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महाराष्ट्र सरकार और केंद्र की बीजेपी सरकार में शह- मात का खेल आख़िर क्यों?

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BBC Hindi

बुधवार, 3 नवंबर 2021 (08:59 IST)
सरोज सिंह, बीबीसी संवाददाता
तारीख़ 23 नवंबर, 2019।
सुबह का वक़्त था। महाराष्ट्र में चल रहे राजनीतिक उठापटक के बीच एक तस्वीर टीवी और मोबाइल फ़ोन पर फ़्लैश होना शुरू हुई। देवेंद्र फडणवीस ने दोबारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। एनसीपी नेता अजित पवार बने उप-मुख्यमंत्री। इससे पहले महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था।
 
एक दिन पहले ही शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के नेताओं के बीच उद्धव ठाकरे को सीएम बनाने को लेकर सहमति बनी थी। लेकिन रातों-रात सब कुछ बदल गया।
 
तब शिवसेना नेता संजय राउत ने एनसीपी नेता अजित पवार पर हमला करते हुए कहा था, "उन्हें ईडी की जाँच का डर था, इसलिए उन्होंने शरद पवार को धोखा दे दिया है क्योंकि फडणवीस हमेशा कहते थे कि अजित पवार को जेल भेजेंगे।"
 
अजित पवार और अनिल देशमुख
उस घटना के दो साल बाद- महाराष्ट्र से आज सुबह दो ख़बरें आई। एक ख़बर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार से जुड़ी हुई है। मंगलवार को आयकर विभाग ने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार की 1000 करोड़ रुपए की संपत्ति ज़ब्त कर ली है। दूसरी ख़बर है मनी लांड्रिंग के आरोपों में घिरे महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख की गिरफ़्तारी की। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) केंद्र सरकार के अधीन आती है।
 
मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने देशमुख पर पुलिस अधिकारियों के ज़रिए हर महीने 100 करोड़ रुपए वसूली का आरोप लगाया था।
 
उसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ सीबीआई जाँच के आदेश दिए थे और उन्हें महाराष्ट्र के गृह मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था।
 
ईडी और आईटी विभाग की कार्रवाई महाराष्ट्र सरकार के दो बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ हुई है। दोनों ही जाँच एजेंसियाँ केंद्र सरकार के अधीन आती हैं।
 
महाराष्ट्र में द हिंदू अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार आलोक देशपांडे कहते हैं, "केंद्रीय एजेंसियों की राज्य के नेताओं पर कार्रवाई के बीच एक सवाल जो कोई नहीं पूछ रहा है वो ये कि ये वही अजित पवार हैं, जिन्होंने देवेंद्र फडणवीस के साथ मिल कर सरकार बनाई थी। क्या 1000 करोड़ की संपत्ति क्या दो साल में बनी? 2019 में जब देवेंद्र फडणवीस जब 4 दिन के लिए मुख्यमंत्री बने और अजित पवार उप-मुख्यमंत्री, तब क्या किसी को इसका पता नहीं था।"
 
नवाब मलिक
इन दोनों घटनाक्रम के बीच महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और एनसीपी नेता नवाब मलिक ने मंगलवार को फिर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के मुंबई डिवीज़न के डायरेक्टर समीर वानखेड़े पर उन्होंने नया हमला बोला।
 
उन्होंने आरोप लगाया कि वानखेड़े, देवेंद्र फडणवीस के क़रीबी हैं और ड्रग्स के फ़र्जी मामले बनाकर करोड़ों रुपए की उगाही करते हैं। नवाब मलिक पिछले एक महीने से उन पर हमलावर हैं।
 
पूरा मामला मुंबई क्रूज़ शिप ड्रग्स मामले में बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ ख़ान के बेटे आर्यन ख़ान की गिरफ़्तारी से शुरू हुआ था।
 
वहीं नवाब मलिक पर यह आरोप लगे कि उनके दामाद समीर ख़ान को एनसीबी ने ड्रग्स मामले में गिरफ़्तार किया था, इस कारण वो व्यक्तिगत रूप से एनसीबी पर हमलावर हैं।
 
बात चाहे महाराष्ट्र सरकार की हो या बीजेपी की- एक दूसरे पर निशाना साधने का कोई मौका कोई नहीं छोड़ रहा।
 
महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व में महाराष्ट्र टाइम्स से जुड़े रहे विजय चोरमारे कहते हैं, "दोनों तरफ़ से मामला राजनीति से प्रेरित है। लेकिन पहला मौक़ा है, जब नवाब मलिक की वजह से राज्य सरकार 'अटैकिंग मोड' में है, बीजेपी बचाव की मुद्रा में है। नवाब मलिक पूरा मामला अकेले लड़ रहे हैं।"
 
