Publish Date: Wed, 25 Mar 2009 (23:11 IST)Updated Date: Wed, 25 Mar 2009 (23:07 IST)
ये सवाल पहले भी उठाए जाते रहे हैं कि अगर दुनियाभर के सभी मुसलमान एक ही कौम का हिस्सा हैं तो फिर इतने अलग-अलग मुस्लिम देश क्यों हैं? अगर इस्लामी 'उम्मा' सिर्फ एक खयाल नहीं, बल्कि यथार्थ है तो फिर इस्लामी देश राष्ट्र-राज्य की सीमाओं में क्यों बँधे हुए हैं? और क्यों दूसरे राष्ट्र-राज्यों की तरह मुस्लिम देश भी एक-दूसरे से युद्ध करते हैं?
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अगर हिंदू और मुसलमानों को दो अलग-अलग कौम मानकर पाकिस्तान बना तो फिर बांग्लादेश के बनने का सिद्धांत और क्या आधार था? ...लेकिन अगर इस बात को खारिज कर दिया जाए कि मुस्लिम उम्मा या एक समान इस्लामी पहचान जैसी कोई चीज नहीं है तो फिर ऐसा क्यों है कि फलस्तीनियों के संघर्ष के प्रति बांग्लादेश या सूडान का मुसलमान जितना संवेदनशील होता है, उतना तिब्बती लोगों के संघर्ष के प्रति नहीं?
इन सवालों के जवाब अब उस बच्चे ने तलाश करने की कोशिश की है, जिसे उसके पिता ने उसे डेढ़ साल की उम्र में ही त्याग दिया और फिर कभी पलट कर उसकी ओर नहीं देखा। इस बच्चे की माँ भारतीय थी और पिता पाकिस्तानी।
अट्ठाईस साल पहले अपनी एक किताब के प्रकाशन के सिलसिले में दिल्ली आए इस शख्स की मुलाकात एक नामी महिला पत्रकार से हुई।
एक हफ्ते तक दोनों के बीच नजदीकियाँ गहराईं और नतीजे में जन्म हुआ आतिश तासीर का। पाकिस्तान से आए इस शख्स का नाम है सलमान तासीर, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेताओं में से एक हैं और पंजाब सूबे के गवर्नर भी।
तनावपूर्ण रिश्ते : पिता के राजनीतिक करियर के कारण आतिश तासीर के जन्म की बात छिपाकर रखी गई। आतिश की परवरिश भारत में ही हुई, लेकिन उनकी माँ ने उन्हें इस्लामी पहचान दी। हालाँकि वे खुद सिख हैं।
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उनके माता-पिता के बीच फिर कोई संपर्क नहीं रहा। आतिश को मजहबी परवरिश से दूर रखा गया और यही कारण था कि बड़े होने पर उनके सामने पहचान का भारी संकट पैदा हो गया।
यह संकट सिर्फ भारतीय या पाकिस्तानी होने का ही नहीं था, बल्कि एक मुसलमान पिता और सिख माँ की संतान होने का भी संकट था। आतिश के लिए उनके पिता, उनका मजहब और राष्ट्रीयता इतने अज्ञात रहे कि बड़े होने पर उन्होंने एक सफर के जरिये इन सभी को पहचानने की कोशिश की।
...लेकिन निहायत ही निजता भरा यह सफर बड़े सवालों में उलझता चला गया और नतीजतन तैयार हुई एक किताब-स्ट्रेंजर टू हिस्ट्री : ए संस जर्नी थ्रू इस्लामिक लैंड्स।
मुस्लिम पहचान : अट्ठाइस साल के आतिश लिखते हैं कि वे मुसलमान होने के गहरे नहीं, बल्कि एक हलके से एहसास के साथ बड़े हुए।
छह साल की उम्र में अपने ममेरे और मौसेरे भाई-बहनों के साथ खेलने के दौरान एक भाई ने चिल्ली कर कहा - आतिश का सूसू नंगा है। यह वाक्य आतिश की स्मृति से अभी तक नहीं मिटा है और शायद तब पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि वे अपने दूसरे सिख भाइयों से अलग हैं।
