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कविता : रंगों का बंटवारा

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होली

डॉ. गरिमा संजय दुबे

 
 
होली ले कर आई टेसू और पलाश
अपने मित्र पुराने, नेताजी को कर रहे हम तलाश।
सोचा होली का यह त्यौहार है रंगीला
देखा तो मित्र नेता बैठा है आज अकेला।
 
सोचा था रंगो की बरसात होगी,
गुझिया, भांग का मित्रों संग लगेगा मेला,
लेकिन वह दोस्त बैठा है अकेला।
बैठे हैं वह सुस्त,
मुंह सूखकर छुआरा हुआ ,
पतला पड़ा पेट जो था चुस्त।
 

 
दी मुबारक होली की तो भड़क उठे महाराज,
बिनु पानी सब सून भैया, बिनु पानी सब सून।
खुश हुए हम सुनकर चलो जागा नेता का चिंतन ,
कर रहा है वह आम परेशानी पर मनन।
 
हम बोले चार नलों के मुफ्त कनेक्शन
और भरा है स्वीमिंग पूल,
फिर भी बिन पानी सब सून 
काहे बिन पानी सब सून।
गुस्से में वे तमतमाए, जोर से वे खड़खड़ाए ,
दहाड़े, रहोगे तुम मूरख और अज्ञानी,
नेता के लिए कुछ और ही मतलब होता है पानी।
 
दो साल भए हाथ न आया कोई घोटाला ,
पिछली होलियां दिवाली थी, यह होली दीवाला।
रूठ गई सत्ता सुंदरी दिखा के हमको ठेंगा,
बन ययाति ढूंढ रहे हैं किसी पुरू का कंधा।
बिन घोटाला नेता जैसे हो मछली जल बिन ,
ऊपर से यह होली सीने पर लौटती नागिन ।
 
मिला न कोई मौका जब पाने को कहीं भी फुटेज, 
ठान लिया रंगों के घोटाले से दूर करेंगे यह शॉर्टेज।
रंगों को है बांट लिया हम सबने मिलकर,
हरे लाल और भगवा से खेलेंगे हम जमकर ।
 
देखा हमने रंग रखे हैं दूर एक कोने में ,
धर्म की भांग भी भरी रखी है एक भगोने में ।
देखा मलकर आंख तो रंग कर रहे थे बात,
हरे लाल और भगवा में ठनी हुई है आज ।
 
रंग-रंग न रह गए बन गए है हथियार, 
नेताजी खुश हो रहे देखकर यह तकरार।
रंगों ने सोचा क्यों न कर दें यह योजना असफल, 
सभी रंग मिलकर क्यों न हो जाएं पावन श्वेत धवल ।
 
पावन श्वेत धवल जो छा जाए  चहुंओर ,
सच्चे अर्थों में मन जाए रंग बिरंगी होली चारों ओर

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