तक़रार की शुरुआत
फ़्लैशबैक में जाएँ, तो महाराष्ट्र की इस दिलचस्प पटकथा की शुरुआत 24 अक्तूबर 2019 से होती है। उस दिन महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के नतीजे आए थे। इन चुनावों में बीजेपी और शिवसेना साथ लड़े थे। दूसरी ओर, कांग्रेस और एनसीपी का गठबंधन था।
 
बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को बहुमत लायक़ सीटें मिल गई थीं, लेकिन मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इसे लेकर मामला फँस गया। बीजेपी और शिवसेना की बात बन नहीं पाई। राज्य में कुछ दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लग गया।
 
नवंबर 2019 में जब देवेंद्र फडणवीस नाटकीय अंदाज में दोबारा मुख्यमंत्री बने, तो 80 घंटे बाद ही उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। फिर महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई। तब से अब तक महाराष्ट्र सरकार और बीजेपी के बीच शह और मात का खेल चल रहा है।
 
द हिंदू के वरिष्ठ पत्रकार आलोक देशपांडे कहते हैं, "इस शह मात के खेल में एक बहुत अचरज की बात है। केंद्रीय एजेंसियों के हमले की वजह से महा विकास अघाड़ी सरकार के तीनों घटक दल एक दूसरे के क़रीब आ गए हैं। अगर ये आरोप बीजेपी नहीं लगा रही होती, तो एनसीपी-कांग्रेस-शिवसेना में कई झगड़े हो गए होते। अब ऐसा लगता है कि फ़िलहाल ये सरकार गिरने वाली नहीं है। इस वजह से बीजेपी के पास भी कोई चारा नहीं है। ये सिलसिला कुछ दिनों तक आगे भी चलता रहेगा।"
 
लेकिन क्या ये सिलसिला पाँच साल तक चलेगा और क्या ये गठबंधन सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी?
 
इस सवाल के जवाब में आलोक कहते हैं, "राजनीति में ऐसा कोई अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। मुंबई समेत कई बड़े शहरों में अगले साल शुरुआत में कॉरपोरेशन के चुनाव होने वाले हैं, जिस पर सभी की निगाहें टिकीं है। उसमें पार्टी के प्रदर्शन पर बहुत कुछ निर्भर करता है।"
 
महाराष्ट्र सरकार और केंद्र के बीच इस रस्साकशी की कहानी में हर छोटे इंटरवल के बाद नए मामले आते गए।
 
भीमा-कोरेगाँव मामला
वरिष्ठ पत्रकार विजय चोरमोरे की मानें, तो जाँच एजेंसियों को मोहरा बनाने का काम भीमा-कोरेगाँव मामले से हुआ। 31 दिसंबर 2017 को पुणे में एल्गार परिषद की बैठक में लोगों को कथित रूप से उकसाने के लिए नौ कार्यकर्ताओं और वकीलों को महाराष्ट्र पुलिस ने 2018 में गिरफ़्तार किया था।
 
महाराष्ट्र में नई सरकार के आने के बाद जनवरी 2020 में राज्य सरकार ने संकेत दिए थे कि अगर पुणे पुलिस आरोपों को साबित करने में विफल रही, तो मामला एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) को सौंपा जा सकता है।
 
एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक पत्र लिखा था।
 
महाराष्ट्र की शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस सरकार के भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले के अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र की समीक्षा के लिए की गई बैठक की, जिसके एक दिन बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मामले की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दी थी।
 
केंद्रीय गृह मंत्रालय के इस फ़ैसले के बाद महाराष्ट्र सरकार और केंद्र में विवाद पैदा हो गया था।
 
विजय चोरमोरे कहते हैं, "मैं नहीं मानता कि महाराष्ट्र सरकार गिराना बीजेपी की प्राथमिकता है। केंद्र की बीजेपी, शिवसेना को कांग्रेस एनसीपी से अलग करना चाहती है। ताकि लोकसभा चुनाव बीजेपी और शिवसेना साथ लड़ सके। नहीं तो बीजेपी को लोकसभा में 20 से ज़्यादा सीटों का नुक़सान होगा। सारी क़वायद उसी के लिए हो रही है।"
 
पालघर मामला और अर्नब की गिरफ़्तारी
भीमा कोरेगाँव मामले से जो तकरार केंद्र और राज्य के बीच शुरू हुई, वो अब तक जारी है।
 
16 अप्रैल 2020 को महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं की लिंचिंग का मामला भी बेहद गरमाया।
 
बीजेपी ने इस मामले में उद्धव सरकार पर कड़ा हमला बोला। पालघर मामले की जाँच को लेकर पुलिस को कठघरे में खड़ा किया गया।
 
इसी मुद्दे पर अपने टीवी चैनल पर बहस के दौरान अर्नब गोस्वामी ने सोनिया गांधी को लेकर टिप्पणी की थी।
 
