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सियासत के अलावा कुछ नहीं गैरसैंण मुद्‌दा

-ललित भट्‌ट, देहरादून से

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देहरादून। उत्तराखंड राज्य बने करीब 13 साल बीत गए हैं, लेकिन प्रदेशवासियों का अभी भी स्थाई राजधानी का सपना पूरा नहीं हो सका। अविभाजित उत्तरप्रदेश के वक्त से ही पहाड़ की जनभावनाओं से जुड़ी प्रस्तावित गैरसैंण राजधानी की चिंगारी राज्य गठन के तेरह साल बाद भी भड़क रही है, लेकिन राज्य की दो मुख्‍य पार्टियां भाजपा व कांग्रेस सिर्फ इस मुद्‌दे को हवा देकर राजनीतिक रोटियां सेकने के बजाय आज भी गंभीर होती नहीं दिखाई दे रही हैं।

इसी का परिणाम है कि प्रदेश सरकार तीन दिवसीय विधानसभा सत्र में गैरसैंण मुद्‌दे को ही भूल गईं। यूं तो गैंरसैंण राजधानी का मसला बहुत पुराना है। 1960 में वीरचन्द्र गढ़वाल के सुझाव पर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गैरसैंण को राजधानी के लिए उपयुक्त माना था, लेकिन पृथक राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों के द्वारा यह मामला मुख्‍य रूप से 1991 से सामने आया, तब पहली बार गैरसैंण को लेकर सियासत का सफर शुरू हुआ।

तत्कालीन भाजपा सरकार में पर्वतीय विकास मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक की अगुवाई में उत्तरप्रदेश के सात कैबिनेट मंत्री गैरसैंण आए और शिलान्यास के तीन सरकारी पत्थर लगाए गए। इसके बाद वर्ष 1992 में उक्रांद ने गैरसैंण को प्रस्तावित उत्तरखंड राज्य की राजधानी घोषित कर यहां अपना केन्द्रीय कार्यालय खोलने की घोषणा की, लेकिन आज तक उसका वहां दफ्तर नहीं खुल पाया। 1994 में एक बार फिर उक्रांद ने गैरसैंण में ईंट-गारा रैली की, मगर गैरसैंण में लाई गई ईंटें व रोड़ी कुछ दिन बाद ही गायब हो गईं।

नवंबर 2000 में उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आने के बाद सूबे की जनता को यही उम्मीद थी कि राज्य की राजधानी किसी पर्वतीय क्षेत्र में ही बनेगी। संघर्ष वर्गों ने बकायदा यह मांग की थी कि राज्य का गठन तो हुआ पर राज्य की स्थाई राजधानी का गठन नहीं हो सका। अस्थाई राजधानी के रूप में राजधानी देहरादून थोप दी गई। तब सत्ताधीशों के द्वारा यह कहा गया कि यह तो अस्थाई राजधानी है, स्थाई राजधानी का गठन जल्द ही कर लिया जाएगा। इसके लिए दो बार दीक्षित आयोग का भी गठन हुआ लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों ने कूटनीतिक चाल का प्रयोग करते हुए आयोग को एक्सटेंशन देते रहे।

2012 में तत्कालीन मुख्‍यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में कैबिनेट बैठक कर व वहां विधानसभा भवन का शिलान्यास कर इस मुद्‌दे को एक बार फिर गर्मा दिया। श्रेय लेने की होड़ में कई कांग्रेसी नेता भराड़ीसैंण पहुंच वहां विधानभवन के भूमि पूजन के बहाने इस मुद्‌दे को और हवा देने की कोशिश की, लेकिन तब से आज तक वहां विधानभवन के लिए एक ईंट भी नहीं लगी।

फिलवक्त हरीश रावत सरकार ने गैरसैंण में तीन दिवसीय विधानसभा सत्र कर इस मुद्‌दे को एक बार फिर गर्मा दिया है। पूरे तामझाम के साथ गैंरसैंण पहुंचकर वहां तंबू गाढ़कर तीन दिन तक विधानसभा सत्र कराकर 13 साल बाद एक नई राजनीति करने की जरूर कोशिश की लेकिन गैरसैंण में राजधानी बनाने के मामले पर कोई कदम उठाए बगैर अनिश्चिततकाल के लिए सत्र स्थगित कर दिया गया। इससे साफ होता है कि सरकार अब भी पहाड़ की जनभावनाओं के साथ खेलकर सिर्फ राजनीति के अलावा कुछ नहीं कर रही है। यहीं नहीं सत्तापक्ष के अलावा विपक्ष भी गैरसैंण राजधानी का राग जरूर अलाप रहा है, लेकिन गैरसैंण में ग्रीष्‍मकालीन या स्थायी राजधानी के लिए वह भी गंभीर नहीं दिखाई दे रहा है।

इसी का परिणाम है कि सत्र के अंतिम दिन गैरसैंण राजधानी के मुद्‌दे पर प्रस्ताव लाने के बजाय विपक्ष ने आबकारी नीति में बदलाव के मुद्‌दे को ज्यादा महत्व देकर सदन में जोरदार हंगामा कर गैरसैंण मुद्‌दे को ही किनारा लगा दिया। इससे साफ होता है कि भाजपा व कांग्रेस तेरह साल बीते जाने के बाद गैरसैंण मुद्‌दे पर सिर्फ राजनीति के सिवाय कुछ भी करने को गंभीर नहीं है। फिलहाल यह मुद्‌दे को लेकर प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई है, लेकिन इसका हल न होने पर आंदोलनकारियों व पहाड़ की जनता में मायूसी है।

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