Article Yuva %e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%b0 %e0%a4%9d%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%95%e0%a5%8b %e0%a4%89%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%8b %e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b 111100900050_1.htm

Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

भीतर झाँको, उसको मारो

- गायत्री शर्मा

Advertiesment
दशहरा
ND
हम बाहर का रावण हर साल मारते हैं, लेकिन हर साल हमारे भीतर नए सिरे से और नए रूप में रावण के सिर उठाते रूप को हम देख नहीं पाते। इसलिए इस दशहरे पर युवा यदि अपने भीतर सिर उठाते रावण को देखेंगे तो वे इसे मारने के लिए अपने स्तर पर कोशिश करेंगे। उनकी यही कोशिश विजयादशमी को ज्यादा सार्थक बनाएगी। इसी विचार को लेकर इस बार प्रस्तुत है दशहरे पर यह खास स्टोरी।

किसी भी चीज का अतिरेक उसके विनाश का संकेत होता है। अन्याय, असत्य, अत्याचार अनीति और अहंकार जब अपनी सीमाएँ लाँघ जाते हैं तब उनका विनाश करने के लिए हर युग में राम का जन्म होता है। राम प्रतीक है सत्य, सदाचार और सन्मार्ग का। सतयुग हो या कलयुग, हर युग में रावण के रूप में बुराई से हमारा सामना हुआ है। यही वजह है कि उस बुराई पर विजय पाने के लिए विजयादशमी का पर्व हर युग में प्रासंगिक-सा है।

हर युग में बुराई के प्रतीक रावण का जन्म होता है और उस रावण के विनाश के लिए सचाई का राम सतत संघर्ष करता रहता है। महँगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, गरीबी, नक्सलवाद, दलगत राजनीति आदि के मूल में व्याप्त कलियुगी रावणों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि जब इनमें से कोई एक रावण मरता है तो उसके दस मुखों से सौ नए रावण पैदा होते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इन रावणों के पनपने की एक वजह देश की सत्ता का आधारस्तंभ कलियुगी राम (आमजन) का सुसुप्त होना है।

जब यह राम जागरूक होकर अपनी पूरी ताकत के साथ रावण के विनाश का शंखनाद करेगा, तब इस देश से सदा के लिए रावणों का अंत हो जाएगा। उस समय हमें रावण के प्रतीक किसी पुतले के दहन की जरूरत नहीं होगी। विजयादशमी के शुभ प्रसंग पर जब हमने शहर के युवाओं से देश को कमजोर व खोखला बनाने वाले कलियुगी रावणों के बारे में पूछा तो उनके जवाब कुछ इस प्रकार थे-

भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें
बुराइयाँ तो इस देश में हमेशा से ही हैं और शायद आगे भी रहेंगी। जब तक इन बुराइयों या अव्यवस्थाओं का पूरी तरह से अंत नहीं हो जाता, तब तक हमें विजयादशमी का पर्व मनाकर अपने भीतर दुबक कर बैठे राम का स्मरण कर उसे जगाते रहना होगा। ऐसा कहने वाले डॉ. विष्णु मिश्रा के अनुसार आज देश को नुकसान पहुँचाने वाला सबसे बड़ा रावण भ्रष्टाचार है। इसके जड़-मूल को नष्ट करना हमारे लिए बेहद जरूरी है। स्कूल से लेकर कॉलेज तक, बचपन से लेकर बुढापे तक किसी न किसी रूप में इस रावण ने हमें हर वक्त और हर जगह अपना गुलाम बनाया है। यही नहीं, देश की प्रगति में सबसे बड़ा अवरोध यही भ्रष्टाचार रूपी रावण है, जिसका विनाश ही सही अर्थों में विजयादशमी पर्व की सार्थकता होगी।

मेरे भीतर का रावण
मेरी एक आदत बड़ी खराब है और वह है काम को टालना। इस विजयादशमी पर मैं इसी बुरी आदत का त्याग कर अपना हर काम समय पर करने का प्रयास करूँगा।

