लोकसभा चुनाव 2019: बिहार में लालू के MY से तेजस्वी के MUNIYA तक

बुधवार, 10 अप्रैल 2019 (11:22 IST)
- सुरूर अहमद (राजनीतिक विश्लेषक)
 
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने हाल ही में बनी 'विकासशील इंसान पार्टी' (वीआईपी) के लिए तीन सीटें छोड़ीं तो उसके इस फ़ैसले से सबको हैरानी हुई। हैरत की वजह ये थी कि वीआईपी लगभग छह महीने पहले बनी थी और आरजेडी ने इतनी तवज्जो दी।
 
वैसे ये फ़ॉर्मूला नया नहीं है। लालू प्रसाद यादव पहले से ये फ़ॉर्मूला अपनाते आए हैं। ये आरजेडी की दलितों और पिछड़ों को अपने साथ जोड़ने की एक और कोशिश है जो पिछले कुछ सालों में किसी न किसी वजह से आरजेडी को छोड़ गए हैं।
 
कई राजनीतिक पंडित, ख़ासकर दिल्ली में बैठे लोग, उस वक़्त भी हैरत में थे जब आरजेडी ने उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के लिए पांच और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के लिए तीन सीटें दीं।
 
 
90 के दशक में बिहार के तमाम चुनावों में लालू यादव की जीत का श्रेय उस विविधतापूर्ण गठबंधन को दिया गया जो उन्होंने अगस्त 1990 में मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद बनाया था। लेकिन 1994 में नीतीश कुमार ने लालू का साथ छोड़ा और बीजेपी का हाथ थाम लिया। इसके बाद लालू यादव की पार्टी धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ती गई। हालांकि कुछ सालों बाद दलित नेता राम विलास पासवान लालू की धारा में जुड़ गए।
 
 
24 नवंबर, 2005 को बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने अपना ख़ुद का फ़ॉर्मूला बनाया। उन्होंने स्थानीय निकाय के चुनाव में अति पिछड़े वर्ग को 20 फ़ीसदी सीटें देकर लुभाना शुरू किया। इससे नीतीश कुमार को अपना वोटबैंक मज़ूबत करने में मदद मिली और अति पिछड़े वर्ग के नेता धीरे-धीरे नीतीश की पार्टी यानी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) की तरफ़ आकर्षित होने लगे।
 
निषाद वोट और लालू का असाधारण फ़ैसला
निषाद या सहनी जैसी कई उप-जातियां बिहार की राजनीतिक गणित में अहम भूमिका निभाती हैं और ये अति पिछड़े वर्ग का बड़ा हिस्सा हैं। बिहार में निषाद समुदाय नाव चलाने, नाव बनाने और मछली पकड़ने जैसे पारंपरिक कामों के ज़रिए अपनी जीविका चलाता है।
 
 
वीआईपी के संस्थापक मुकेश सहनी कहते हैं कि निषादों की संख्या बिहार की कुल आबादी का लगभग 15 फ़ीसदी है। बिहार में नदी किनारे वाले इलाक़ों में इनकी अच्छी-ख़ासी मौजूदगी देखी जा सकती है। यहां ये बताना भी ज़रूरी है कि ऐसे कई इलाक़ों में यादवों की आबादी भी ठीक ठाक है।
 
चूंकि राज्य में निषाद समुदाय की आबादी काफ़ी है इसलिए वो सूबे की राजनीति में हमेशा से मांग में रहे हैं। हालांकि निषाद नेताओं को आगे ले आने वाला कोई और नहीं बल्कि लालू यादव थे। उन्होंने कुछ निषाद नेताओं को अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाया। इसके अलावा लालू ने कप्तान जय नारायण निषाद को मुज़फ़्फ़पुर से पार्टी का उम्मीदवार बनाया जो उस ज़माने में एक असाधारण फ़ैसला था।
 
 
बाद में कप्तान निषाद नीतीश के और फिर भगवा ख़ेमे में आ गए। उनके बेटे अजय निषाद ने पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार के तौर पर मुज़फ़्फ़रनगर सीट जीती थी और इस बार भी वो बीजेपी के टिकट से ही चुनाव लड़ रहे हैं।
 
कामयाब होगा 'मुनिया' समीकरण?
मुकेश सहनी ने चार नवंबर, 2018 में वीआईपी बनाई और उनकी पार्टी तीन सीटों- मधुबनी, खगड़िया और मुज़फ़्फ़रपुर से चुनाव लड़ रही है। सहनी के साथ समस्या ये है कि उनके उम्मीदवार जिन सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं वहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या भी अच्छी ख़ासी है।
 
 
मुकेश सहनी ख़ुद खगड़िया से मैदान में हैं। खगड़िया वही निर्वाचन क्षेत्र है जहां से एनडीए के घटक दल लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) ने अपने मौजूदा सांसद चौधरी महबूब अली क़ैसर को एक बार फिर मैदान में उतारा है। चूंकि वीआईपी महागठबंधन का हिस्सा है ऐसे में यहां 'मुस्लिम-यादव-निषाद' समीकरण की चर्चा ज़ोर पकड़ रही है जिसे स्थानीय बातचीत में 'मुनिया' (मुस्लिम निषाद यादव) समीकरण कहा जा रहा है।
 
