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बयानों पर टिकी राजनीति

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यदि राजनीतिक परिदृश्य में बयानबाजी हावी होने लगे तो यह समझा जा सकता है कि यह एक तरह का राजनीतिक कोहरा रचने की कोशिश है और इस कोशिश में कोई एक पार्टी शामिल नहीं, बल्कि देश की तमाम छोटी-बड़ी पार्टियाँ शामिल हैं। अक्सर जब काम करने और यथास्थिति को बदलने देने की इच्छा शिथिल होने लगती है तब बयानबाजियाँ परिदृश्य पर तैरने लगती हैं। भारतीय राजनीति आजकल इसी दौर से गुजर रही है।

चाहे मामला भ्रष्टाचार का हो या कश्मीर का, बयानबाजियों का दौर है और इसमें इतना कोहरा है कि यह साफ देखना मुश्किल होता है कि अंततः राजनीतिक पार्टियों की असल मंशा क्या है। जब-जब बयान-बाजियाँ होती हैं, लगता है कोई भी पार्टी यथास्थिति को बनाए रखने के लिए ही ऐसा कर रही हैं। उन्हें किसी बदलाव को करने की असल मंशा नहीं दिखाई देती और उस इच्छा को कार्यरूप देने की इच्छाशक्ति भी नहीं दिखाई देती। इस तरह की राजनीति जाहिर है सिर्फ बयानबाजी पर ही टिकी रहती है और देशहित में सोचने की शक्ति खो देती है।

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