Publish Date: Sun, 10 May 2009 (20:35 IST)
Updated Date: Sun, 10 May 2009 (20:35 IST)
नेता, राजनीति और उनसे जुड़े राजनीतिक मुद्दे जितने संजीदा और गंभीर हो सकते हैं, वहीं राजनीति के कुछ हल्के-फुल्के और रंगीन पहलू भी हैं- खासकर बात जब पंजाब जैसे राज्य की हो। लोग यूँ ही इसे रंगीला पंजाब नहीं कहते। अब यहाँ के राजनेताओं के उपनामों को ही लीजिए।
एचएस 'लकी', रनिंदरसिंह 'टिक्कू', रवनीतसिंह 'बिट्टू', सुखविंदरसिंह 'डैनी, बोनी, गोल्डी, जस्सी....कई सारे नए-पुराने नेताओं के नामों में पारिवारिक उपनाम से अलग ऐसे रंगीले उपनाम आपको मिलेंगे। चुनावी कवरेज के लिए अगर आप पंजाब के दौरे पर निकलें तो ऐसे अनोखे नामों वाले पोस्टर हर जगह आपको मिल जाएँगे।लोकसभा के लिए भटिंडा से उम्मीदवार और पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदरसिंह के बेटे रनिंदरसिंह को ज्यादातर लोग टिक्कू या टिक्कूजी कहकर ही बुलाते हैं। इस बार कांग्रेस की ओर से लोकसभा चुनाव लड़ रहे युवा नेता रवनीतसिंह बिट्टू और सुखविंदर सिंह डैनी भी ऐसे ही उपनामों का प्रयोग करते हैं।चंडीगढ़ युवा कांग्रेस के नेता अपने नाम के साथ लकी लगाते हैं- एचएस लकी, वहीं बादल परिवार की बहू और लोकसभा उम्मीदवार हरसिमरत कौर बन जाती हैं बीबाजीगोल्डी, बोनी, जस्सी : गोल्डी, बोनी, जस्सी...ये सब बच्चों के नाम नहीं हैं, बल्कि पंजाब विधानसभा के कुछ सदस्यों के उपनाम हैं।लवसिंह गोल्डी गड़शंकर से विधायक हैं तो काका रणदीपसिंह नाभा से और हरमिंदरसिंह जस्सी भटिंडा से। पारिवारिक उपनाम को छोड़कर अन्य नाम अपनाने का चलन यूँ तो नया नहीं है। |
| कुछ ने जातिसूचक बनने वाले उपनाम से दूर रहने के लिए नए उपनाम अपनाएँ हैं तो कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि पंजाब की नई पीढ़ी में ये एक फैशन स्टेटमैंट जैसा भी है। ये उपनाम बचकाने भी लग सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि ये आसानी से जुबान पर चढ़ जाते हैं। |
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भारतीय राजनीति में जाति कितनी हावी है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन पंजाब में कई नेताओं ने जाति के बजाय अपने पैतृक गाँव के नाम को उपनाम के तौर पर इस्तेमाल किया है। मसलन प्रकाशसिंह बादल, प्रतापसिंह कैरों, राजिंदर कौर भट्टल।
कुछ ने जातिसूचक बनने वाले उपनाम से दूर रहने के लिए नए उपनाम अपनाएँ हैं तो कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि पंजाब की नई पीढ़ी में ये एक फैशन स्टेटमैंट जैसा भी है।
सुनने में ये उपनाम बचकाने भी लग सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि ये आसानी से जुबान पर चढ़ जाते हैं।
कार्यकर्ताओं की मानें तो लोग ऐसे नामों से ज्यादा सहज महसूस करते हैं। वे कहते हैं कि टिक्कू, बिट्टू या गोल्डी में जो अपनापन है, वह पूरे नाम में कहाँ।
पंजाब के एक मंत्री महोदय को ही लीजिए- 'मास्टर'मोहनलाल। कहने को तो वे ट्रांसपोर्ट मंत्री हैं, लेकिन पहले कभी अध्यापक थे यानी पढ़ाते थे। तो बस हो गए हमेशा के लिए मास्टर मोहनलाल।
अमरिंदरसिंह आज भी कार्यकर्ताओं के लिए 'महाराजा साहब' हैं तो बादल परिवार के लाडले बेटे सुखबीरसिंह बादल 'काकाजी' हैं।
शेख्सपियर की महान कृति रोमियो एंड जूलिएट में उनके किरदार सवाल उठाते हैं- वाट्स इन ए नेम... यानी नाम में क्या रखा है। पंजाब के राजनेताओं के नामों और अनोखे उपनामों को देखकर तो लगता है कि इनमें बहुत कुछ है।