक्की किरण बेदी ने अपने कार्यकाल में दिल्ली की ट्रैफिक व्यवस्था को सुधारने, तिहाड़ जेल की सूरत बदलने की दिशा में अनेक सराहनीय कार्य किए। वर्ष 2007 में किरण बेदी ने पुलिस विभाग से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर समाजसेवा का बीड़ा उठाया।
प्रशांत भूषण : न्यायिक प्रणाली के बेदाग समर्थक प्रशांत भूषण का जन्म 1956 में हुआ। टीम अण्णा के लोकपाल बिल के समर्थन में प्रशांत भूषण अप्रैल 2011 में जुड़े।
बॉलीवुड भी हुआ अण्णामय अण्णा हजारे के समर्थन में बॉलीवुड के कई सितारे व संगीत जगत की प्रमुख हस्तियाँ भी सामने आईं, जिनमें लता मंगेशकर, अनुपम खेर, आमिर खान, कैलाश खेर, मनोज तिवारी, प्रियंका चोपड़ा, शेखर कपूर, उर्मिला मातोंडकर, रणवीर शौरी, दीया मिर्जा, श्रेया घोषाल ने सार्वजनिक रूप से अण्णा का समर्थन किया है।
हर तरफ अण्णा की लहर सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक और टि्वटर पर भी अण्णा का जलवा बरकरार है। इसका प्रमाण इसी बात से लगाया जा सकता है कि 'सपोर्ट अण्णा हजारे अगेन्स्ट करप्शन' ग्रुप के साढ़े चार लाख से अधिक सदस्य हैं। यूट्यूब पर हर रोज चालीस हजार लोग अण्णा का वीडियो देख रहे हैं। टि्वटर पर भारत के लगभग 79 शहरों के 8 लाख 26000 यूजर्स ने अण्णा के लिए 4.4 मिलियन टि्वट किए हैं।
17 अगस्त यानी अण्णा की अनशन के पहले दिन टि्वटर पर लगभग 8000 से अधिक टि्वट अण्णा के समर्थन में किए गए थे। मोबाइल मूवमेंट के तहत मैसेज के माध्यम से अण्णा के समर्थन के लिए लगभग 7 लाख से अधिक लोगों ने निर्धारित नंबर 022-61550789 पर कॉल करके अण्णा के आंदोलन के पक्ष में अपना समर्थन दिया। इन आँकड़ों से जाहिर होता है कि वर्चुअल वर्ल्ड में हर जगह अण्णामयी माहौल दिख रहा है।