बांग्लादेश के लिए कितनी अहमियत रखता है भारत?

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019 (08:03 IST)
फ़ैसल मोहम्मद अली, बीबीसी संवाददाता, ढाका
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के गुरुवार को भारत रवानगी के ठीक एक दिन पहले बांग्लादेश में मुख्य चर्चा रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर थी।
 
विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमिन जब मीडिया से मुखातिब हुए तो उनके सामने दिल्ली से जुड़े सवाल भी किए गए। लेकिन सवालों के क्रम में वो आख़िर में रहे। एके अब्दुल मोमिन ने कहा कि म्यांमार सत्यापन के बाद सभी रोहिंग्या शरणार्थियों को नागरिकता पहचान पत्र देने के लिए तैयार हो गया है।
 
बांग्लादेश के लिए इसे 'एक बड़ी जीत' बताते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि रोहिंग्या शरणार्थियों की देश वापसी का रास्ता बांग्लादेश और म्यांमार के बीच न्यूयॉर्क में चीन की मध्यस्थता से हुई बातचीत के बाद खुला है।
 
पिछले दो सालों से लगभग 10 लाख रोहिंग्या शरणार्थियों का बोझ झेल रहे बांग्लादेश में आम राय यह है कि भारत ने इस मामले में सिर्फ़ राजनीति की, अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई।
 
म्यांमार आएगा भारत के करीब?
ढाका विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफे़सर इम्तियाज़ अहमद व्यंग्यात्मक लहज़े में कहते हैं, 'मुझे लगता है कि या तो नीति निर्धारकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धोखे में रखा है या हो सकता है कि ये उनका ही आइडिया हो कि वो बांग्लादेश के मुक़ाबले म्यांमार से दोस्ती कायम कर लेंगे। या फिर ये भी हो सकता है कि वो सोच रहे हों कि इस तरह से म्यांमार चीन से दूर होकर भारत के क़रीब आ जाएगा।'
 
वो अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, 'ये याद रखना चाहिए कि चीन तब भी म्यांमार के साथ खड़ा था जब पूरी दुनिया ने उसके ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाए हुए थे इसलिए ये दूर की कौड़ी है कि म्यांमार भारत को चीन पर तरजीह देगा।'
 
जानकारों के मुताबिक़ भारत के लिए ये बहुत ही अच्छा मौक़ा था, शेख़ हसीना और आंग सान सू ची को साथ मिलाकर बातचीत को आगे बढ़ाने का। क्योंकि दोनों नेताओं के संबंध दिल्ली से अच्छे हैं, लेकिन भारत ने वो अवसर गंवा दिया और चीन ने मौक़े को हाथ से जाने नहीं दिया।
 
अहमद के मुताबिक़ भारत को इसका फ़ायदा शायद ही हो लेकिन बांग्लादेश चीन के और क़रीब आ सकता है।
 
बांग्लादेश से भारत को फायदा
बांग्लादेश में कई लोग ये कहते हुए मिल जाते हैं कि बांग्लादेश को भारत की उतनी ज़रूरत नहीं है जितनी भारत को बांग्लादेश की है। प्रोफेसर इम्तियाज़ अहमद कहते हैं कि कुछ और के लिए न सही मगर उत्तर-पूर्व के लिए तो भारत बांग्लादेश पर निर्भर है।
 
वरिष्ठ पत्रकार तौफ़ीक़ इमरोज़ कहते हैं कि बांग्लादेश की मदद की वजह से भारत को सुरक्षा के क्षेत्र में होने वाले ख़र्च में लाखों डॉलर की बचत हो रही है।
 
चार हज़ार किलोमीटर से अधिक लंबे भारत-बांग्लादेश बॉर्डर का इस्तेमाल उत्तर पूर्व भारत के कई चरमपंथी समूह सीमापार जाकर अपनी गतिविधियां जारी रखने को करते थे। मगर बॉर्डर पार आवाजाही को साल 2008 में आई शेख हसीना हुकूमत ने पूरी तरह रोक दिया है।
बांग्लादेश के चटगांव और मोंगला बंदरगाह भी उत्तर पूर्व में व्यापार के लिए खोल दिए गए हैं।
 
