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जनगणना का जंजाल

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भारतीय जनगणणा अभियान
- शालिनी जोशी (देहरादून से)

BBC
जनगणना- 2010 सरकार का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे महत्त्वाकांक्षी जन अभियान माना जा रहा है।

इसमें सिर्फ लोगों की गिनती ही नहीं बल्कि हर परिवार के बारे में संपत्ति, शिक्षा और कर जैसी 48 और सूचनाएँ भी इकठ्ठी की जानी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर, जनगणना करने वाले कर्मचारियों के लिए ये अभियान किसी जंजाल की तरह और मुश्किल साबित हो रहा है।

नाम क्या है, कब पैदा हुए, क्या काम करते हैं, क्या अपना मकान हैं, रजिस्ट्री का मकान है, कब से रह रहे हैं, घर में टीवी है, रसोई गैस है, बैंक में अकाउंट है और किस जाति के हैं?

पारा 40 डिग्री के पार चला गया है और तपती दोपहर में जनगणना कर्मचारी हाथों में मोटे रजिस्टर लिए घर-घर पैदल घूमते हुए हर परिवार से इस तरह के 48 सवालों के आँकड़े जुटाने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन वो हैरान और परेशान हैं। न तो उन्हें नक्शे के मुताबिक मकान मिल रहे हैं न ही आसानी से घरों में प्रवेश। ऊपर से 48 कॉलम के जनगणना फॉर्म को भरना आसान नहीं है।

परेशानी : पीपी तिवारी और सूरजपाल ऐसे ही दो जनगणना कर्मचारी हैं जो यूँ तो भारतीय सर्वेक्षण विभाग में तैनात हैं, लेकिन इन दिनों उनकी ड्यूटी देहरादून के पॉश समझे जाने वाले इलाके राजपुर में लगी है।

पीपी तिवारी कहते हैं, 'अब देखिए धूप में खड़े हैं हम, कम से कम कुर्सी तो डाल दो, बैठकर लिख लें। एक-एक फॉर्म को भरने में 2-2 घंटे लग जाते हैं। कुछ लोग घर में बिठाना तो दूर, सीधे नौकर या बच्चे से मना ही करवा देते हैं कि घर में कोई नहीं है।'

सूरजपाल आगे जोड़ते हैं, 'कई बार लोग सवालों के जवाब देने से ही इनकार कर देते हैं। पूछो कब से रह रहे हैं तो बताएँगे नहीं। मकान नंबर मिले हुए हैं, लेकिन मकान नंबर नहीं बताएँगे। बैंक अकाउंट है तो वो भी नहीं बताएँगे। उन्हें ये डर लगता है कि कहीं टैक्स न भरना पड़ जाए।'

जनगणना पर भेजे जाने के पहले कर्मचारियों की तीन दिन की ट्रेनिंग हुई है। नगर निगम से उन्हें विशेष नक्शे दिए गए हैं, लेकिन उनका रोना है कि उन्हें पता ही नहीं मिल रहा है।

सिंचाई विभाग में कर्मचारी और फिलहाल जनगणना की ड्यूटी कर रहे सच्चिदानंद कौंसवाल को भटकते हुए दो दिन हो गए, 'हमें जगह ही नहीं मिल पा रही है, जो नक्शा दिया है उसमें सड़क का नाम ही नहीं है न कोई मंदिर या जगह का नाम है। उससे साइट का कुछ पता ही नहीं चल रहा है।'

'एक जगह पहचान कर पहुँचा भी तो उन्होंने कहा कि कोई और रिकॉर्ड ले के चला भी गया है। मैं तो अपना काम शुरू भी नहीं कर पाया हूँ।'

पीपी तिवारी कहते हैं, 'कठिन काम है। अभी तक तो कई लोगों ने गिनती के फॉर्म और सामान के बस्ते भी नहीं उठाएँ हैं। सुपरवाइजर हमसे कल मिला है। 15 जून तक 150 परिवारों के फॉर्म भरकर ये काम पूरा करके देना है।'

क्या आप काम पूरा कर लेंगे? इस सवाल पर सूरजपाल कहते हैं, 'हमारी कोशिश है पूरा करने की। ये हो पाएगा या नहीं ये तो बाद में पता चलेगा क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि लोगों का कितना सहयोग मिलता है।'

वे कहते हैं, 'जो लोग बताएँगे नहीं उनके बारे में हमें अपने आप ही कुछ करना होगा।'

लेकिन ये 'कुछ' क्या होगा, इसके बारे में वो कुछ कहते नहीं बल्कि हँस देते हैं। जनगणना का काम देख रहे देहरादून नगर निगम के पास भी इन सवालों के कोई सीधे जवाब नहीं हैं। लेकिन जब राजधानी देहरादून में ये स्थिति है तो दुर्गम पहाड़ों के सुदूर इलाकों में जनगणना कैसे चल रही होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

प्रदेश में लगभग 21 हजार कर्मचारियों को जनगणना के काम में लगाया गया है, लेकिन कमोबेश हर किसी से इसी तरह की शिकायत मिल रही है। इस तरह से की जा रही गिनती कितनी सही और विश्वसनीय होगी इस पर सवालिया निशान लगा रहेगा।

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