इसी अहसास ने उन्हें अपने मुसलमान पिता और उनके मुस्लिम देश पाकिस्तान को और जानने के लिए उकसाया, लेकिन आतिश ने पाया कि उनके पिता हालाँकि बहुत कट्टर अर्थों में मजहबी नहीं हैं और शराब के शौकीन हैं - फिर भी वे खुद को सांस्कृतिक अर्थों में मुसलमान मानते हैं।
सांस्कृतिक मुसलमान होने का अर्थ तलाश करने के लिए आतिश ने सीरिया और सऊदी अरब से लेकर तुर्की, ईरान और पाकिस्तान तक की यात्रा करने का फैसला किया, ताकि मुसलमानों के मनोविज्ञान और इसे तैयार करने में इस्लाम की भूमिका की पड़ताल कर सकें।
पहचान की तलाश : तासीर की किताब इसी सफर का दस्तावेज है। उन्होंने इन देशों में जाकर आम मुसलमानों से छात्र, दुकानदार, व्यापारी, पेंटर, टैक्सी वाले और ऐसे ही आम लोगों से मुलाकात की। उनकी किताब की सफलता इस बात में है कि वे इस सफर का ब्योरा देते हुए काफी गंभीर सवाल उठाते हैं।
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तुर्की में उनकी मुलाकात ऐसे इस्लाम परस्तों से हुई, जो वहाँ के कट्टर धर्मनिरपेक्ष सत्ता-प्रतिष्ठान से लगभग घृणा करते हैं और उसे पहली फुरसत में मटियामेट कर देना चाहते हैं।
...लेकिन तुर्की के इस्लाम परस्त जिस तरह की व्यवस्था का स्वप्न देखते हैं, वैसी व्यवस्था ईरान में आम लोगों को इस्लाम के करीब लाने की बजाय उससे दूर करती चली गई है।
तेहरान में आतिश तासीर ऐसे लोगों से मिलते हैं, जो मुसलमान होने के बावजूद गुप्त रूप से हरे रामा-हरे कृष्णा संप्रदाय को मानते हैं और कृष्ण भगवान की मूर्ति के सामने भजन-कीर्तन करते हैं।
...वहीं उनकी मुलाकात एक ऐसे पेंटर से होती है, जो पहले इस्लाम में बेहद आस्था रखता है, लेकिन एक दिन उसका एक दोस्त उसकी कार में रखी कुरआन शरीफ को उठाकर बाहर फेंक देता है और कहता है कि इसमें कुछ नहीं रखा। पेंटर के लिए ये इस्लाम से ज्यादा उस सरकार के खिलाफ प्रतिकार था, जो पुलिस के बल पर इस्लामी कानून लागू करती है।
तासीर लिखते हैं, ईरान पहुँचकर मुझे पता लगा और सीरिया में उसका हलका एहसास हुआ कि मजहबी विश्वास को आधुनिक दुनिया के खिलाफ एक नकारात्मक विचार से जब एक सकारात्मक प्रयोग में बदला जाता है तो वह किस कदर हिंसक और खुद ही को जख्मी करने वाला बन जाता है।
साजिश? : तुर्की के लोग उस खालिस इस्लामी व्यवस्था की कल्पना करते हैं, जो शायद इस्लाम के पैगम्बर के जमाने में रही हो। वे आधुनिक दुनिया को इस्लाम के खिलाफ एक साजिश के तौर पर देखते हैं और उसे पूरी तरह खारिज करते हैं।
...पर उसी स्वप्न या यूटोपिया को जब ईरान में स्थापित कर दिया जाता है तो वह स्वप्न चकनाचूर हो जाता है। किताब में मुस्लिम दुनिया की विसंगतियों को तो बहुत दिलचस्प तरीके से उठाया गया है, लेकिन यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आतिश तासीर की परवरिश जिस माहौल में हुई, जहाँ आतिश के पिता के प्रति सिर्फ नाराजगी और असंतोष था।
आतिश ने इसी व्यक्तिगत रिश्तों में पैठ कर चुके तनाव और गुस्से को व्यापक संदर्भों में समझने की कोशिश की है, इसलिए मुसलमानों और इस्लाम को लेकर उनके कई निष्कर्षों पर इस पूर्वाग्रह की छाया स्पष्ट देखी जा सकती है।