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार तौफ़ीक़ इमरोज़ के मुताबिक़ तीस्ता नदी पानी बंटवारे जैसे रुके हुए मामले शेख हसीना के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।
 
तौफ़ीक़ इमरोज़ के मुताबिक़ बांग्लादेशी इस वजह से भारत से बेहद नाराज़ हैं, 'ये मामला पिछले तक़रीबन 10 सालों से जहां का तहां है। जब 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यहां आए तो लगा कि जैसे समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। फिर जब हमारी प्रधानमंत्री भारत गईं तो लगा कि चलो इस बार ये हो जाएगा लेकिन वैसा न हो सका। कहा गया कि पश्चिम बंगाल की सरकार इसका विरोध कर रही है।'
 
भारत के दबाव में है शेख हसीना?
बांग्लादेश के लोगों में एक धारणा ये है कि किसी वजह से शेख़ हसीना भारत के दबाव में हैं और वहां से कुछ न मिलने के बाद भी भारत की मदद में आगे-आगे रहती हैं।
 
तौफ़ीक़ इमरोज़ मानते हैं कि राजनीतिक तौर पर तीस्ता जैसा मामला प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की सरकार को नुक़सान पहुंचा सकता है। इसलिए इसका निपटारा जल्द से जल्द होना चाहिए।
 
50 से अधिक नदियां दोनों मुल्कों के बीच बहती हैं लेकिन 1996 गंगा समझौते के बाद दोनों में पानी के बंटवारे को लेकर कोई समझौता नहीं हो पाया है। हालांकि इस बार की यात्रा से पहले हुकूमत ने नदियों पर चर्चा की बात भी कही है लेकिन ढाका में माना जा रहा है कि इनपर कोई प्रगति नहीं होगी।
 
शेख़ हसीना की चार दिनों की दिल्ली यात्रा के दौरान दोनों मुल्कों के बीच 10 से 12 समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना बताई जा रही है।
 
हाल के सालों में दोनों मुल्कों के बीच 100 से अधिक समझौते हुए हैं लेकिन इस दौरे को लेकर भी बांग्लादेश में बहुत उत्साह नज़र नहीं आता।
 
भारत-बांग्लादेश व्यापार
अर्थशास्त्री फहमीदा ख़ातून दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार घाटे को भी तनाव का बड़ा कारण बताती है जो उनके मुताबिक़ पिछले साल तक सात बिलियन डॉलर सालाना पहुंच गया था।
 
फहमीदा ख़ातून कहती हैं कि बांग्लादेश और भारत के बीच व्यापार के मामले में भी बांग्लादेश घाटे में है, 'बांग्लादेश का भारत में निर्यात कम है और आयात अधिक। आप देखेंगे कि भारत जो बहुत सारा माल दूसरी जगहों से ख़रीद रहा है, उसका उत्पादन बांग्लादेश भी करता है, और भारत चाहे तो बांग्लादेश भी वह माल उसको सप्लाई कर सकता है।'
 
कई व्यापारी नॉन टैरिफ़ बैरियर की बात भी करते हैं। अभी ये सब कुछ जारी है ही कि बॉर्डर के किनारे इलाक़ों में एक चिंता जो आजकल बहुत अधिक है वो है असम में हुए एनआरसी में नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह गए लोगों को बांग्लादेश में धकेल दिए जाने की।
 
हालांकि बांग्लादेशी नेताओं से बातचीत में भारत इसे आंतरिक मामला बताता है लेकिन गृह मंत्री अमित शाह द्वारा कथित घुसपैठियों को बांग्लादेशी बुलाने से इस मामले पर चिंता और चर्चा कम नहीं हो पा रही।

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