बाद में महाराष्ट्र पुलिस ने अर्नब गोस्वामी को एक दूसरे मामले में गिरफ्तार किया, जिसे पालघर मामले पर उनकी टिप्पणी से जोड़ कर भी देखा गया।
 
अर्नब की गिरफ़्तारी, 52 वर्षीय इंटीरियर डिज़ाइनर अन्वय नाइक को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले हुआ था।
 
हालाँकि अन्वय नाइक ख़ुदकुशी मामले की जाँच पहले एक बार हो चुकी थी, जिसके बाद 2019 में रायगढ़ पुलिस ने इस मामले को बंद कर दिया था।
 
इस पूरे मामले में मजिस्ट्रेट ने पुलिस की 2019 की रिपोर्ट को स्वीकार भी कर लिया था। लेकिन मामले को दोबारा से महाराष्ट्र सरकार ने खोलने की इजाजत माँगी थी।
 
सुशांत सिंह की मौत और ड्रग्स रैकेट की जाँच
साल 2020 में जून महीने में एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से दोनों पार्टियों के बीच चीज़ें और बिगड़ती चली गई हैं।
 
सुशांत सिंह की मौत ख़ुदकुशी थी या हत्या, इसे लेकर केंद्र और महाराष्ट्र सरकार के बीच मामला तब फिर फँस गया, जब बिहार पुलिस ने सुशांत की मौत के मामले में एक एफ़आईआर दर्ज कर ली।
 
बिहार पुलिस क्या इस मामले की जाँच कर सकती है या नहीं- इसे लेकर ख़ूब बवाल मचा। इसके बाद बिहार पुलिस ने मामला सीबीआई को सौंपने की सिफ़ारिश की और केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया।
 
महाराष्ट्र सरकार ने इस पर कड़ी आपत्ति की थी और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे सीबीआई को सौंपने पर अपनी मुहर लगा दी।
 
फिर सुशांत सिंह के मौत मामले में रिया चक्रवर्ती की एंट्री हुई। उन पर सुशांत की हत्या करने जैसे आरोप लगे, जो साबित नहीं हो सके। फिर ड्रग्स को लेकर जाँच चलने लगी।
 
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने रिया, उनके भाई और कुछ अन्य लोगों को एनडीपीएस एक्ट में गिरफ़्तार कर लिया।
 
इसे लेकर "बॉलीवुड को बदनाम करने" और "फ़िल्म इंडस्ट्री से ड्रग्स का सफ़ाया करने" जैसे दो मसलों पर एक तरफ़ शिवसेना खड़ी थी तो दूसरी तरफ़ बीजेपी। फिर मामले में फिल्म स्टार कंगाना रनौत की एंट्री हुई और राज्य सरकार और केंद्र के बीच जम कर जंग चली।
 
टीआरपी स्कैम
इसके बाद आया अक्तूबर का महीना। अक्तूबर 2020 में मुंबई पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अर्णब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी और दो अन्य चैनलों पर टीआरपी में छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया था।
 
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के तकरीबन 10 दिन बाद, टीआरपी मामले में लखनऊ में एक एफ़आईआर दर्ज हुई थी। फिर उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले को सीबीआई को सौंपने की माँग की।
 
जवाब में महाराष्ट्र सरकार ने किसी भी जाँच के लिए सीबीआई को दी जाने वाली सामान्य सहमति वो वापस लेने का फ़ैसला किया।
 
मुकेश अंबानी के घर विस्फोटक
मार्च 2021 में एक बार फिर केंद्र और महाराष्ट्र सरकार आमने सामने आ गए।
 
मुंबई में मुकेश अंबानी के घर के पास विस्फोटकों से भरी हुई एसयूवी मिली, जिसमें जिलेटिन की छड़ें थी। वो स्कॉर्पियो मनसुख हिरेन की थी।
 
मामले की जाँच के दौरान मनसुख हिरेन से पूछताछ हुई। बाद में उनकी लाश मुंब्रा खाड़ी में पाई गई।
 
मनसुख हिरेन की मौत का मामला मर्डर के तौर पर महाराष्ट्र पुलिस ने दर्ज किया था। बाद में इस पूरे मामले को महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वॉड (एटीएस) को सौंप दिया गया। लेकिन बाद में केंद्र सरकार ने विस्फोटक से जुड़े मामले की जाँच नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) को सौंप दी।
 
दोनों मामले के तार आपस में जुड़ते थे। इस वजह से पूरे मामले में महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार एक बार फिर आमने सामने नज़र आई।
 
बाद में मुंबई पुलिस कमिश्नर पद से परमबीर सिंह को हटाया गया और फिर परमबीर सिंह ने अनिल देशमुख पर लगाए गंभीर आरोप। इन्हीं आरोपों के क्रम में अब अनिल देखमुख ईडी की रिमांड पर भेज दिए गए हैं। जानकारों का कहना है कि शह मात का ये खेल आने वाले दिनों में भी जारी रह सकता है।

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