 
यही वजह है कि खगड़िया में मुस्लिम वोटरों को रिझाने के लिए वीआईपी पड़ोसी जिले बेगूसराय में आरजेडी के उम्मीदवार तनवीर हसन का समर्थन कर रही है न कि सीपीआई के प्रत्याशी कन्हैया कुमार का। मुकेश सहनी ने बॉलीवुड की दुनिया से राजनीति में क़दम रखा है। उनका कहना है कि वो इस धारणा को ख़त्म करना चाहते हैं कि उनकी जाति मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
 
 
2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने सहनी के साथ बिहार के कई इलाक़ों का दौरा किया था। इसके अलावा सहनी पर जनवरी, 2015 में हुए अज़ीज़पुर दंगों के पीछे होने के आरोप भी लगे थे। ये दंगा वैशाली ज़िले के एक गांव में हुआ था जहां निषाद समुदाय बहुसंख्यक है। इस दंगे में मुस्लिम समुदाय के चार व्यक्तियों की मौत हुई थी।
 
 
मुश्किल में निषाद और सहनी जातियां
निषाद और नदियों से जुड़े कारोबार करने वाले समुदायों के लिए मुश्किलें तब आनी शुरू हुईं जब पुल, बैराज और बांध बनने लगे। मिसाल के तौर पर फ़रक्का बराज बनने के बाद इन समुदायों को भारी आर्थिक नुक़सान हुआ। गंगा और उसकी सहायक नदियों में चलने वाली नावों की संख्या में तेज़ी से गिरावट आई है।
 
 
बैराज के बनने से नदियों में ऊपर से मछलियां आनी कम हो गईं हैं। नतीजन, कई तालाब और नदियां होने के बावजूद बिहार अब मछलियों के लिए आंध्र प्रदेश पर निर्भर हो गया है। यही वजह है कि पिछले साल जब राज्य सरकार ने आंध्र प्रदेश से आने वाली मछलियों पर ये दलील देकर पाबंदी लगाई कि इनसे कैंसर हो रहा है तो इस कारोबार से जुड़े लोगों ने इस पर शक ज़ाहिर किया।
 
 
पिछले कई सालों में सहनी जाति के लोग बड़ी संख्या में बेरोज़गार हुए और प्रवासी मज़दूर बनकर दूसरे राज्यों में पलायन कर गए। इनमें से कुछ तो अपराध की दुनिया में शामिल हो गए। इस हालात को भांपकर ही ख़ुद को 'सन ऑफ़ मल्लाह' (मल्लाह का बेटा) कहने वाले मुकेश सहनी ने वीआईपी बनाई। पार्टी बनाने के पीछे निश्चित तौर पर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी।
 
निषाद समुदाय के राजनीतिक महत्व को समझते हुए ही सालों पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मिर्ज़ापुर की पूर्व दस्युरानी फूलन देवी को टिकट दिया था।
 
 
'गंगोत' वोटरों का भी है दबदबा
गंगा के पूरे मैदानी इलाक़े में ऐसी कई जातियां और उपजातियां हैं जो नदी से जुड़े कामों में लगी हैं। पूर्वी बिहार में 'गंगोता' या 'गंगापुत्र' कही जाने वाली जाति के लोगों की अच्छी ख़ासी संख्या है।
 
गंगोता जाति के लोगों को लुभाने की कोशिश पिछले चुनाव से शुरू हुई जब आरजेडी ने शैलेश मंडल उर्फ़ बुलो मंडल को टिकट दिया। दिलचस्प बात ये है कि मंडल आरजेडी के उन चार उम्मीदवारों में शामिल थे जो चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे।
 
इतना ही नहीं, मंडल ने बीजेपी के मशहूर नेता शाहनवाज़ हुसैन को मात दी थी। मंडल की ये जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि भागलपुर में मुस्लिम वोटरों की बड़ी संख्या है। सहनी और निषादों की तरह गंगोता समुदाय के लोगों के भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने की धारणा है।
 
भागलपुर में 1989 में सांप्रदायिक दंगों में गंगोता जाति के लोगों के शामिल होने के आरोप भी लगते रहे हैं। लेकिन इस दंगे के 25 साल बाद मुसलमानों ने बीजेपी के शाहनवाज़ हुसैन के बजाय गंगोता जाति के उम्मीदवार शैलेश मंडल को चुना। लालू यादव अब एक बार फिर इसी फ़ॉर्मूले पर काम कर रहे हैं।
 
 
वैसे, निषादों को रिझाने का ये तरीका सिर्फ़ बिहार तक ही सीमित नहीं है। पिछले साल मई में हुए उप चुनाव में समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी समर्थित उम्मीदवार प्रवीण निषाद ने गोरखपुर जैसी अहम सीट पर बीजेपी को मात दी थी। निषाद वोटों की अहमियत समझते हुए अब बीजेपी ने प्रवीण निषाद को अपने ख़ेमे में शामिल कर लिया है।

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