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एक थे ओबामा...

- ब्रजेश उपाध्याय (वॉशिंगटन)

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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा
बहुत पुरानी बात है। कम से कम लगता तो ऐसा ही है जैसे बहुत-बहुत पुरानी बात हो। सन था 2008। अमेरिका राजनीति के आसमान में अचानक से एक सितारा चमकने लगा। चमक ऐसी कि कैलिफोर्निया से काहिरा तक, बॉस्टन से बीजिंग तक, ड्रॉइंग रूम और गलियों में, गांवों और शहरों में, संसद और कारखानों में लोग उसकी बातें करने लगे।
BBC

नाम था ओबामा, लेकिन वो नाम कुछ भी हो सकता था- उम्मीद, भरोसा, सिद्धांत, ईमान और शायद सत्य भी। राजनीति में ये शब्द मायने भी रख सकते हैं। वो एहसास ही कुछ अलग सा था।

वो कहानियां सुनाता था, लहरों के ख़िलाफ़ तैरने की बात करता था। चेहरे पर चमक थी, हेमलिन शहर के बांसुरीवादक की तरह हजारों की भीड़ को अपने पीछे खींचता और मंत्रमुग्ध लोग तैयार रहते उसके साथ कहीं भी जाने को।

लड़कियां उसे सेक्सी कहती थीं, बुद्धिजीवी उसे दूरदर्शी कहते थे, बच्चे अचानक से सुपरमैन और स्पाइडरमैन को छोड़कर ओबामा बनना चाहते थे। अमेरिका ने जॉन एफ कैनेडी को देखा था, बिल क्लिंटन को देखा था लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं देखा था।

20 जनवरी 2009 को वॉशिंगटन की एक कंपकपाती सर्द सुबह नेशनल मॉल पर हजारों की भीड़ में मैं भी गवाह था उन पलों का जब उस बांसुरीवादक ने वादा किया अमेरिका से और दुनिया से एक नई शुरुआत का, एक नई यात्रा का।

दीवार पर टंगी तस्वीर : कल अचानक से यू-ट्यूब पर पांच साल पुराने ओबामा दिखे। किसी मनपसंद पुरानी फिल्म की तरह मैंने उनके कुछ भाषणों को सुना और लगा जैसे हॉलीवुड के किसी कैरेक्टर को देख रहा हूं जो ओबामा की भूमिका निभा रहा है।

जो ओबामा इन दिनों मुझे दिखते हैं वो तो पुराने ओबामा की दीवार पर टंगी पीली पड़ती हुई ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर की तरह नजर आते हैं।

बालों में सफेदी आ गई है, चेहरे की चमक गायब है, भाषण उबाऊ हो रहे हैं, ओबामा हमेशा थके-थके नजर आते हैं। उनकी लोकप्रियता आधी रह गई है और हर नए सर्वे में नीचे ही जा रही है। बांसुरीवादक के पीछे चलने वाली भीड़ छंट सी गई है।

देखा जाए तो जो अमेरिका ओबामा को मिला था, उसके मुकाबले आज दिन काफी सुधर गए हैं। दो युद्ध चल रहे थे, आर्थिक मंदी थी, लाखों की नौकरियां छिन गई थीं, क़िस्त नहीं चुका पाने की वजह से लोगों के सिरों से छत हट गई थी। लोग अमेरिका सुपरपावर के खत्म होने की बात कर रहे थे। चीन, भारत और रूस के प्रभुत्व वाली नई दुनिया की बात जोर पकड़ रही थी।

सिर पर सेहरा नहीं : आज एक युद्ध खत्म हो चुका है और अमेरिका दूसरे से भी अपनी फौज वापस लाने का एलान कर चुका है। अमेरिका अर्थव्यवस्था सुधार पर है, नई नौकरियां पैदा हो रही हैं। अमेरिका का दबदबा पहले जितना तो नहीं लेकिन अभी भी बरकरार है।

तो फिर ओबामा के सिर पर कामयाबी का सेहरा क्यों नहीं?

यू ट्यूब के भाषणों को मैंने फिर से देखा और बात कुछ हद तक समझ में आई। ओबामा ने जो कहानियां सुनानी शुरू की थीं, दुनिया ने बरसों से वो कहानियां नहीं सुनी थीं। लेकिन व्हाइट हाउस में घुसने के बाद वो कहानियां उन्होंने अधूरी छोड़ दी हैं। बॉलीवुड की फिल्मों की तरह पुरानी कहानियां ही फिर से रीसाईकिल होने लगीं।
चेहरे पर झुंझलाहट

ओबामा ने बंदूक खत्म करने की बात की थी, आज हर दूसरे दिन कोई सनकी स्कूली बच्चों को बंदूक का निशाना बना रहा होता है। वॉल स्ट्रीट के जिन गुंडों को खत्म करने की बात कही थी उन्होंने, वही आज फिर से दुनिया से हफ्ता वसूली कर रहे हैं।

अमीरी-गरीबी की खाई पहले से ज्यादा बड़ी हो गई है। जिस दुनिया को उन्होंने अमेरिकन ड्रीम में हिस्सा देने का वादा किया था, वो दुनिया आज भी अमेरिका आप्रवासन नियमों के दीवार से सिर टकरा कर जख्मी हो रही है।

नायकों और महानायकों की कहानियां जरूरी होती हैं क्योंकि वो नींव बनती हैं आने वाले कल की। और जरूरी होता है कि वो कहानियां पूरी की जाएं।

शायद अपनी कहानी अभी तक पूरी नहीं कह पाने की झुंझलाहट है उनके चेहरे पर। शायद बंटे हुए अमेरिका को एक नहीं कर पाने की हताशा है उनके भाषणों में। शायद अपने सिद्धांतों से हटना उन्हें भी कचोटता है। शायद एक आम राजनेता जैसा बर्ताव उन्हें भी सालता है।

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