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संसद हमला: ऐसा लगा जैसे किसी ने संसद भवन उड़ा दिया हो

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, बुधवार, 13 दिसंबर 2017 (11:27 IST)
- अनंत प्रकाश
13 दिसंबर, 2001 की सुबह के 11 बजे देश की राजधानी दिल्ली के आसमान पर गुनगुनी धूप छाई हुई थी। देश की संसद में विपक्ष के हंगामे के बीच शीतकालीन सत्र चल रहा था। दिसंबर की तेरहवीं तारीख़ सुस्त चाल से आगे बढ़ रही थी। संसद में महिला आरक्षण बिल को लेकर बीते कई दिनों से हंगामा जारी था। संसद परिसर में अंदर से लेकर बाहर नेताओं से लेकर पत्रकार और कैमरामैन बेफ़िक्र अंदाज़ में गुफ़्तगू में व्यस्त थे।
 
सरकारी गाड़ियों का तांता
संसद में इस समय तक सैकड़ों सांसदों समेत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और विपक्ष की नेता सोनिया गांधी मौजूद थीं। और फिर 11 बजकर दो मिनट पर लोकसभा स्थगित हो गई। इसके बाद पीएम वाजपेयी और सोनिया गांधी अपनी अपनी गाड़ियों के साथ संसद से निकल पड़े।
 
संसद से सांसदों को ले जाने के लिए गेटों के बाहर सरकारी गाड़ियों का तांता लगना शुरू हो चुका था। देश के उपराष्ट्रपति कृष्ण कांत का काफ़िला भी संसद के गेट नंबर 12 से निकलने के लिए तैयार था। गाड़ी को गेट पर लगाने के बाद सुरक्षाकर्मी उपराष्ट्रपति के बाहर आने का इंतज़ार कर रहे थे। सदन से बाहर निकल रहे नेताओं और पत्रकारों के बीच बातचीत तत्कालीन राजनीति से जुड़ी अनौपचारिक बातचीत का दौर जारी था।
 
एम्बैसडर से संसद में घुसे चरमपंथी
वरिष्ठ पत्रकार सुमित अवस्थी इस वक्त तक सदन के गेट नंबर एक के बाहर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मदन लाल खुराना के साथ बातचीत कर रहे थे।
 
पत्रकार सुमित अवस्थी बीबीसी को बताते हैं, "मैं अपने कुछ साथियों के साथ केंद्रीय मंत्री मदन लाल खुराना से महिला आरक्षण बिल को लेकर जानकारी लेना चाहता था कि विधेयक सदन में पेश हो पाएगा या नहीं, चर्चा हो पाएगी या नहीं। तभी हमने एक आवाज़ सुनी।।। जो गोली की आवाज़ थी।"
 
11 बजकर तीस मिनट से ठीक पहले उपराष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी उनकी सफेद एम्बैसडर कार के पास खड़े उनके आने का इंतज़ार कर रहे थे। तभी DL-3CJ-1527 नंबर की एक सफ़ेद एम्बैसडर कार तेजी से गेट नंबर 12 की ओर बढ़ती है। कार की रफ़्तार संसद में चलने वाली सरकारी गाड़ियों से कुछ ज़्यादा तेज थी। कार की रफ़्तार देखकर संसद के वॉच एंड वॉर्ड ड्यूटी में तैनात जगदीश प्रसाद यादव आनन-फानन में निहत्थे इस कार की और दौड़ पड़े।
 
जब संसद में गूंजी पहली गोली की आवाज़
ये उस दौर की बात है जब लोकतंत्र के मंदिर यानी देश की संसद में हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों के तैनात होने का चलन नहीं था। संसद की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों को पार्लियामेंट हाउस वॉच और वॉच स्टाफ़ कहा जाता था।
 
जगदीश यादव भी इसी टीम का हिस्सा थे और वह भी किसी अनहोनी की आशंका होते ही कार की ओर दौड़ पड़े। उनको भागता देख दूसरे सुरक्षाकर्मी भी कार रोकने के लिए कार की ओर लपके...और इसी बीच ये सफेद एम्बैसडर कार उपराष्ट्रपति कृष्ण कांत की कार से टकरा गई।
 
उपराष्ट्रपति कृष्ण कांत की कार से टकराने के बाद चरमपंथियों ने अंधाधुंध फ़ायरिंग शुरू कर दी। चरमपंथियों के हाथों में एके 47 और हैंडग्रेनेड जैसे उन्नत हथियार थे। संसद परिसर के अलग-अलग हिस्सों में मौज़ूद लोगों ने गोली की आवाज़ सुनते ही तरह-तरह के कयास लगाने शुरू कर दिए। कुछ लोगों ने सोचा कि शायद नज़दीकी गुरुद्वारे में किसी ने गोली चलाई है या कहीं आसपास पटाख़ा फोड़ा गया है।
 
पहली गोली की आवाज़
लेकिन गोली की आवाज़ सुनते ही कैमरामैन से लेकर वॉच एंड वॉर्ड टीम के सदस्य आवाज़ की दिशा की ओर जाने लगे। ये जानना चाहते थे आख़िर माज़रा क्या है।
 
पत्रकार सुमित अवस्थी बताते हैं, "पहली गोली की आवाज़ सुनते ही मैंने खुराना जी से पूछा कि क्या हो गया और ये आवाज़ कहां से आई। तो उन्होंने कहा - 'हां, ये तो बड़ा अजीबो-गरीब है, संसद के आसपास इस तरह की आवाज़ कैसे आ रही है?' तभी वहां पर खड़े वॉच एंड वॉर्ड के एक शख़्स ने बताया कि सर हो सकता है कि चिड़ियों को भगाने के लिए हवाई फायर किया गया हो।"
 
उन्होंने आगे कहा, "लेकिन अगले ही पल मैंने देखा कि राज्य सभा के गेट से एक लड़का आर्मी की वर्दी जैसी पैंट और काली टी शर्ट पहने हुए हाथ में एक बड़ी सी बंदूक लिए हवा में दाएं-बाएं फायर करता हुआ गेट नंबर-1 की ओर दौड़ता चला आ रहा है।"
 
संसद की ओर...
संसद पर हमले के दौरान कई पत्रकार परिसर के बाहर भी मौज़ूद थे जो नेताओं के साथ ओवी वैन की मदद से नेताओं का लाइव इंटरव्यू ले रहे थे।
 
साल 2001 में न्यूज़ चैनल स्टार न्यूज़ के लिए संसद से रिपोर्टिंग कर रहे मनोरंजन भारती ने बीबीसी को बताया, "संसद हमले से ठीक पहले मैं ओवी वैन से लाइव रिपोर्ट कर रहा था। उस वक्त मेरे साथ शिवराज सिंह चौहान और कांग्रेस के एक नेता थे। मैं इन दोनों नेताओं को अपनी मारूति वैन से अंदर ड्रॉप करने के लिए गया हुआ था। जैसे ही उनको ड्रॉप करके मैं गेट से बाहर निकला हूं। तभी मुझे पहली गोली की आवाज़ सुनाई दी।"
 
"गोली की आवाज़ सुनते ही मैं सीधा बाहर की ओर भागकर लाइव करने लगा। मेरे पीछे मुलायम सिंह यादव का ब्लैक कैट कमांडो था। मैंने उससे कहा, 'बॉस, मैं संसद की ओर पीठ करके रिपोर्टिंग कर रहा हूं, उधर से कोई आतंकवादी आए तो देख देना तो उसने कहा ठीक है, बहुत जोर-जोर से गोलियां चल रही थीं, धमाकों की आवाज़ें आ रही थीं।"
 
साढ़े 11 बजे आवाज़ आई...
संसद परिसर में चरमपंथियों के हाथों में मौजूद ऑटोमैटिक एके-47 बंदूकों से निकली गोलियों की तड़तड़ाहट सुनते ही नेताओं समेत वहां मौज़ूद लोगों के चेहरे सन्न रह गए।
 
सदन के अंदर से लेकर बाहर एक अफ़रातफ़री का माहौल था। किसी को भी ठीक-ठीक नहीं पता था कि क्या हो रहा है। सभी अपने-अपने स्तर से घटना को समझने की कोशिश कर रहे थे। इस समय सदन में देश के गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और प्रमोद महाजन समेत कई दिग्गज़ नेता मौजूद थे लेकिन किसी को भी नहीं पता था कि आख़िर हो क्या रहा था।
 
सदन के गेट नंबर वन के बाहर केंद्रीय मंत्री मदन लाल खुराना से बात कर रहे सुमित अवस्थी बताते हैं, "मैंने मदन लाल खुराना साहब से कहा कि ये देखिये सिक्योरिटी गार्ड को क्या हो गया है, गोलियां क्यों चला रहा है। मुझे लगा कि वो किसी का बॉडीगार्ड है। खुराना साहब जब तक पीछे मुड़कर देखते तब तक वॉच एंड वॉर्ड के एक स्टाफ़ ने मदन लाल खुराना का हाथ पकड़कर खींचा। वो अपनी कार के दरवाजे पर हाथ रखकर मुझसे बात कर रहे थे और इस तरह अचानक खींचे जाने से जमीन पर गिर पड़े। खुराना साहब के बाद स्टाफ़ ने मेरा हाथ पकड़कर मुझे नीचे झुकाते हुए कहा कि नीचे झुकिए, कोई गोली चला रहा है। और झुके-झुके ही अंदर जाइए, नहीं तो गोली लग जाएगी।"
 
कैसे मारा गया पहला चरमपंथी?
संसद परिसर में पहली गोली की आवाज़ के बाद ही सनसनी फैल गई। इस वक्त तक संसद में संसदीय मामलों के मंत्री प्रमोद महाजन, नज़मा हेपतुल्ला और मदन लाल खुराना जैसे दिग्गज़ नेता मौजूद थे। 
 
मनोरंजन भारती बताते हैं, "संसद में हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों की तैनाती का चलन उस दौर तक नहीं था। संसद में सीआरपीएफ़ की एक बटालियन रहती है जिसे घटनास्थल तक पहुंचने के लिए लगभग आधा किलोमीटर की दूरी तय करनी थी। ऐसे में जब गोलियां चलने लगीं तो उसके बाद वे लोग भागकर आए।"
 
उपराष्ट्रपति की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों और चरमपंथियों बीच संघर्ष के दौरान सुरक्षाकर्मी निहत्थे मातबर सिंह ने अपनी जान पर खेलकर गेट नंबर 11 को बंद किया।
 
गेट नंबर-1
चरमपंथियों ने मातबर सिंह को हरकत में आते देख ही उन पर गोलियां बरसा दीं। लेकिन इसके बावजूद सिंह ने अपने वॉकी-टॉकी पर अलर्ट जारी कर दिया जिसके बाद संसद के सभी दरवाजों को तत्काल बंद कर दिया गया। इसके बाद चरमपंथियों ने संसद में घुसने के लिए गेट नंबर-1 का रुख किया। गोलियां चलने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने गेट नंबर 1 के पास मौज़ूद लोगों को नज़दीकी कमरे में छिपा दिया और चरमपंथियों का सामना करने लगे।
 
सबसे बड़ी चिंता
कमरों में मौज़ूद लोगों में पत्रकार सुमित अवस्थी भी शामिल थे। अवस्थी बताते हैं, "मदन लाल खुराना के साथ ही मुझे भी गेट नंबर 1 के अंदर पहुंचाकर गेट बंद कर दिया गया। सदन में मुझे गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी कहीं जाते हुए दिखाई दिए। उनके चेहरे की गंभीर मुद्रा और माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ थीं। मैंने उनसे पूछा कि क्या हो गया, लेकिन मेरे सवाल का जवाब दिए बगैर वह आगे चले गए।"
 
"इसके बाद सांसदों को सेंट्रल हॉल और अन्य लोगों को दूसरी जगह शिफ़्ट किया गया। उस वक्त मेरी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सुरक्षित हैं या नहीं। क्योंकि मैं गृह मंत्री आडवाणी को सकुशल हालत में देख चुका था। मुझे बाद में पता चला कि हमले की जवाबी कार्रवाई आडवाणी के निरीक्षण में हो रही थी।"
 
नेताओं के सकुशल होने की ख़बर
इस वक्त तक देश भर में टीवी के माध्यम से ये ख़बर फ़ैल चुकी थी कि देश की संसद पर हमला हो चुका है। लेकिन देश के नेताओं के सकुशल होने की ख़बर किसी के पास नहीं थी। क्योंकि जो पत्रकार सदन परिसर के अंदर मौजूद थे उन्हें सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों से जुड़ी किसी तरह की जानकारी नहीं दी जा रही थी। 
 
इस सबके बीच चरमपंथियों ने संसद भवन के गेट नंबर वन से सदन में घुसने की कोशिश की। लेकिन सुरक्षाबलों ने एक चरमपंथी को वहीं मार गिराया। इस प्रक्रिया में चरमपंथी के शरीर में बंधी हुई विस्फोटक की बेल्ट में धमाका हो गया।
 
गोलियों की ज़द में आए पत्रकार
अवस्थी बताते हैं, "हम एक कमरे में मौजूद थे, जहां मेरे अलावा कुछ तीस-चालीस लोगों को रखा गया था। जैमर ऑन होने या किसी अन्य वजह से मोबाइल फोनों ने काम करना बंद कर दिया था। हम दुनिया से बिलकुल कटे हुए थे। तभी दो ढाई घंटे के बाद जोर के धमाके की आवाज़ आई। ये आवाज़ इतनी तेज थी कि ऐसा लगा कि संसद का एक हिस्सा गिरा दिया गया है। बाद में पता चला कि गेट नंबर वन पर ही एक फिदाइन ने खुद को ब्लास्ट कर लिया।"
 
संसद परिसर में इस पूरे संघर्ष को अपने कैमरे में कैद कर रहे कैमरापर्सन अनमित्रा चकलादार बताते हैं, "गेट नंबर वन पर एक चरमपंथी को मार दिए जाने के बाद एक चरमपंथी ने आकर हम पत्रकारों पर गोलियां चलानी शुरू कर दी।" "इनमें से एक गोली न्यूज़ एजेंसी एएनआई के कैमरा पर्सन विक्रम बिष्ट की गर्दन में लगी। दूसरी गोली मेरे कैमरे में लगी। हमारे पास आकर एक ग्रेनेड भी गिरा। लेकिन ये ग्रेनेड फटा नहीं और शाम के चार बजे सुरक्षाबलों ने आकर इसे हमारे सामने डिटोनेट किया।"
 
सुरक्षाबल भारी संख्या में संसद पहुंचे
एएनआई के कैमरापर्सन को घायल हालत में एम्स में भर्ती कराया गया जिसके कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई। इसके बाद चारों चरमपंथियों ने गेट नंबर 9 की ओर रुख किया। इस दौरान तीन चरमपंथियों को मार दिया गया। पांचवें चरमपंथी ने गेट नंबर 5 की ओर दौड़ कर संसद में घुसने की लेकिन सुरक्षाबलों ने उसे भी मार दिया।
 
देश की संसद की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों और चरमपंथियों के बीच तकरीबन साढ़े 11 बजे सुबह से शुरू हुआ ये ऑपरेशन तकरीबन शाम चार बजे तक चलता रहा। इसके बाद शाम चार से पांच बजे के आसपास सुरक्षाबल भारी संख्या में संसद पहुंचे और पूरे क्षेत्र की छानबीन करनी शुरू कर दी। इस हमले में दिल्ली पुलिस के पाँच सुरक्षाकर्मी, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल की एक महिला सुरक्षाकर्मी, राज्य सभा सचिवालय के दो कर्मचारी और एक माली की मौत हुई।
 
अफ़ज़ल को फांसी
भारतीय संसद पर हमले के मामले में चार चरमपंथियों को गिरफ़्तार किया गया था। बाद में दिल्ली की पोटा अदालत ने 16 दिसंबर 2002 को चार लोगों, मोहम्मद अफज़ल, शौकत हुसैन, अफ़सान और प्रोफ़ेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी को दोषी करार दिया था।
 
सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफ़ेसर सैयद अब्दुल रहमान गिलानी और नवजोत संधू उर्फ़ अफ़साँ गुरु को बरी कर दिया था, लेकिन मोहम्मद अफ़ज़ल की मौत की सज़ा बरकरार रखी थी और शौकत हुसैन की मौत की सज़ा को घटाकर 10 साल की सज़ा कर दिया था। इसके बाद 9 फरवरी, 2013 को अफ़ज़ल गुरु को दिल्ली की तिहाड़ जेल में सुबह 8 बजे फांसी पर लटका दिया गया।

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