काम बड़े, पर सोच छोटी
शिक्षित होने के बाद भी आज हम जागरूक नहीं हैं। आज भी हममें से अधिकांश लोगों की सोच का दायरा उसी संकीर्ण घेरे तक ही सीमित है। समाज व रूढ़ियों का हवाला देकर जिसे हमने स्वयं बनाया है। ऐसा कहने वाली स्वाति पांडे की मानें तो कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामले ही आज के दौर में देश के विकास को अवरुद्ध करने वाला कलियुगी रावण है। जब लड़का और लड़की कानून की दृष्टि में एक समान हैं तो फिर हम क्यों इनके बीच भेदभाव करते हैं, आखिर क्यों हम गर्भ में ही कन्या भ्रूण को कुचलकर महान कहलाते हैं? स्वाति के अनुसार कन्या भ्रूण हत्या के दोषी इन रावणों के विनाश के लिए अब हमें कड़े कानून बनाने होंगे और इस मुद्दे पर एकजुट होकर आवाज उठाना होगी।

मेरे भीतर का रावण
कई बार हमारे बड़े या हमारे साथी कुछ गलतियाँ करते हैं, पर यह सब देखते हुए भी हम उन्हें रोक नहीं पाते हैं। ऐसा करके हम कहीं न कहीं बुराई व अन्याय को अपनी मौन स्वीकृति देते हैं। मैं चाहती हूँ कि अपनी इस कमजोरी पर विजय पाने के लिए मैं अपनी बात को सही तरीके से बड़ों के सामने प्रस्तुत करूँ, ताकि वे मेरी बात मानें और कोई भी गलत कार्य नहीं करें।

बढ़ता नक्सलवाद
आतंक का पर्याय बना नक्सलवाद रूपी रावण अब लगभग पूरे देश में अपनी जड़ें जमा चुका है। सरकार के लिए सिरदर्द बना नक्सलवाद आंदोलन अब ताकतवर बनने के साथ ही विकराल रूप भी लेता जा रहा है। शिक्षा, सुविधाओं व सरकारी नीतियों से वंचित रहने वाले नक्सलवादी देश के पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह भी बनते जा रहे हैं। नक्सलवाद से निपटने के लिए हमें कड़े कानून व शिक्षा के हथियारों का प्रयोग करना होगा। ऐसा समीर चौरसिया का मानना है।

मेरे भीतर का रावण
जरूरत से अधिक इमोशनल होना ही मेरे लिए मुसीबतों का कारण बनता है। इस विजयादशमी पर मैं अपने इमोशन पर विजय पाने की कोशिश करूँगा।

नशा है नाश का कारण
असफलता व्यक्ति को डिप्रेशन व धूम्रपान की ओर धकेलती है। आज नशाखोरी देश के युवाओं के स्वास्थ्य को निगलने वाला एक विकराल रावण है, जो भीतर से युवाओं को खोखला व कमजोर बना रहा है। ऐसा कहने वाली भारती बकोरिया के अनुसार नशाखोरी न केवल युवाओं को, बल्कि देश को बीमारू व पिछड़ा बना रही है। युवाओं में नशे की बढ़ती लत पर अंकुश लगाने के लिए उनके स्व-नियंत्रण के साथ ही नशीले पदार्थों की बिक्री पर प्रशासन के प्रतिबंध की भी आवश्यकता है।

मेरे भीतर का रावण
तनाव मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है। हर छोटी-छोटी बातों पर तनाव लेना ही मेरे लिए कई बार परेशानियों की वजह बनता है। मैं चाहती हूँ हर बात पर गंभीरता से विचार करूँ व किसी भी बात पर तनाव लेने की बजाय उस समस्या का हल ढूँढने का प्रयास करूँ।

कलियुगी रावण के दस मुख
महँगाई, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, जनसंख्या वृद्घि, सामाजिक रूढियाँ, अपराधों का बढ़ता ग्राफ, शिक्षा का गिरता स्तर, असंतुलित लिंगानुपात

ऐसे करें कलियुगी रावण का विनाश
* रिश्वत न कभी दें और न कभी लें।
* ईमानदारी से अपना कार्य करें।
* अपने हक के लिए आवाज उठाएँ।
* सामाजिक कार्यों में योगदान करें।
* नशामुक्ति हेतु जागरूकता फैलाएँ।
* सामाजिक रूढ़ियों का विरोध करें।
* परिवार नियोजन को दें बढ़ावा।
* रोजगारोन्मुखी शिक्षा को बढ़ावा दें।
* पर्यावरण की रक्षा हेतु प्रयास करें।
* हर स्तर पर नौकरी के अवसर पैदा करें।
* बालश्रम व अपराध की सूचना पुलिस को दें।
* अफवाहों की बजाय हकीकत पर भरोसा करें।
* सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सहयोग दें।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi